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अब ओली और प्रचंड के बीच सुलह कराने आए एनसीपी के 63 सांसद, चलाया हस्ताक्षर अभियान

Mon, 10 Aug 2020 04:23 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 10 Aug 2020 04:23 PM IST
सार

  • ओली ने फिर से चुनाव आयोग में रजिस्टर कराई अपनी पुरानी पार्टी सीपीएन-यूएमएल
  • नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को टूटने से बचाने के लिए सांसदों और पार्टी नेताओं की आखिरी कोशिश

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Now 63 MPs of NCP come to reconcile between Oli and Prachanda, running signature campaign
KP sharma OLI and Pushp Kamal Dahal - फोटो : File Photo

विस्तार

जब किसी पार्टी के दो सबसे मजबूत नेता या शीर्ष नेतृत्व एक-दूसरे के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल लें और पार्टी की एकता ही खतरे में पड़ जाए, ऐसे में पार्टी के बाकी नेता और कार्यकर्ता क्या करें? ये सवाल पिछले कई दिनों से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में छाया हुआ है। हालत ये हो गई है कि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल प्रचंड के झगड़े को सुलझाने के लिए उनकी पार्टी के ढेर सारे सांसद सामने आ गए हैं।

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सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के ऐसे 63 सांसदों ने इसके लिए हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की है। इन सांसदों ने पूरे देश से पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं से हस्ताक्षर जुटाने की मुहिम चला रखी है, जिसमें ओली और प्रचंड से अपील की गई है कि वह निजी स्वार्थों के लिए पार्टी को न तोड़ें और पार्टी की एकता बरकरार रखें।

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अभी दो दिन पहले प्रचंड ने साफ तौर पर कहा था कि उनके और ओली के बीच के मतभेद बहुत गहरे हैं और इसके सुलझने के आसार नहीं दिख रहे। उन्होंने ये भी कहा था कि पार्टी कार्यकर्ता ‘बुरी से बुरी स्थिति’ के लिए तैयार रहें। प्रचंड ने ये भी साफ संकेत दिए कि ओली नई पार्टी बना सकते हैं। जबकि वो अंतिम वक्त तक पार्टी को टूटने से बचाने की कोशिश करते रहेंगे। जाहिर है कि प्रचंड सार्वजनिक तौर पर ये कहकर ये साबित करने की कोशिश में हैं कि पार्टी वो नहीं ओली तोड़ना चाहते हैं और कुर्सी के लिए ओली किसी भी हद तक जा सकते हैं।

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उधर पिछले कई महीनों से चल रही इन दोनों नेताओं के बीच की जंग पिछले दिनों पार्टी की स्थाई समिति और केंद्रीय समिति की आधी-अधूरी बैठकों के बाद खुलकर सामने आ चुकी थी। ओली ने पार्टी तोड़ने की धमकी भी दे डाली थी, लेकिन जब पिछले महीने की 18 तारीख को दोनों के बीच तथाकथित सहमति और समझौते की स्थिति बनी तो लगा शायद मामला सुलझ जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इस झगड़े में सबसे ज्यादा फजीहत हो रही है नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की, जिसने पहली बार इतने बड़े बहुमत से सरकार बनाई और नेपाल में कम्युनिस्ट शासन का एक इतिहास सा रचा। लेकिन कोविड-19 के बाद से यानी मार्च के बाद से जिस तरह ओली की मनमानियों से परेशान प्रचंड ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला, हालात बिगड़ते ही चले गए।

अब पार्टी को एकजुट रखने को लिए मोर्चा संभाला है खुद पार्टी के सांसदों और नेताओं ने। एनसीपी सांसद रामकुमारी झांकरी ने कहा है कि अब पार्टी को टूटने से बचाने के लिए ये हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है और इसमें अबतक 63 सांसदों ने दस्तखत कर दिए हैं।

दो दिन पहले पार्टी उपाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता बामदेव गौतम ने छह सूत्रीय प्रस्ताव देकर कहा था कि पार्टी की एकता के लिए बेहतर है कि ओली को अगले चुनाव तक प्रधानमंत्री बने रहने दिया जाए,  साथ ही वो पार्टी के सह अध्यक्ष भी रहें, दूसरी तरफ प्रचंड को अगले चुनाव तक पार्टी के सभी संवैधानिक अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव भी उन्होंने दिया।

लेकिन गौतम के प्रस्ताव को अव्यावहारिक मानते हुए रामकुमारी झाकरी ने कहा है कि यह कोई समाधान नहीं है और यह सिर्फ ऐसा है कि शरीर से किसी कैंसर वाले फोड़े को थोड़े वक्त के लिए निकाल दिया जाए। झाकरी ने कहा कि कम से कम 50 फीसदी सांसदों का हस्ताक्षर जुटाकर पार्टी एकता की कोशिश की जा रही है, फिलहाल कुछ सांसदों ने किसी न किसी बहाने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है।

हाल ही में पार्टी की स्थाई समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने दावा किया है कि ओली ने चुनाव आयोग में अपनी पुरानी पार्टी सीपीएन-यूएमएल को फिर से रजिस्टर करवाया है। इससे साफ है कि ओली एक बार फिर अपनी मूल पार्टी को अस्तित्व में लाना चाहते हैं, जिसका विलय दो साल पहले दहल की पार्टी के साथ हो गया था।


अलग पार्टी बनाने की कोशिश में लगे और बार-बार इसकी धमकी देने वाले ओली ने एनसीपी की बैठक को काफी वक्त से टालना तो शुरू कर ही दिया था, हाल ही में 28 जुलाई को होने वाली बैठक को भी उन्होंने अपनी मर्जी से रद्द कर दिया था। उधर पार्टी के प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ ने कहा है कि फिलहाल पार्टी का संकट दूर होता नहीं दिख रहा है।

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