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विवादित नक्शा: चीन का दखल, चुनाव का डर और सस्ती लोकप्रियता ने बढ़ाई ओली सरकार की हिम्मत

Mon, 15 Jun 2020 06:11 AM IST
श्रीधर मिश्रा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो Published by: श्रीधर मिश्रा Updated Mon, 15 Jun 2020 06:11 AM IST
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Nepal disputed map case: China's interference, fear of elections and cheap popularity increase Oli government's courage
KP Sharma Oli and Xi Jinping - फोटो : File Photo

नेपाल और भारत के नेतृत्व के बीच मतभेद के बावजूद सीमा विवाद का स्थायी समाधान तलाशने के लिए दोनों देशों के पास बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। नेपाल के रक्षा विशेषज्ञों और पत्रकारों ने हालिया तनाव पर राय देते हुए कहा कि ओली सरकार ने राष्ट्रवाद के नाम पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए विवादित नक्शा पेश किया है। घरेलू राजनीति, चीन से मिल रहे मजबूत आर्थिक समर्थन और भारत की शालीनता ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को दशकों पुराने सीमा विवाद को आगे बढ़ाने की हिमाकत करने की हिम्मत दी। उनके इस कदम से नेपाल और भारत के रिश्तों में इतनी तल्खी आई है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञों ने रविवार को यह बात कही।

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ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट सरकार ने शनिवार को देश के निचले सदन से भारतीय हिस्सों लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने देश का क्षेत्र दिखाने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करा लिया। उसके इस अप्रत्याशित कदम ने साबित कर दिया कि वह भारत के साथ दशकों पुराने सांस्कृतिक, राजनीतिक और व्यापारिक संबंधों को अब लंबे समय तक पुराने ढंग से भाव नहीं देगा।
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नेपाल में 2008 से 2011 तक भारतीय राजदूत रहे राकेश सूद का कहना है कि दोनों ही पक्षों ने अपने संबंधों को इतने खतरनाक स्तर पर आने की छूट दी। भारत को काठमांडो के साथ संपर्क साधना चाहिए था क्योंकि वह नवंबर से ही इस मुद्दे पर बातचीत पर जोर दे रहा था। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हमने संवेदनशीलता नहीं दिखाई और अब नेपाली खुद को ऐसे दलदल में पा रहे हैं जहां से उनका निकलना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा कि हमारा चीन के साथ भी सीमा विवाद है और हमारी सेनाएं आमने सामने आ रही हैं। पाकिस्तान के साथ भी विवाद है और हमारी सेनाएं आपस में भिड़ती रहती है और नियंत्रण पर गोलीबारी होती रहती है। ऐसे में हम नेपाल के साथ सीमा पर विवाद से क्या देखना चाहते हैं जबकि दोनों देशों के बीच सीमा पूरी तरह से खुली हुई है और ब्रिटिश काल से दोनों देशों के लोग बिना किसी रोकटोक के आ जा रहे हैं।

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चीन का प्रभुत्व बढ़ा

नेपाल के इस कदम के पीछे चीन का हाथ होने पर सूद ने कहा कि वह नहीं मानते कि काठमांडो ने यह मुद्दा चीन की ओर से उठाया है लेकिन हाल के सालों में नेपाल में चीन का प्रभुत्व बढ़ा है। 2015 में नेपाल के खिलाफ भारत के आर्थिक नाकाबंदी के बाद से चीन ने नेपाल में बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधन झोंके हैं। पेट्रोलियम और अन्य उत्पादों के परिवहन के लिए चीन नई सड़कें बना रहा है। काठमांडो और तिब्बत में शिगात्से को जोड़ने के लिए रेलवे नेटवर्क खड़ा करने की योजना है। साथ ही उसने नेपाल के लिए सामनों की शिपमेंट को चार बंदरगाहों की पेशकश की है। पहले यह शिपमेंट भारत के जरिए होता था।  

अब नेपाल से अलग ढंग से निपटना होगा

जाने माने सामरिक मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर एसडी मुनि का कहना है कि नेपाल के कदम का बहुत बड़ा संदेश है कि वह पुराने ढर्रे पर वह नहीं चलेगा। वह अब दशकों पुराने संबंधों को भाव नहीं देते हैं। उनसे अब अलग ढंग से निपटना होगा, थोड़ा और संवेदनशीलता और थोड़ी और समझ के साथ। यह नया नेपाल है। 65 फीसदी से अधिक नेपाली युवा हैं। वे पहले की बातों की परवाह नहीं करते हैं। उनकी अपनी महत्वाकांक्षा हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि कई मामलों में भारत ने शालीनता का परिचय दिया और अपने इस छोटे पड़ोसी देश के साथ डील करने में अति आत्मविश्वास दिखाया। नेपाल इसका अपवाद नहीं है।

वार्ता शुरू होने के बाद भी ओली नक्शे के मुद्दे को आगे बढ़ाते

नेपाल में 2013 और 2017 की शुरुआत में नेपाल में राजदूत रहे रंजीत रे का कहना है कि पीएम ओली ने घरेलू राजनीति में खुद की स्थिति सुदृढ़ करने के लिए नए नक्शे पर आगे बढ़ने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर बातचीत होने के बाद भी ओली इस पर आगे बढ़ते। भारत विरोधी भावनाओं ने उन्हें पहले भी चुनाव में जीत दिलाई है और घरेलू दबावों के चलते फिर से उसी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। नेपाल में ओली की स्थिति काफी कमजोर है। आर्थिक मोर्चे, कोरोना से निपटने में उनकी सरकार की नाकामी के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां तक नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर नेतृत्व बदलाव तक की अफवाहें हैं। ऐसे में यह फैसला ओली के लिए जीवनदान बन सकता है। नेपाल के इस फैसले ने सीमा विवाद के समाधान को और अधिक जटिल बना दिया है।

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