नेपाल: घिरते जा रहे हैं प्रधानमंत्री देउबा, अब निर्वाचन आयोग ने भी दिखाई आंखें
आयोग के सूत्रों ने आशंका जताई है कि सरकार संभवतया अध्यादेश के जरिए संशोधन लागू करना चाहती है, इसीलिए उसने आयोग की राय नहीं मांगी है। संविधान विशेषज्ञों ने कहा है कि जब संसद का सत्र ना चल रहा हो, तब सरकार अध्यादेश जारी कर सकती है। लेकिन अभी संसद का सत्र चल रहा है। ऐसे में अभी अगर सरकार ने अध्यादेश जारी किया, तो उसे दुर्भावना से प्रेरित ही समझा जाएगा...
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स्थानीय चुनाव के समय के मसले पर नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के दखल देने के बाद अब संकेत है कि निर्वाचन आयोग भी अड़ गया है। उसने चुनावों को अपनी योजना के मुताबिक कराने के इरादे पर आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं। निर्वाचन आयोग ने अगले 27 अप्रैल को इन चुनावों को कराने की योजना पेश की है। वैसे उसने कहा है कि अगर सरकार चाहे, तो इन चुनावों को दो चरण में 27 अप्रैल और पांच मई को कराया जा सकता है।
इस बीच चुनाव टलवाने की सत्ताधारी गठबंधन की कोशिशों के खिलाफ प्रमुख विपक्षी दल- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) ने भी आक्रामक रुख अपना लिया है। पार्टी ने शुक्रवार को दो टूक कहा कि चुनाव टालना कानून के राज के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
बुलाई जाएगी गठबंधन की बैठक
पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस मुद्दे पर सत्ताधारी गठबंधन बुरी तरह उलझ गया दिखता है। इस मसले पर शुक्रवार को प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) के नेता पुष्प कमल दहल, और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (सोशलिस्ट यूनिफाइड) के नेता माधव कुमार नेपाल की बैठक हुई। बताया जाता है कि उसमें इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए पूरे गठबंधन की बैठक बुलाने पर सहमति बनी। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में कुल पांच दल शामिल हैं।
विश्लेषकों ने कहा है कि इस प्रकरण ने यह बड़ा सवाल उठा दिया है कि क्या चुनाव की तारीखें तय करने का अधिकार राजनीतिक दलों को होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि अगर ये काम भी राजनीतिक दल करेंगे, तो फिर निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की क्या भूमिका रहेगी? पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त भोजराज पोखारेल के मुताबिक परंपरा यही रही है कि चुनाव का कार्यक्रम शुरुआती तौर पर निर्वाचन आयोग तैयार करता है। उन्होंने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘आखिरकार चुनाव कार्यक्रम पर अमल कराना निर्वाचन आयोग की ही जिम्मेदारी है।’
इसके पहले खबर आई थी कि स्थानीय चुनावों को टालने के लिए सत्ताधारी गठबंधन ने संबंधित कानून में संशोधन का मन बनाया है। लेकिन मुख्य निर्वाचन आयुक्त दिनेश थपलिया ने शुक्रवार को कहा कि इस बारे में आयोग से कोई राय-मशविरा नहीं किया गया है। आयोग के सूत्रों ने आशंका जताई है कि सरकार संभवतया अध्यादेश के जरिए संशोधन लागू करना चाहती है, इसीलिए उसने आयोग की राय नहीं मांगी है।
संसद सत्र में अध्यादेश नहीं
थपलिया ने कहा- ‘हम अपने प्रस्ताव के मुताबिक समय पर चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम चुनाव टालने के लिए अपनी योजना में किसी फेरबदल के पक्ष में नहीं हैं।’ संविधान विशेषज्ञों ने कहा है कि जब संसद का सत्र ना चल रहा हो, तब सरकार अध्यादेश जारी कर सकती है। लेकिन अभी संसद का सत्र चल रहा है। ऐसे में अभी अगर सरकार ने अध्यादेश जारी किया, तो उसे दुर्भावना से प्रेरित ही समझा जाएगा।
वैसे पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि नेपाल में अध्यादेश जारी करने के मामले में सरकारों का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है। इस सिलसिले में यह भी आशंका जताई जा रही है कि देउबा सरकार पहले सदन का सत्रावसान करने के बाद अध्यादेश जारी कर कर सकती है। विपक्षी दल यूएमएल लगातार सदन में रुकावट डाल रहा है। इसे सत्रावसान करने का बहाना बनाया जा सकता है। लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर सरकार इस हद तक गई, तो वह सियासी रूप से और ज्यादा घिर जाएगी।