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इस्राइल अब बढ़ रहा है ढाई साल के अंदर पांचवें चुनाव की ओर, क्या नेतन्याहू को मिलेगा फायदा?
Thu, 27 May 2021 03:59 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेल अवीव
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेल अवीव
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 27 May 2021 03:59 PM IST
सार
जानकारों के मुताबिक इस्राइल अभी अगले कई महीनों तक मौजूदा राजनीतिक गतिरोध का शिकार बना रहेगा। नेतन्याहू कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करते रहेंगे, जबकि उन पर घूस लेने और अमानत में खयानत करने के आरोपों में मुकदमा चल रहा है...
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इस्राइल
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
हाल में फिलीस्तीन पर हुए इस्राइली हमलों के बाद इस्राइल की अंदरूनी राजनीति के समीकरण बदल गए हैं। जब हमले शुरू हुए, उसके पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी खिसकती लग रही थी। पूर्व टीवी एंकर यायर लेपिड की मध्यमार्गी येश एतिड पार्टी के नेतृत्व में नई सरकार बनने की संभावना तब मजबूत हो गई थी। लेकिन 10 मई की शाम छह बजे से लड़ाई शुरू हो गई। फिलीस्तीनी गुट हमास ने इस्राइली शहर यरुशलम पर उस रोज कई रॉकेट दाग दिए। इससे देश का पूरा सियासी माहौल बदल गया। 11 दिन बाद जाकर युद्धविराम लागू हो सका।
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लड़ाई से बनी हालत ने यायर लेपिड के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। पहले उनके साथ गठबंधन में शामिल होने को तैयार हुई दक्षिणपंथी यामिना पार्टी ने दो रोज पहले ये कह दिया कि अब वह ऐसा नहीं करेंगी। यामिना के नेता नफताली बेनेट ने कहा कि लेपिड ने अपने गठबंधन में मुस्लिम पार्टी रा’म को भी शामिल किया है। वे इस पार्टी के साथ किसी गठबंधन में शामिल नहीं हो सकते। विश्लेषकों का कहना है कि बेनेट के इस रुख के बाद लेपिड के लिए बहुमत जुटाना मुश्किल हो गया है।
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थिंक टैंक इस्राइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष योहानन प्लेसनर ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘अगर हिंसा नहीं भड़कती तो संभवतया अभी तक देश में एक नई सरकार होती।’ अब स्थिति यह है कि अगर दो जून तक लेपिड बहुमत नहीं जुटा पाए, तो राष्ट्रपति रिउवेन रिवलिन प्रधानमंत्री चुनने का भार इस्राइली संसद- नेसेट पर डाल देंगे। इस्राइली संविधान के मुताबिक 120 सदस्यीय सदन में जो नेता बहुमत यानी 61 वोट हासिल करने में सफल होगा, वह अगला प्रधानमंत्री बनेगा। अगर कोई नेता इतना समर्थन नहीं जुटा पाया, तो देश नए चुनाव की तरफ बढ़ जाएगा। यह अप्रैल 2019 के बाद देश में पांचवां चुनाव होगा।
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जानकारों के मुताबिक इसका यह भी अर्थ होगा कि इस्राइल अभी अगले कई महीनों तक मौजूदा राजनीतिक गतिरोध का शिकार बना रहेगा। नेतन्याहू कार्यवाहक सरकार का नेतृत्व करते रहेंगे, जबकि उन पर घूस लेने और अमानत में खयानत करने के आरोपों में मुकदमा चल रहा है।
विश्लेषकों के मुताबिक हाल की लड़ाई से इस्राइली मतदाताओं की राय पर ज्यादा फर्क पड़ा हो, इसके संकेत नहीं हैं। प्लेसनर ने कहा- लड़ाई के समय इस्राइली जनता सुरक्षा बलों और राजनेताओं के पीछे एकजुट खड़ी हो जाती है। लेकिन ऐसे हालात से लोगों की राय अधिक उग्र हो जाती है। प्लेसनर ने कहा- ‘अब इस बात की संभावना कम है कि लोग समझौते से समाधान निकालने की बात को स्वीकार करेंगे। डर, अविश्वास और बदले की भावना हावी हो गई है। जाहिर है, इसका राजनीतिक लाभ उदारवादी ताकतों को नहीं, बल्कि चरमपंथी पार्टियों को मिलेगा।’
पिछले तीन दिनों में इस्राइल में दो जनमत सर्वेक्षणों के नतीजे बताए गए हैं। इसके मुताबिक मतदाताओं की राय अब भी बंटी हुई है। इन सर्वेक्षणों के मुताबिक लड़ाई से नेतन्याहू और उनकी लिकुड पार्टी को कोई लाभ हुआ नहीं दिखता। सर्वेक्षणों से यह भी सामने आया कि लगभग 50 फीसदी इस्राइली लोग मानते हैं कि हाल की लड़ाई में कोई पक्ष नहीं जीता। लगभग इतने ही लोगों ने राय जताई कि युद्धविराम लागू नहीं होना चाहिए था और फिलीस्तीनियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी जानी चाहिए थी। कई इस्राइली नेताओं के मीडिया सलाहकार रह चुके जेसॉन पर्लमैन ने राय जताई है कि पिछले कुछ हफ्तों की घटनाओं से चुनाव नतीजों पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। यानी सरकार गठन संबंधी जो समस्याएं हैं, वो बनी रहेंगी।