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Nepal Politics: नेपाल में जाग उठे दशकों पुराने भूत, प्रधानमंत्री दहल की उड़ी नींद

Mon, 06 Mar 2023 02:43 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 06 Mar 2023 02:43 PM IST
सार

Nepal Politics: पर्यवेक्षकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश दहल के लिए बड़ा सिरदर्द पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दो वकीलों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। ये याचिकाएं गृह युद्ध के दौरान मारे गए 20 लोगों के परिजनों की तरफ से दायर की गई थीं...

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nepal Supreme court directs filing of two petitions against pushpa kamal Dahal party
Nepal Politics: नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अपनी सियासी पलटियों से राजनीतिक दलों झटका देने माहिर नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल को देश के सुप्रीम कोर्ट ने चिंता में डाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दहल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के खिलाफ दो याचिकाएं रजिस्टर करने का निर्देश दिया है। इन याचिकाओं में पार्टी के साथ-साथ दहल को भी अभियुक्त बनाया गया है। मामला नेपाल में चले गृह युद्ध के समय का है। कोर्ट ने गृह युद्ध दौरान हुई लगभग पांच हजार मौतों के लिए दहल और माओइस्ट सेंटर की जवाबदेह ठहराने की दो वकीलों की याचिका को रजिस्टर करने का निर्देश कोर्ट प्रशासन को दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई से माओइस्ट सेंटर में बेचैनी और घबराहट दोनों देखी जा रही है। रविवार को पार्टी महासचिव देव गुरुंग ने इस बारे में एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि माओइस्ट सेंटर ऐसी हर गतिविधि की कड़ी निंदा करती है, जो संविधान के विरुद्ध हो। साथ ही वह विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों के जरिए हासिल प्रगतिशील उपलब्धियों के खिलाफ होने वाली गतिविधियों की भी निंदा करती है।

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गुरुंग ने दावा किया कि याचिकाएं दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई हैं। यह न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत के खिलाफ है। साथ ही यह संविधान से मिले अभिव्यक्ति के आजादी के अधिकार का भी उल्लंघन करती हैं। उन्होंने कहा- ‘सत्य और मेलमिलाप आयोग और जबरन गायब किए गए लोगों की जांच के लिए बना आयोग संक्रमणकालीन न्यायिक कार्यवाही को आगे बढ़ा रहे हैं। इसलिए उन आयोगों के अधिकार क्षेत्र का कोई उल्लंघन नहीं होना चाहिए।’ इन दोनों आयोगों का गठन राजशाही और माओवादी विद्रोह के दौरान हुए अपराधों पर अंजाम तक पहुंचाना है।

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पर्यवेक्षकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश दहल के लिए बड़ा सिरदर्द पैदा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दो वकीलों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। ये याचिकाएं गृह युद्ध के दौरान मारे गए 20 लोगों के परिजनों की तरफ से दायर की गई थीं। बीते नवंबर में कोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं। तब वकीलों ने फिर से याचिका दायर की। इस पर सुनवाई करते हुए दो जजों की बेंच ने कोर्ट प्रशासन को नई याचिकाओं को रजिस्टर करने का आदेश दे दिया।

दोनों याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि दहल उन हत्याओं के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार थे, इसलिए उनके खिलाफ जरूरी कानूनी कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। एक याचिका में गुजारिश की गई है कि माओवादी विद्रोह के दौरान हुई सभी 17 हजार हत्याओं के लिए दहल को दोषी ठहराया जाए। एक अन्य याचिका में पांच हजार मौतों के लिए उन्हें दोषी ठहराने की दलील दी गई है।

जनवरी 2020 में माघी त्योहार के दिन हुए एक समारोह में दहल ने कहा था कि माओवादी पार्टी के नेता के तौर पर वे पांच हजार मौतों की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। बाकी मौतों की जिम्मेदारी सरकार पर डाली जानी चाहिए। नेपाल में दहल के नेतृत्व में एक दशक तक माओवादी विद्रोह चला था। उस दौरान ये सभी मौतें हुई थीं। अब तक यह मामला सत्य और मेलमिलाप आयोग के दायरे में था। अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दायरे में ले लिया है।

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