नेपाली रक्षा मंत्री ने दी भारत को चेतावनी, जरूरत पड़ी तो हमारी सेना लड़ भी सकती है

अतुल सिन्हा, अमर उजाला, काठमांडू Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 26 May 2020 04:32 PM IST

सार

  • भारत ने नेपाल की बातचीत के प्रस्तावों को लगातार ठुकराया, मनमानी की – पोखरेल
  • भारतीय सेना प्रमुख का बयान गैर जिम्मेदाराना, नेपाल किसी के इशारे पर नहीं चलता
  • हमारे गोरखा भारतीय सेना के लिए जान देते हैं, ऐसे बयान उनका मनोबल तोड़ने वाले
  • भारत एतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों की अनदेखी नहीं कर सकता, बातचीत से सुलझाए विवाद
Nepal Defence Minister Ishwar Pokhrel
Nepal Defence Minister Ishwar Pokhrel - फोटो : Social Media
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विस्तार

क्या नेपाल भारतीय सेना से मोर्चा लेने की तैयारी में है? क्या नेपाली रक्षा मंत्री और उप प्रधानमंत्री ईश्वर पोखरेल ने झंडा विवाद पर सचमुच भड़काने वाला बयान दिया है? और क्या भारत नेपाल रिश्तों के बीच ऐसी दरार पड़ चुकी है कि अब इसके बीच भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट को पिसना पड़ सकता है?
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दरअसल ये सारे सवाल ईश्वर पोखरेल के उस इंटरव्यू के बाद खड़े हुए हैं, जो उन्होंने नेपाल के ‘द राइजिंग नेपाल’ अखबार और पोर्टल को दिया है।

नेपाली उप प्रधानमंत्री ने ये इंटरव्यू भारतीय सेना प्रमुख एमएम नरवणे के उस बयान के बाद दिया है जिसमें उन्होंने कालापानी को लेकर नेपाल की भूमिका पर सवाल उठाए थे और कहा था कि नेपाल किसी और के इशारे पर ऐसा कर रहा है।


उनका इशारा सीधे तौर पर चीन की तरफ था। नेपाल में नरवणे के इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और अब पोखरेल ने अपनी सरकार की तरफ से इस इंटरव्यू के जरिये इस पूरे विवाद के पीछे की पूरी पृष्ठभूमि बताते हुए भारत पर लगातार इस मामले को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा कि हमने बार-बार भारत से इस बारे में बातचीत करने को कहा, लिपुलेख दर्रे से जाने वाली सड़क मार्ग के उद्घाटन के बाद भी हमने भारत से बातचीत के लिए अपना प्रस्ताव भी भेजा लेकिन बिना जमीनी हकीकत समझे भारत ने मनमानी की।

पोखरेल ने कहा कि सभी देशों की तरह नेपाल की भी कुछ ताकत और कमजोरी है। हमारे आकार को देखकर हमारी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। नेपाल नेपाल है और भारत भारत है। हम किसी के सामने अपनी आजादी और संप्रभुता की कीमत पर नहीं झुक सकते।

उन्होंने कहा कि हम अपना नक्शा बेहद तार्किक और पूरी परिपक्वता के साथ जारी करना चाहते थे। इसके लिए हम भारत से बातचीत की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन भारत ने कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाया।

हम शुरू से इस मसले को दोतरफा बातचीत के जरिए सुलझाना चाहते थे लेकिन जब दूसरा पक्ष आपकी भावनाओं का सम्मान नहीं करता तो ये महंगा पड़ता है।

उन्होंने कहा कि भारत का यह कहना सही नहीं था कि नेपाल से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि काली नदी के पश्चिम से सड़क बनाने पर वहां ऐसी तीखी प्रतिक्रिया होगी। भारत ने इसे द्विपक्षीय मामला न मानते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ दिया।

जबकि काली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा है न कि लिपुलेख। उन्होंने कहा कि हमें नहीं लगता कि भारत को यह एतिहासिक और भौगोलिक तथ्य नहीं पता होगा। इसलिए काली नदी का पूर्वी इलाका नेपाल की सीमा में आता है जबकि नदी के पश्चिमी किनारे का हिस्सा भारत में आता है जिसपर हम कभी अपना दावा नहीं करते।

ईश्वर पोखरेल ने कहा कि हमने पिछले साल भी भारत के पास बातचीत के लिए संदेश भेजा था, लेकिन भारत ने इसके तुरंत बाद 2 नवंबर को अपना राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शा जारी कर दिया।

उसके बाद भारत ने उस इलाके में हमारी प्रशासनिक गैरमौजूदगी और भौगोलिक विषमता का फायदा उठाया और चीन के साथ मिलकर तिब्बत के मानसरोवर तक सड़क बना दी। 12 मई को दिल्ली से ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसका उद्घाटन भी कर दिया।

उन्होंने बताया कि वो 16 और 17 फरवरी को धारचुला गए थे और सीमाई इलाकों का दौरा भी किया था, लेकिन पूरा इलाका बर्फ से ढका था और हमें इसकी भनक भी नहीं मिली कि भारत उस इलाके में मानसरोवर तक के लिए कोई सड़क बना रहा है।

पोखरेल ने भारतीय सेना प्रमुख के बयान को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि नेपाल ने कभी किसी देश के इशारे पर काम नहीं किया और न ही अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता किया है।

भारतीय सेना प्रमुख के पास ऐसा क्या सबूत है जो वो ऐसे आरोप लगाकर नेपाली जनता का अपमान कर सकते हैं। वह भूल जाते हैं कि भारतीय सेना के सबसे मजबूत और जुझारू दस्ते में हमारे गोरखा होते हैं जो जान की बाजी लगाकर भारत की रक्षा करते हैं।

सेना प्रमुख के इस बयान के बाद नेपाली गोरखाओं के मनोबल पर भी फर्क पड़ सकता है। उन्होंने नेपाली सेना की तारीफ करते हुए कहा कि जरूरत पड़ी तो नेपाली सेना किसी भी चुनौती के लिए तैयार है, वह लड़ सकती है।

अपने देश के लिए सिर्फ सेना ही नहीं पूरे नेपाल के लोग एक होकर अपनी लड़ाई लड़ सकते हैं।

लेकिन उन्होंने बार-बार ये भी कहा कि भारत हमारा दोस्त रहा है और हमें अब भी उम्मीद है कि वह बातचीत के जरिए मसले को हल करेगा। जो इलाके हमने गंवा दिए हैं, उसे भारत राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत के बाद वापस कर देगा।

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