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म्यांमार: करेन जातीय विद्रोही संगठन को घोषित किया गया आतंकी संगठन; चुनाव से पहले सेना का बड़ा कदम
Fri, 29 Aug 2025 12:00 PM IST
शिव शुक्ला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नैपिडो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नैपिडो
Published by: शिव शुक्ला
Updated Fri, 29 Aug 2025 12:00 PM IST
सार
केएनयू 1948 में म्यांमार के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद से ही अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ता रहा है। म्यांमार के दक्षिण-पूर्व में स्थित यह समूह 2021 में म्यांमार की निर्वाचित सरकार के सैन्य अधिग्रहण के बाद हुए गृहयुद्ध में सेना के खिलाफ विशेष रूप से भीषण लड़ाई में शामिल रहा है।
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म्यांमार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
लंबे समय से गृहयुद्ध का दंश झेल रहे म्यांमार में सेना ने दिसंबर में चुनाव कराने का एलान किया है, लेकिन उससे भी पहले वहां की सैन्य सरकार ने प्रमुख जातीय विद्रोही संगठन करेन नेशनल यूनियन (KNU) को लेकर बड़ा कदम उठाया है। सेना ने केएनयू को आतंकी संगठन घोषित कर दिया। सैन्य सरकार के इस फैसले के बाद इस संगठन से जुड़े किसी भी व्यक्ति या उससे संपर्क रखने को अब गैरकानूनी माना जाएगा।
म्यांमार की सरकारी मीडिया ने सैन्य सरकार के इस एलान के बारे में बताया। उसने कहा कि केएनयू ने सामान्य नागरिक सुरक्षा, जान-माल और बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। जिसके कारण उसे आतंकी संगठन घोषित किया गया।
बता दें कि यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सेना 28 दिसंबर से राष्ट्रीय चुनाव कराने की तैयारी कर रही है। आलोचकों का कहना है कि ये चुनाव सिर्फ तख्तापलट को वैध ठहराने का तरीका हैं, खासकर तब जब सेना ने आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को भंग कर दिया है।
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केएनयू ने खारिज किया एलान, कहा- हमें परवाह नहीं
वहीं, दूसरी ओर केएनयू के प्रवक्ता प्रवक्ता पादोह साव ताव नी ने सेना के इस एलान को खारिज कर दिया है। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि समूह को इस घोषणा की कोई परवाह नहीं है। उन्होंने कहा कि सेना खुद अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अपराधों के लिए दोषी ठहराई जा चुकी है। ऐसे में यह साबित करने की भी जरूरत नहीं है कि असली आतंकवादी और अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कौन हैं, और गैरकानूनी संगठन कौन हैं।
केएनयू ने खाई है राष्ट्रीय चुनावों को बाधित करने की कसम
बता दें कि केएनयू ने 28 दिसंबर से शुरू होने वाले राष्ट्रीय चुनावों को बाधित करने की कसम खाई है। संगठन पहले ही चुनाव का बहिष्कार और विफल करने की चेतावनी दे चुका है, लेकिन अब इस नए आदेश से शांतिपूर्ण अभियान भी अपराध की श्रेणी में आ जाएंगे। सैन्य सरकार ने हाल ही में चुनावी कानून में प्रावधान किया है जिसके तहत चुनाव में बाधा डालने वालों को मृत्युदंड तक दिया जा सकता है।
अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ रहा है केएनयू
केएनयू 1948 में म्यांमार के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद से ही अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ता रहा है। म्यांमार के दक्षिण-पूर्व में स्थित यह समूह 2021 में म्यांमार की निर्वाचित सरकार के सैन्य अधिग्रहण के बाद हुए गृहयुद्ध में सेना के खिलाफ विशेष रूप से भीषण लड़ाई में शामिल रहा है। इसका सशस्त्र धड़ा करेन नेशनल लिबरेशन आर्मी (KNLA) लोकतंत्र समर्थक युवाओं को ट्रेनिंग देता है। करेन सहित कई अल्पसंख्यक जातीय समूह दशकों से अधिक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं। 2015 में उन्होंने अर्ध-नागरिक सरकार के साथ युद्धविराम समझौता किया था, लेकिन 2021 की सत्ता-पलट के बाद उन्होंने सेना समर्थित शांति वार्ता का बहिष्कार कर दिया। केएनयू अब सेना की राजनीति से वापसी, संघीय लोकतंत्र की स्थापना और अंतरराष्ट्रीय दखल की मांग कर रहा है।
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म्यांमार की सरकारी मीडिया ने सैन्य सरकार के इस एलान के बारे में बताया। उसने कहा कि केएनयू ने सामान्य नागरिक सुरक्षा, जान-माल और बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। जिसके कारण उसे आतंकी संगठन घोषित किया गया।
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बता दें कि यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सेना 28 दिसंबर से राष्ट्रीय चुनाव कराने की तैयारी कर रही है। आलोचकों का कहना है कि ये चुनाव सिर्फ तख्तापलट को वैध ठहराने का तरीका हैं, खासकर तब जब सेना ने आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को भंग कर दिया है।
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केएनयू ने खारिज किया एलान, कहा- हमें परवाह नहीं
वहीं, दूसरी ओर केएनयू के प्रवक्ता प्रवक्ता पादोह साव ताव नी ने सेना के इस एलान को खारिज कर दिया है। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि समूह को इस घोषणा की कोई परवाह नहीं है। उन्होंने कहा कि सेना खुद अंतरराष्ट्रीय अदालतों में अपराधों के लिए दोषी ठहराई जा चुकी है। ऐसे में यह साबित करने की भी जरूरत नहीं है कि असली आतंकवादी और अंतर्राष्ट्रीय अपराधी कौन हैं, और गैरकानूनी संगठन कौन हैं।
केएनयू ने खाई है राष्ट्रीय चुनावों को बाधित करने की कसम
बता दें कि केएनयू ने 28 दिसंबर से शुरू होने वाले राष्ट्रीय चुनावों को बाधित करने की कसम खाई है। संगठन पहले ही चुनाव का बहिष्कार और विफल करने की चेतावनी दे चुका है, लेकिन अब इस नए आदेश से शांतिपूर्ण अभियान भी अपराध की श्रेणी में आ जाएंगे। सैन्य सरकार ने हाल ही में चुनावी कानून में प्रावधान किया है जिसके तहत चुनाव में बाधा डालने वालों को मृत्युदंड तक दिया जा सकता है।
अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ रहा है केएनयू
केएनयू 1948 में म्यांमार के ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद से ही अधिक स्वायत्तता के लिए लड़ता रहा है। म्यांमार के दक्षिण-पूर्व में स्थित यह समूह 2021 में म्यांमार की निर्वाचित सरकार के सैन्य अधिग्रहण के बाद हुए गृहयुद्ध में सेना के खिलाफ विशेष रूप से भीषण लड़ाई में शामिल रहा है। इसका सशस्त्र धड़ा करेन नेशनल लिबरेशन आर्मी (KNLA) लोकतंत्र समर्थक युवाओं को ट्रेनिंग देता है। करेन सहित कई अल्पसंख्यक जातीय समूह दशकों से अधिक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं। 2015 में उन्होंने अर्ध-नागरिक सरकार के साथ युद्धविराम समझौता किया था, लेकिन 2021 की सत्ता-पलट के बाद उन्होंने सेना समर्थित शांति वार्ता का बहिष्कार कर दिया। केएनयू अब सेना की राजनीति से वापसी, संघीय लोकतंत्र की स्थापना और अंतरराष्ट्रीय दखल की मांग कर रहा है।