Nepal Politics: नेपाल में फिर राजनीतिक अस्थिरता की आहट, सत्ताधारी गठबंधन में लगी पहली सेंध
रवि लमिछाने ने शुक्रवार को एलान किया- ‘हमें जनता की अपेक्षाओं और जनादेश का सम्मान करना चाहिए। उप चुनाव में हमें मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने और अपनी पार्टी के संगठन को मजबूत करने का जनादेश मिला है।’
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रवि लमिछाने की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने पुष्प कमल दहल सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के नेतृत्व वाले गठबंधन से नाता तोड़कर फिर से नेपाली कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के बाद प्रधानमंत्री दहल को लगा यह पहला बड़ा झटका है।
रवि लमिछाने ने शुक्रवार को एलान किया- ‘हमें जनता की अपेक्षाओं और जनादेश का सम्मान करना चाहिए। उप चुनाव में हमें मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने और अपनी पार्टी के संगठन को मजबूत करने का जनादेश मिला है।’ उन्होंने कहा कि आरएसपी जनता को यह दिखाएगी कि रचनात्मक विपक्ष की भूमिका कैसे निभाई जाती है।
पिछले महीने तीन संसदीय क्षेत्रों में उप चुनाव हुए थे। उनमें से दो में आरएसपी के उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से सत्ताधारी गठबंधन के उम्मीदवारों को हरा दिया। उसके बाद प्रधानमंत्री दहल ने रवि लमिछाने को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने की इच्छा जताई थी। लेकिन बुधवार को जब मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, तो लमिछाने का नाम मंत्रियों की सूची में शामिल नहीं था। उस रोज तीन नए मंत्री बने, जो सभी नेपाली कांग्रेस के हैं।
आम चुनाव के बाद पिछले दिसंबर में जब दहल ने यूएमएल के साथ हाथ मिलाकर सरकार बनाई थी, तो लमिछाने की पार्टी उसका हिस्सा थी। लेकिन बाद में उन्होंने यह गठबंधन तोड़कर फिर से नेपाली कांग्रेस से हाथ मिला लिया। तब वे लमिछाने की पार्टी को नए गठबंधन में भी ले आए। इस बीच लमिछाने की नागरिकता को लेकर विवाद उठ चुका था। इसलिए दहल ने लमिछाने को मंत्री नहीं बनाया। अब वो विवाद हल चुका है।
आरएसपी के चीफ व्हिप संतोष परियार ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘हम अपनी ताकत और लोकप्रियता के आधार पर सरकार में उचित हिस्सेदारी चाहते थे। लेकिन हाल की राजनीतिक घटनाओं के बाद हमने देखा कि यह संभव नहीं है।’ आरएसपी के इस फैसले के बाद नेपाल में इस सवाल पर बहस खड़ी हो गई है कि क्या अब प्रधानमंत्री को फिर से संसद में विश्वास-मत हासिल करना चाहिए। इस मामले में संविधन विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आई है। विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी ने कहा है कि संविधान के मुताबिक प्रधानमंत्री के लिए दोबारा विश्वास-मत हासिल करना तब अनिवार्य होता है, अगर मंत्रिमंडल में शामिल कोई दल सरकार से समर्थन वापस ले।
लेकिन नेपाल लॉ कैंपस में पहले एसोसिएट प्रोफेसर रह चुके गणेश दत्त भट्ट के मुताबिक अतीत में ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री फिर से विश्वास-मत हासिल करने की मिसाल कायम कर चुके हैं। उन्होंने कहा- ‘प्रधानमंत्री के पक्ष में बहुमत है या नहीं, इसका परीक्षण सदन में होना चाहिए। इसको लेकर हम हम सदन के बाहर अनुमान नहीं लगा सकते।’ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक आरएसपी का सत्ता पक्ष से खुद को पूरी तरह अलग करने का फैसला उसके लिए सियासी तौर पर फायदेमंद हो सकता है। इस पार्टी ने पिछले आम चुनाव में अप्रत्याशित सफलता हासिल कर सबको चौंका दिया था। उप-चुनाव के नतीजे भी उसके पक्ष में रहे। ऐसे में मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा कर वह अपनी सियासी जमीन का और विस्तार करने की स्थिति में होगी।