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अमेरिकी हमले के बाद एक्शन में ईरान, इस समुद्री मार्ग को कर सकता है बंद, मचेगा तेल के लिए कोहराम

Fri, 03 Jan 2020 02:46 PM IST
Anil Pandey अनिल पांडेय
Updated Fri, 03 Jan 2020 02:46 PM IST
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Indian Navy escorts crude oil carriers transiting through Strait of Hormuz, know all about it
ईरान अमेरिका तनाव - फोटो : Google Map

अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के बाहुबली जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराए जाने के बाद ईरान और अमेरिका के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। ऐसे में इसका असर विश्व के बाकी देशों पर भी दिखाई दे रहा है। खबर यह भी है कि ईरान जल्द ही पलटवार करते हुए होरमुज जलमार्ग को बंद कर सकता है। अगर यह जलमार्ग बंद होता है तो दुनिया में तेल के लिए हाहाकार मच सकता है।

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दरअसल, रणनीतिक रूप से होरमुज जलडमरूमध्य तेल व्यापार का सबसे अहम रास्ता माना जाता है। इस हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया। मामला सैन्य तैयारियों तक पहुंच गया। ईरान और अमेरिका में पहले से ही तनाव बना हुआ था जिसे इस घटना ने और बढ़ा दिया है। अमेरिका ने अपने सभी लोगों को तुरंत इराक छोड़ने के निर्देश जारी किया है। वहीं ईरान ने स्विटजरलैंड के राजदूत को इस हमले को लेकर तलब किया है। बता दें कि स्विटजरलैंड के राजदूत अमेरिका के लिए भी काम कर रहे हैं।

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कहां है होरमुज

होरमुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी में है। यह एक अहम रास्ता है जो मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों को एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका और उससे भी आगे के बाजारों से जोड़ता है। यह ईरान और ओमान के जल क्षेत्र के दायरे में आता है। सबसे संकरे बिंदु पर होरमुज की चौड़ाई महज 33 किलोमीटर है। दोनों दिशाओं में शिपिंग लेन सिर्फ तीन किलोमीटर चौड़ी है। यह ओमान की खाड़ी की ओर जाता है, जहां से जहाज पूरी दुनिया में जाते हैं। यह पूरी दुनिया के तेल व्यापार के लिए बड़ा ट्रांजिट प्वाइंट है।

क्यों चर्चा में आया होरमुज

यह चर्चा में इसलिए आया है कि 13 जून को तेल के दो तेल टैंकरों पर होरमुज जलडमरूमध्य के करीब संदिग्ध हमले हुए। सभी 44 नाविकों को अमेरिकी नौसेना की मदद से सुरक्षित निकाला गया। इस मामले ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को बढ़ा दिया था। इस संदिग्ध हमले से पहले भी अमेरिका ने 12 मई को संयुक्त अरब अमीरात के फुजाइरा में समुद्री जहाजों के बीच चार टैंकरों पर हुए हमले के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि ईरान ने किसी भी हमले से साफ इनकार किया था।

2017 में 1.72 करोड़ बैरल कच्चे तेल का परिवहन

समुद्री रास्तों के जरिए होने वाला करीब एक तिहाई तेल कारोबार इस समुद्री मार्ग से होता है। यूनाइटेड स्टेट्स एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन का आकलन है कि 2016 में इस जलमार्ग से हर दिन 1.85 करोड़ बैरल कच्चा तेल गुजरा था। यह सागर के जरिए एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले कुल तेल का करीब 30 फीसदी है। फिलहाल वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की प्रतिदिन खपत लगभग 10 करोड़ बैरल है। इस लिहाज से दुनिया के तेल का तकरीबन 20 फीसदी यहां से गुजरता है।

यहां की घटना का दुनिया पर असर

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, चीन, भारत, जापान, और दक्षिण कोरिया में भी इसी मार्ग से तेल पहुंचाया जाता है। इसके साथ ही कतर से दुनियाभर में किए जाने वाला तरल प्राकृतिक गैस एक्सपोर्ट भी इसी मार्ग से होता है। होरमुज जलडमरूमध्य के संकरे रास्ते में अगर कुछ भी घटता है तो वह दुनियाभर के ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है। किसी भी प्रकार का विवाद दुनियाभर की तेल कीमतों में तेजी ला सकता है। यदि खाड़ी क्षेत्रों में तनाव पैदा होता है तो कीमतों में लंबे वक्त तक बढ़ोतरी बनी रह सकती है साथ ही आपूर्ति भी प्रभावित होगी।

