ओलंपिक: पैराओलंपिक के बाद जापान में सवाल, आखिर ये आयोजन हुए क्यों?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 06 Sep 2021 04:45 PM IST

सार

जापानी विश्लेषकों का आरोप है कि सुगा, टोक्यो के पूर्व गवर्नर शिनतारो इशिहारा, और ओलंपिक खेल आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष योशिरो मोरी 1964 में टोक्यो में ओलंपिक खेलों के हुए सफल आयोजन से बेहद प्रभावित थे। उनकी सोच थी कि उसी करिश्मे को फिर से दोहराया जा सकेगा...
तोक्यो ओलंपिक
तोक्यो ओलंपिक - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार

ओलंपिक के बाद पैराओलंपिक खेलों के खत्म होने पर जापान के लोगों ने राहत की सांस ली है। लेकिन देश में आम सोच यह है कि अब आगे जापान की कड़ी परीक्षा है। ये दोनों खेल आयोजन कोरोना महामारी के बीच हुए। प्रमुख जापानी समाजशास्त्री शुनया योशिमी ने पैराओलंपिक खेलों की समाप्ति के बाद कहा कि इन खेलों का आयोजन गहरे संदेह के माहौल में हुआ। इस आयोजन ने कई रूपों में जापान की नाकामियों को दुनिया के सामने ला दिया।
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योशिमी ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम को दिए एक इंटरव्यू में कहा- ‘ओलंपिक खेलों का आयोजन अच्छे ढंग से नहीं हुआ। लेकिन इसका कारण सिर्फ कोरोना वायरस नहीं है। असल वजह यह है कि इस मौके पर ओलंपिक खेल कराने का कोई कारण ही नहीं था।’ योशिमी के मुताबिक जापान की असल समस्या यह है कि उसने पिछली गलतियों से कुछ नहीं सीखा और अपने भविष्य के बारे में कोई नजरिया विकसित नहीं किया है। उसके ज्यादातर नेता 70 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुष हैं, जो अतीत के ‘आर्थिक वृद्धि के मिथक’ में फंसे हुए हैं।


यहां की मीडिया चर्चाओं में इस बात पर गौर किया गया है कि पैराओलंपिक खेलों की समाप्ति करीब आते ही प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा को अपना पद छोड़ने का फैसला करना पड़ा। उनकी ये उम्मीद पूरी नहीं हुई कि ओलंपिक और पैराओलंपिक खेलों के आयोजन से उनकी लोकप्रियता में गिरावट थमेगी। यही इन आयोजनों की नाकामी का सबसे बड़ा सबूत है। जापान के लोगों ने इन आयोजनों पर अड़े रहने के सुगा सरकार के रुख को कभी पसंद नहीं किया।

जापानी विश्लेषकों का आरोप है कि सुगा, टोक्यो के पूर्व गवर्नर शिनतारो इशिहारा, और ओलंपिक खेल आयोजन समिति के पूर्व अध्यक्ष योशिरो मोरी 1964 में टोक्यो में ओलंपिक खेलों के हुए सफल आयोजन से बेहद प्रभावित थे। उनकी सोच थी कि उसी करिश्मे को फिर से दोहराया जा सकेगा। 1964 के ओलंपिक खेलों के जरिए जापान दुनिया को अपनी आर्थिक और तकनीकी ताकत दिखाने में सफल रहा था। उन खेलों के बाद दुनिया में जापान की हैसियत बढ़ी थी। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। फिलहाल अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है। उधर देश आबादी की औसत उम्र बढ़ने के साथ कामकाजी लोगों की कमी की समस्या का सामना कर रहा है।

योशिमी ने कहा- आज की हकीकत यह है कि अब देश में पहले जैसी शानदार आर्थिक वृद्धि का दौर नहीं लौटेगा। इसलिए नेताओं को चाहिए कि अतीत के गौरव मोह में फंसे रहने के बजाय वे अपने सोचने का तरीका बदलेँ। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जापान के लोगों की सबसे पहली प्राथमिकता महामारी से निपटना है। ओलंपिक खेलों ने देश में कोरोना संक्रमण के मामलों को बढ़ा दिया। उधर टीकाकरण की रफ्तार अब तेजी हुई है, लेकिन अभी भी कुल टीकाकरण निम्न स्तर पर ही है।

विश्लेषकों के मुताबिक बीते एक दशक में जापान के लोग गिरती आर्थिक वृद्धि दर, 2011 में आई सुनामी और उसकी वजह से फुकुशिया में हुए परमाणु हादसे से बने हालात के साये में जीते रहे हैं। ऊपर से कोरोना महामारी की मार पड़ी। ऐसे माहौल में वे ओलंपिक जैसे आयोजन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। जानकारों का कहना है कि लोगों की इस सोच की अनदेखी करते हुए देश के नेताओं ने भव्य आयोजन का दांव चला। जो नाकाम रहा है। अब उनके सामने लोगों का भरोसा जीतने की चुनौती है।
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