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Palestine: फलस्तीन को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता मिलेगी? फ्रांस, ब्रिटेन के बाद माल्टा और कनाडा का एलान

Thu, 31 Jul 2025 08:06 AM IST
हिमांशु चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ओटावा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, ओटावा Published by: हिमांशु चंदेल Updated Thu, 31 Jul 2025 08:06 AM IST
सार

कनाडा और माल्टा ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा में फलस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता देने का ऐलान किया है। इससे पहले फ्रांस और ब्रिटेन भी ऐसा कर चुके हैं। यह कदम दो-राज्य समाधान की दिशा में एक बड़ी पहल है। इस्राइल और अमेरिका इसका विरोध कर रहे हैं। मिस्र समेत कई देशों ने इस निर्णय का समर्थन किया है और अन्य देशों से भी ऐसा करने की अपील की है।

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फलस्तीनी। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

फलस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देने की दिशा में बड़ा कूटनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। फ्रांस और ब्रिटेन के बाद अब कनाडा और माल्टा ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में सितंबर में फलस्तीन को मान्यता देने का ऐलान किया है। यह कदम उस वक्त उठाया गया है जब गाजा में युद्ध चल रहा है और इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष 80 साल बाद भी समाधान से दूर है। इस फैसले को दो-राज्य समाधान की ओर एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। वहीं, बीते दो दिन पहले ब्रिटेन के पीएम ने भी कहा था कि अगर इस्राइल युद्ध नहीं रोकता है, तो वो भी सितंबर में फिलिस्तीन को मान्यता देंगे। 
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माल्टा के विदेश मंत्रालय के स्थायी सचिव क्रिस्टोफर कटाजार ने संयुक्त राष्ट्र में कहा कि उनका देश लंबे समय से फलस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करता रहा है। उन्होंने बताया कि माल्टा सितंबर में फलस्तीन को औपचारिक मान्यता देगा। दूसरी ओर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कैबिनेट बैठक के बाद यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि कनाडा यह कदम 23 सितंबर से शुरू होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा में उठाएगा।
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मान्यता के साथ कनाडा की शर्तें भी
हालांकि कनाडा ने मान्यता के साथ कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं। पीएम कार्नी ने कहा कि फलस्तीनी अथॉरिटी को 2026 में आम चुनाव कराने होंगे जिसमें हमास को कोई भूमिका नहीं दी जाएगी। इसके अलावा, एक निरस्त्र फलस्तीन की बात भी की गई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कनाडा और किन गारंटियों की मांग कर रहा है, लेकिन राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने 10 जून को भेजे एक पत्र में इन शर्तों को स्वीकार किया था।
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145 से ज्यादा देश दे चुके हैं मान्यता
माल्टा के प्रधानमंत्री रॉबर्ट अबेला ने फेसबुक पर पोस्ट कर बताया कि उनका देश यह कदम मध्य पूर्व में स्थायी शांति की दिशा में उठा रहा है। अब माल्टा उन 145 से अधिक देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिन्होंने फलस्तीन को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी है। इनमें दर्जनों यूरोपीय देश भी हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पहले ही सितंबर से पहले मान्यता देने की बात कह चुके हैं।

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इस्राइल और अमेरिका ने जताया कड़ा विरोध
इस्राइल ने इस पूरी प्रक्रिया का विरोध किया है और अमेरिका के साथ मिलकर यूएन बैठक का बहिष्कार किया है। इस्राइल के यूएन राजदूत डैनी डैनन ने कहा कि यह बैठक आतंकवाद को वैधता देती है और यह सब कुछ महज दिखावा है। उन्होंने कहा कि जब हमारे लोग हमास की सुरंगों में बंधक बने हुए हैं, तब दुनिया केवल खोखले बयान दे रही है। डैनन ने इस प्रक्रिया को ‘पाखंड और समय की बर्बादी’ बताया।

यूएन सम्मेलन में 'न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन' को मिला समर्थन
यूएन की इस बैठक में कुल 128 देशों ने हिस्सा लिया। इस दौरान 'न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन' नामक 7 पन्नों का प्रस्ताव सामने आया जिसमें एक चरणबद्ध योजना पेश की गई। इसका लक्ष्य है कि गाजा युद्ध खत्म कर एक स्वतंत्र, असैन्य फलस्तीन को इस्राइल के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में स्थापित किया जाए। इसके साथ ही एक 'न्यूयॉर्क कॉल' नाम का बयान भी आया जिसमें 15 पश्चिमी देशों ने बाकी देशों से भी फलस्तीन को मान्यता देने की अपील की।


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मिस्र ने यूके के फैसले का स्वागत किया
मिस्र ने ब्रिटेन के फैसले की सराहना करते हुए इसे फलस्तीन को मान्यता देने की वैश्विक मुहिम का अहम हिस्सा बताया। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने साल 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को फलस्तीन की राजधानी बनाने की वकालत की और कहा कि यह कदम क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की दिशा में बड़ा योगदान देगा। मिस्र ने उन सभी देशों से अपील की जो अब तक यह कदम नहीं उठा सके हैं कि वे भी जल्द यह फैसला लें।

अब निगाहें सितंबर की महासभा पर
सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में जब ये देश औपचारिक रूप से फलस्तीन को मान्यता देंगे, तब यह देखा जाएगा कि क्या यह कदम वास्तव में शांति लाने में मदद करेगा या फिर इस्राइल और उसके समर्थकों के विरोध के कारण यह महज राजनीतिक घोषणा बनकर रह जाएगा। हालांकि यह स्पष्ट है कि दो-राज्य समाधान की अवधारणा को अब वैश्विक स्तर पर नई ऊर्जा मिल रही है।


 
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