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'भारत-चीन सीमा विवाद से सबक लेने की जरूरत, क्योंकि दुर्भाग्य से हम गलत निकले'
Wed, 01 Jul 2020 04:55 AM IST
योगेश साहू
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Wed, 01 Jul 2020 04:55 AM IST
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डोनाल्ड ट्रंप और एनएसए
- फोटो : Twitter
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पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर भारत के साथ जारी तनाव ने एक बार फिर साबित किया है कि चीन दूसरे देशों का सम्मान नहीं करता और वो जो भी कहता है, उसका कोई अर्थ नहीं होता। कई विशेषज्ञ भी चेता चुके हैं कि भारत-चीन सीमा तनाव से कई देशों को सबक लेने की जरूरत है।
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अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट सी ओ'ब्रायन ने कहा, आखिरकार अमेरिका चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और उससे खतरे को समझ चुका है। हमारा मानना था कि जैसे चीन समृद्ध और मजबूत होगा, कम्युनिस्ट पार्टी अपने लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को पूरा करेगी, लेकिन दुर्भाग्य से हम गलत निकले।
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1930 के दशक के बाद से अमेरिकी विदेशी नीति की यह सबसे बड़ी असफलता है। हमने इस तरह की गलती कैसे की? हम चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का स्वभाव समझने में कैसे चूक गए? इसका जवाब सरल है क्योंकि हमने कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा पर ध्यान नहीं दिया। कम्युनिस्ट पार्टी अपने लोगों पर पूरा नियंत्रण करना चाहती है।
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चाहे वह आर्थिक नियंत्रण हो या राजनीतिक, चाहे शारीरिक नियंत्रण हो या मानसिक। उसका एकमात्र मकसद पूर्ण नियंत्रण करना है। 15 जून को गलवां घाटी में हुई बर्बरता चीन के व्यवहार को लेकर काफी कुछ बयां करती है। चीन अब पहले से अधिक विस्तारवादी और आक्रामक है।
शांग्री ला डायलॉग सीनियर फेलो फॉर एशिया पैसेफिक सिक्योरिटी डॉ. युआन ग्राहम कहते हैं, मौजूदा समय में चीन कई मोर्चों पर जुटा है। हांगकांग, ताइवान, भारत के साथ सैन्य गतिरोध और दक्षिणी चीन सागर। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता है कि उसका अगला कदम क्या होगा। दुर्भाग्य से चीन अब उस क्षेत्र पर दावा कर रहा है, जो कभी उसका था ही नहीं।
एलएसी पर चीनी सेना की गतिविधियां दर्शाती हैं कि यह एक सोची समझी योजना के तहत किया जा रहा है। हालांकि अपनी अधिक आक्रामकता के बावजूद चीन भारत से सशस्त्र टकराव नहीं चाहता है। दरअसल उसकी प्राथमिकता कुछ और है। शायद ताइवान या दक्षिण चीन सागर। गलवां में जो कुछ हुआ वे अप्रत्याशित था, लेकिन शायद इसके लिए चीन तैयार था।
एशिया में वैकल्पिक अवसर तलाश रहा चीन
दरअसल, कोरोना को लेकर चीन दुनियाभर के निशाने पर है। विशेषज्ञों का कहना है कोरोना के बाद से अमेरिका के साथ उसके रिश्ते बिगड़ चुके हैं। लिहाजा उसका मानना है कि उसके पास खोने को कुछ नहीं है। साथ ही वह एशियाई क्षेत्र में अपने वैकल्पिक अवसरों को तलाश रहा है और अपनी मजबूत छवि पेश करना चाहता है।