{"_id":"6026812e8ebc3ee964416071","slug":"myanmar-military-rulers-being-backed-by-china-russia-and-other-neighbouring-countries","type":"story","status":"publish","title_hn":"पश्चिम के दबाव से बेपरवाह क्यों हैं म्यांमार के सैनिक शासक? इन देशों की शह पर बढ़ रहा है तानाशाहों का हौसला","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
पश्चिम के दबाव से बेपरवाह क्यों हैं म्यांमार के सैनिक शासक? इन देशों की शह पर बढ़ रहा है तानाशाहों का हौसला
Fri, 12 Feb 2021 06:52 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, संयुक्त राष्ट्र
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, संयुक्त राष्ट्र
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 12 Feb 2021 06:52 PM IST
सार
सैनिक तख्ता पलट के बाद म्यांमार पर नए ठोस प्रति सिर्फ अमेरिका ने लगाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने बुधवार को अमेरिका में जमा एक अरब डॉलर के कोष को सैनिक जनरलों की पहुंच से बाहर करने का एलान किया था...
विज्ञापन
Protest in Myanmar
- फोटो : PTI (फाइल फोटो)
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
म्यांमार के सैनिक शासकों के खिलाफ पश्चिमी देशों ने दबाव बढ़ाया है, लेकिन सैनिक शासक इससे बेपरवाह दिखते हैं। देश के अंदर भी सैनिक तख्ता पलट का जोरदार विरोध होने की खबर है। लेकिन ऐसा लगता है कि सैनिक शासकों को ये तमाम प्रतिक्रियाएं फौरी लगती हैं। उन्हें भरोसा है कि समय गुजरने के साथ देश और विदेश में विरोध थम जाएगा। विदेश में चीन, पास-पड़ोस के पूर्वी एशियाई देशों और रूस के नरम रुख से भी उनका हौसला बढ़ा है।
विज्ञापन
अब ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट पर अफसोस जताने का एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद में पेश किया है। इस तरह उन्होंने अपने पहले के प्रस्ताव की भाषा नरम कर दी है। प्रस्ताव के पहले के मसविदे में सैनिक तख्ता पलट की कड़े शब्दों में निंदा करने की बात कही गई थी। प्रस्ताव की भाषा में बदलाव इसलिए किया गया, क्योंकि 47 सदस्यीय इस संस्था में इसके पास होने की संभावना नहीं देखी गई। ब्रिटेन और ईयू को अंदेशा था कि रूस और चीन दोनों उस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते। वैसे अभी यह तय नहीं है कि प्रस्ताव का नया संस्करण भी आसानी से पारित हो जाएगा।
विज्ञापन
प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र से मानव अधिकारों के जांचकर्ता थॉमस एंड्र्यूस को म्यांमार भेजने की अपील की गई है। कहा गया है कि म्यांमार एंड्र्यूस को तुरंत अपने यहां आने और वहां उन्हें निर्बाध ढंग से काम करने की इजाजत दे। एंड्रयूस ने बुधवार को कहा था कि पुलिस और सेना का यह दायित्व है कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर अत्यधिक ताकत का इस्तेमाल करने से बचें। उन्होंने कहा था कि ज्यादतियों के पीछे आदेश पालन की दलील किसी का कोई बचाव नहीं हो सकती।
विज्ञापन
सैनिक तख्ता पलट के बाद म्यांमार पर नए ठोस प्रति सिर्फ अमेरिका ने लगाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने बुधवार को अमेरिका में जमा एक अरब डॉलर के कोष को सैनिक जनरलों की पहुंच से बाहर करने का एलान किया था। अब ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक रॉब ने कहा है कि ब्रिटेन भी म्यांमार पर पहले जारी पाबंदियों को और सख्त बनाने पर विचार कर रहा है। यूरोपियन यूनियन के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बॉरेल कहा है कि ईयू म्यांमार पर नए प्रतिबंध लगा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पिछले हफ्ते नेशनल लीड फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सान सू ची और तख्ता पलट के समय हिरासत में लिए गए दूसरे नेताओं को तुरंत रिहा करने की मांग की थी। लेकिन परिषद के प्रस्ताव में तख्ता पलट की निंदा करने की बात नहीं थी।
इस बीच म्यांमार में रोजमर्रा के स्तर पर जन प्रदर्शन जारी हैं। गुरुवार ऐसा लगातार छठ दिन रहा, जब राजधानी नेपयीदाव में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने एक समाचार एजेंसी से कहा कि उनका विरोध कुछ दिन या हफ्तों की बात नहीं है। बल्कि यह आंग सान सू ची और राष्ट्रपति यू विन मिन्त की रिहाई तक जारी रहेगा।
सैनिक तख्ता पलट के नेता जनरल मिन आंग हलैंग ने सत्ता हथियाने के बाद पहली बार गुरुवार को एक सार्वजनिक बयान दिया। इसमें उन्होंने सरकारी कर्मचारियों से दफ्तरों में लौटने की अपील की। साथ ही उन्होंने कहा कि सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों से कोरोना वायरस फैलने का खतरा है।
विदेशी मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक अब ये अंदेशा है कि अगर जन प्रदर्शन जारी रहे, तो सैनिक शासक और भी सख्त नियम लागू कर देंगे। म्यांमार के सिविल सोसायटी समूहों ने वहां से भेजे संदेशों में बताया है कि टेलीकॉम ऑपरेटरों और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को सैनिक शासकों ने साइबर सिक्युरिटी बिल का एक नया मसविदा भेजा है। सिविल सोसायटी समूहों के मुताबिक इस बिल का मकसद विरोध प्रदर्शनों को दबाना है।