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म्यांमार पर जापान का रुख नरम: निवेश और चीन की चिंता उसूलों पर भारी?

Mon, 21 Jun 2021 05:37 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 21 Jun 2021 05:37 PM IST
सार

जापान की क्युशु युनिवर्सिटी में प्रोफेसर नोबुहीरो आइजावा ने कहा- ‘जापान प्रतिबंध लगाने में यकीन नहीं करता। जापान का नजरिया यह है कि अगर कोई सरकार लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन नहीं करती है, तो वह आर्थिक रूप से सफल नहीं होगी। और अगर आप आर्थिक रूप से सफल नहीं हैं, तो सत्ता में नहीं बने रह पाएंगे।’

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Japan appealed to Myanmar military rulers to stop the violence and restoration of democracy
म्यांमार में विरोध - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

जापान ने म्यांमार के सैनिक शासन के खिलाफ सख्त रुख अपनाने और प्रतिबंध लगाने की अमेरिकी नीति के अनुरूप आचरण नहीं किया है। जानकारों का कहना है कि जापान ने इस मामले में स्वतंत्र नीति अपनाई है। इससे दक्षिण पूर्व एशिया की घटनाओं पर सहयोगी देशों के साथ साझा रुख अपनाने की अमेरिकी मंशा को झटका लगा है। म्यांमार के मामले में सैनिक तख्तापलट के बाद तुरंत बाद ये साफ हो गया कि सैनिक शासन के खिलाफ सख्त रुख अपनाने पर जापान सहमत नहीं है। तब से जापान में एक बड़ा तबका म्यांमार के शासकों के साथ संपर्क बनाए रखने का पक्षधर रहा है। जापान-म्यांमार एसोसिएशन एक ऐसी संस्था है, जिसके सदस्यों में जापान के बड़े राजनेता और बड़े कारोबारी शामिल हैं। उसके महासचिव सुसुके वातानबे ने पिछले महीने एक लेख में सुझाव दिया था कि जापान को म्यांमार में सत्ता बदलने के अमेरिकी रुख का अंधानुकरण करने के बजाय वहां के सैनिक शासन और पश्चिमी देशों के बीच पुल का काम करना चाहिए।

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वातानबे एक पूर्व कैबिनेट मंत्री के बेटे हैं। उन्होंने अपने लेख में दावा किया कि वे उन गिने-चुने विदेशियों में एक हैं, जिनका म्यांमार के सैनिक शासक मिन आंग हलायंग के साथ संपर्क बना हुआ है। गौरतलब है कि जापान ने म्यांमार के खिलाफ कोई आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाया है। जबकि वह भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिकी नेतृत्व वाले चौगुट (क्वैड) में शामिल हैं।
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जापान की क्युशु युनिवर्सिटी में प्रोफेसर नोबुहीरो आइजावा ने तोक्यो के अखबार जापान टाइम्स से कहा- ‘जापान प्रतिबंध लगाने में यकीन नहीं करता। जापान का नजरिया यह है कि अगर कोई सरकार लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन नहीं करती है, तो वह आर्थिक रूप से सफल नहीं होगी। और अगर आप आर्थिक रूप से सफल नहीं हैं, तो सत्ता में नहीं बने रह पाएंगे।’
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जापान ने म्यांमार के सैनिक शासकों से हिंसा रोकने की अपील की है। साथ ही गिरफ्तार किए गए लोगों की रिहाई और लोकतंत्र बहाली की मांग भी की है। बीते आठ जून को संसद के निचले सदन ने एक प्रस्ताव पारित कर सैनिक तख्ता पलट की निंदा की। लेकिन जापान के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने जापान टाइम्स से कहा है- ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच जापान के म्यांमार के साथ, जिनमें वहां के सैनिक शासक भी शामिल हैं, संवाद के कई रास्ते कायम हैं। हमें मालूम है कि न सिर्फ जापान, बल्कि बहुत से दूसरे देश यह मानते हैं कि इस स्थिति से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है।’

जानकारों का कहना है कि म्यांमार की सेना का बचाव करने का जापान का रिकॉर्ड पुराना है। 2019 में जापान ने कहा था कि म्यांमार में कोई नरसंहार नहीं हुआ है। जबकि तब रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार का मामला दुनिया भर में चर्चित था। तब जापान सरकार ने ध्यान दिलाया था कि म्यांमार की सेना ने मानव अधिकारों का हनन करने वाले लोगों पर कार्रवाई की बात कही है और जापान उस पर भरोसा करता है।


विश्लेषकों के मुताबिक म्यांमार के मामले में सख्त रुख ना अपनाने के पीछे जापान का यह भय है कि उससे वहां उसका प्रभाव घटेगा, जिसका लाभ चीन को मिलेगा। गौरतलब है कि चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में म्यांमार पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया था। सिंगापुर इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के अध्यक्ष साइमन टाय ने इस बारे में जापान टाइम्स से कहा- ‘जापान ने म्यांमार में भारी निवेश कर रखा है। साथ ही वह वहां चीन के साथ आर्थिक प्रतिस्पर्धा में जुटा है। इसे देखते हुए जापान म्यांमार के मामले में सख्त रुख अपनाने से हिचकता रहा है।’

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