नेपाल: प्रधानमंत्री देउबा की पार्टी में उभरे मतभेद, कोइराला गुट ने बढ़ाया दबाव
विश्लेषकों की राय है कि सत्ताधारी दल में उभरे मतभेदों से विपक्ष को खुशी होगी। अगर प्रधानमंत्री देउबा ने कोइराला खेमे को संतुष्ट करने के जल्द कदम नहीं उठाए, तो मतभेद और बढ़ सकते हैं, जिसका असर नेपाली कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर पड़ सकता है...
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शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली सालगिरह मनाने की तैयारी में हैं। लेकिन इसी वक्त उनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस में असंतोष की आवाजें उठती दिख रही हैं। देउबा नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं। अब पार्टी में उनके विरोधी खेमे ने उन पर कड़ा हमला बोला है। उसने प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों रूपों में देउबा की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।
नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेखर कोइराला पहले से देउबा विरोधी खेमे के नेता रहे हैं। कोइराला पहले भी देउबा की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन इस बार जिस संगठित ढंग से उन्होंने हमला बोला, उसने सबका ध्यान खींचा है। समझा जाता है कि देउबा ने अपने विरोधी खेमे को सत्ता में हिस्सेदारी देने की कोशिश नहीं की। इसकी वजह से पार्टी का मतभेद अब खुल कर सामने आ गया है। पिछले साल नेपाली कांग्रेस के सम्मेलन में कोइराला ने पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था, लेकिन वे देउबा से हार गए थे।
खराब आर्थिक स्थिति को लेकर देउबा की आलोचना
देउबा गुट ने गुरुवार को अपनी एक खास बैठक आयोजित की। उसमें प्रधानमंत्री के रूप में देउबा की भूमिका की समीक्षा की गई। उसमें इस बात की आलोचना की गई कि पार्टी के महाधिवेशन के छह महीने बाद भी देउबा ने पार्टी की सेंट्रल वर्किंग कमेटी का पूरा गठन नहीं किया है। बैठक में शामिल हुए नेताओं ने अखबार काठमांडू पोस्ट को बताया कि कोइराला ने देश की खराब आर्थिक स्थिति को लेकर भी प्रधानमंत्री की आलोचना की। उन्होंने कहा- दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने हालात को सुधारने के कदम नहीं उठाए हैं।
कोइराला गुट की बैठक में इस बात की खास चर्चा हुई कि सरकार नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन को किसी प्राइवेट कंपनी को बेचने की तैयारी में है। इस बारे में प्रधानमंत्री से सफाई मांगने का फैसला हुआ। कोइराला खेमे के एक नेता ने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘देउबा विपक्ष के प्रति तो बड़े कृपालु रहते हैं, लेकिन हम से निर्मम तरीके से पेश आते हैं। जिस समय तमाम तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं, उस समय वे अपना मुंह, आंख और कान बंद नहीं रख सकते। अगर देउबा जरूरी कदम उठाने में नाकाम रहे, तो हमें उसकी कीमत अगले आम चुनाव में चुकानी होगी।’ नेपाल में इस साल के अंत में आम चुनाव होने वाले हैं।
बताया दबाव डालने की रणनीति
देउबा खेमे ने कोइराला खेमे की बैठक को दबाव डालने की उसकी रणनीति का हिस्सा बताया है। देउबा समर्थकों का कहना है कि कोइराला गुट पार्टी की सेंट्रल कमेटी, संसदीय समिति और दूसरी समितियों में अपने अधिक लोगों को रखवाना चाहता है। इसीलिए उसने दबाव डालने का तरीका अपनाया है। देउबा खेमे के एक नेता काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘अब चुनाव आ रहे हैं। कोइराला गुट को अंदेशा है कि 25 सदस्यीय संसदीय समिति उससे जुड़े लोगों को टिकट नहीं देगी। संसदीय समिति में देउबा खेमे का वर्चस्व है।’
विश्लेषकों की राय है कि सत्ताधारी दल में उभरे मतभेदों से विपक्ष को खुशी होगी। अगर प्रधानमंत्री देउबा ने कोइराला खेमे को संतुष्ट करने के जल्द कदम नहीं उठाए, तो मतभेद और बढ़ सकते हैं, जिसका असर नेपाली कांग्रेस की चुनावी संभावनाओं पर पड़ सकता है।