स्कॉटलैंड की आजादी: बोरिस जॉनसन के लिए मुश्किल होगा जनमत संग्रह रोक पाना
स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर पहला जनमत संग्रह 2014 में हुआ था। तब आजादी समर्थकों की मामूली अंतर से हार हो गई थी। लेकिन ब्रेग्जिट के बाद स्कॉटलैंड में माहौल बदल गया है। इसलिए संभावना है कि अगर दूसरा जनमत संग्रह हुआ, तो बहुमत आजादी के पक्ष में मतदान कर सकता है।
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प्रांतीय असेंबली के चुनाव में स्कॉटिश नेशनलिस्ट पार्टी (एसएनपी) की जीत के बाद अब स्कॉटलैंड में आजादी के मुद्दे पर दूसरे जनमत संग्रह को रोकना ब्रिटेन की बोरिस जॉनसन सरकार के लिए कठिन हो गया है। एसएनपी स्पष्ट बहुमत पाने से एक सीट दूर रह गई। लेकिन वहां ग्रीन पार्टी को आठ सीटें मिली है, इसलिए एसएनपी की नेता निकोला स्टरजन के लिए जनमत संग्रह के लिए प्रस्ताव पास कराने का रास्ता खुल गया है।
प्रत्यक्ष और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के मिली-जुली व्यवस्था से हुए चुनाव में प्रांतीय असेंबली की 129 में से 64 सीटें एसएनपी को मिलीं। पिछली बार से उसे एक सीट ज्यदा मिली है। ग्रीन पार्टी ने दो सीटों की बढ़ोतरी करते हुए इस बार आठ सीटें जीती हैं। कंजरवेटिव पार्टी को पिछली बार की तरह ही 31 सीटें मिली हैं। लेबर पार्टी को दो सीटों का नुकसान हुआ और उसे 22 सीटें मिली हैं। बाकी चार सीटें लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को मिली हैं।
चुनाव जीतने के तुरंत बाद स्टरजन ने कहा कि अब प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के पास दूसरे जनमत संग्रह से इनकार करने की कोई वजह नहीं है। उन्होंने कहा, 'जनमत संग्रह को सिर्फ मेरी या एसएनपी की मांग नहीं कहा जा सकता। बल्कि नए सदन में उन सदस्यों का बहुमत है, जिन्होंने जनमत संग्रह का वादा किया था। परिणाम को देखते हुए अब किसी के भी पास स्कॉटलैंड के लोगों को अपना भविष्य तय करने से रोकने का कोई लोकतांत्रिक तर्क नहीं है।'
उन्होंने कहा कि कंजरवेटिव पार्टी ने अगर जनमत संग्रह रोकने की कोशिश की, तो वह सिर्फ एसएनपी के ही, बल्कि स्कॉटिश जनता के विरोध में खड़ी होगी। प्रधानमंत्री जॉनसन ने स्टरजन की मांग पर से ध्यान हटाने की कोशिश में उन्हें कोरोना महामारी के खिलाफ ब्रिटिश नेताओं के सम्मेलन में भाग लेने का आमंत्रण भेजा है। नतीजों का अनुमान लगते ही उन्होंने ये आमंत्रण भेजा, जिसमें उन्होंने उत्तरी आयरलैंड और वेल्श के नेताओं को भी बुलाया है।
इस पत्र में जॉनसन ने कहा कि यह ब्रिटेन के हित में है कि सभी प्रांतीय सरकारें मिलकर काम करें। शुक्रवार को उन्होंने इस मांग को 'गैर-जिम्मेदाराना और लापरवाही भरा' बताया था। उनके ताजा पत्र का मतलब यह माना गया है कि वह जनमत संग्रह की मांग पर विचार करने को भी तैयार नहीं हैं। जॉनसन सरकार के एक अधिकारी ने मीडिया ब्रीफिंग में कहा, हमारा ध्यान महामारी से उबरने पर है। स्कॉटलैंड की नई सरकार को भी इस पर ध्यान देना चाहिए।
अड़े रहे जॉनसन तो तैयार होगा संवैधानिक संकट
विश्लेषकों कहना है कि अगर जॉनसन अपने रुख पर अड़े रहे, तो उससे एक बड़ा संवैधानिक संकट तैयार हो सकता है। स्टरजन ने दो टूक कहा है कि जनमत संग्रह उनका मुख्य एजेंडा होगा। कंजरवेटिव पार्टी इससे इनकार करेगी। इसका संकेत उसकी स्कॉटलैंड शाखा के नेताओं के बयानों से मिला है। असेंबली के नव-निर्वाचित कंजरवेटिव सदस्य एंड्रयू बोवी ने कहा कि एसएनपी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के साथ ही आजादी की मांग पर विराम लग गया है। पार्टी के एक दूसरे नव-निर्वाचित सदस्य ने कहा कि चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी का एजेंडा एसएनपी को बहुमत से वंचित करना था। इसमें वह सफल रही। इसलिए दूसरे जनमत संग्रह की मांग भोथरी हो गई है।
स्कॉटलैंड में 2014 में हुआ था पहला जनमत संग्रह
स्कॉटलैंड में आजादी के सवाल पर पहला जनमत संग्रह 2014 में हुआ था। तब आजादी समर्थकों की मामूली अंतर से हार हो गई थी। लेकिन ब्रेग्जिट के बाद स्कॉटलैंड में माहौल बदल गया है। इसलिए संभावना है कि अगर दूसरा जनमत संग्रह हुआ, तो बहुमत आजादी के पक्ष में मतदान कर सकता है। बहुमत न मिलने के सवाल एसएनपी का कहना है कि स्कॉटलैंड में चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर भी होता है। ये प्रणाली छोटे दलों के लिए फायदेमंद होती है।
इसलिए एसएनपी को पूर्ण बहुमत मिलना पहले से कठिन था। लेकिन ग्रीन पार्टी को मिले समर्थन को देखें, तो जनमत संग्रह चाहने वाले दलों को साझा तौर पर पूरा बहुमत मिला है। विश्लेषकों का कहना है कि स्टरजन जनमत संग्रह के एजेंडे पर अडिग रहेंगी। प्रांतीय असेंबली से वे इसके पक्ष में प्रस्ताव पारित कराएंगी। उसे ज्यादा समय तक नजरअंदाज करना ब्रिटिश सरकार के लिए मुश्किल साबित हो सकता है।