यूएई और सऊदी अरब ढूंढ रहे विकल्प

ऐसी स्थिति में इस इलाके में तनाव की स्थिति बढ़ने की बात कही जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब होरमुज जलमरूमध्य में तेल को लेकर मचे घमासान के बीच कोई अन्य विकल्प भी ढूंढ रहे हैं। इसके लिए ज्यादा पाइपलाइन बनाने की भी तैयारी है। इलाके में तनाव का नतीजा तेल टैंकरों को भुगतना पड़ा है।

कच्चे तेल का सफर

  • रिफायनरी: कच्चा तेल या क्रूड उत्पादन करने वाले देशों से आयात करने के बाद रिफायनरी तक पहुंचता है। यहां कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम पदार्थ निकाले जाते हैं।
  • कंपनियां: इसके बाद पेट्रोलियम कंपनियां इन उत्पादों से अपना मुनाफा कमाती हैं और पेट्रोल पंप तक तेल पहुंचाती हैं।
  • पेट्रोल पंप: देशभर में फैले पेट्रोल पंप नेटवर्क के जरिए कंपनियां पेट्रोल और डीजल को बेचती हैं। इसमें पेट्रोल पंप मालिक अपना तयशुदा कमीशन कमाता है।
  • खरीदार: ये केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक्साइज ड्यूटी, वैट और अन्य स्थानीय टैक्स देकर पेट्रोल और डीजल खरीदता है।

होरमुज में अमेरिकी नौसेना ने बढ़ाई अपनी उपस्थिति

इस क्षेत्र में होने वाली घटनाओं के इतिहास को देखते हुए अमेरिका ने हाल में इस क्षेत्र में अपने नौसेना बल की तैनाती में इजाफा किया है। अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा पहले से ही मध्यपूर्व में तैनात है। अमेरिकी नौसेना का मुख्यालय बहरीन का मनामा इलाका है। वहीं ईरान ने परमाणु समझौते पर नई रूपरेखा बनाने के लिए यूरोप को सात जुलाई तक का समय दिया है।

इस क्षेत्र में हुईं कुछ बड़ी घटनाएं

  • जुलाई 1988 में अमेरिकी जंगी जहाज ने एक ईरानी हवाई जहाज को मार गिराया था। इससे विमान में सवार 290 लोगों की मौत हो गई थी। बाद में अमेरिका ने इसे क्रू की गलती से हुआ हादसा बताया, जिसने यात्री विमान को लड़ाकू जहाज समझ लिया था। ईरान ने इसे जानबूझ कर किया गया हमला बताया।
  • 1980 से 1988 के बीच हुए ईरान इराक युद्ध में दोनों देशों ने एक दूसरे के तेल निर्यात को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी, जिसे टैंकर वॉर कहा जाता है। बहरीन में मौजूद अमेरिका के पांचवे बेड़े के पास इस इलाके में चलने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। अमेरिका और ईरान के बीच फिलहाल तनाव बढ़ा हुआ है। अमेरिका, ईरान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश में है और उसका तेल निर्यात खत्म करना चाहता है।
  • जुलाई 2010 में जापानी तेल टैंकर एम स्टार पर होरमुज के इलाके में हमला हुआ था। इसकी जिम्मेदारी अलकायदा से जुड़े अब्दुल्ला आजम ब्रिगेड्स ने ली थी। जनवरी 2012 में ईरान ने अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के जवाब में इस रास्ते को बंद करने की धमकी दी थी। यह प्रतिबंध ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम को रोकने का दबाव बनाने के लिए लगाया गया था।
  • मई 2015 में ईरानी जहाजों से सिंगापुर के झंडे वाले एक टैंकर पर गोलियां दागी गईं थीं। ईरान का कहना था कि इस जहाज ने ईरान के ऑयल प्लेटफॉर्म को नुकसान पहुंचाया था। ईरान ने एक कंटेनर शिप को भी जब्त कर लिया था।
  • 2018 में भी ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी ने धमकी दी थी कि वे होरमुज के रास्ते से गुजरने वाले तेल पर रोक लगाएंगे। ईरान की इसी तरह की धमकियां तनाव की स्थिति में होरमुज को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ा देती हैं।

तीन कारण जो बताते हैं, सस्ते तेल के दिन अब लद गए

तेल की कीमतें पेंडुलम की तरह चलती हैं। कुछ ही घंटों में इनकी वजह से किसी देश की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है। पिछले वर्षों की तुलना में तेल की कीमतें भी बढ़ गई हैं। तेल की कीमतों पर नजर रखने वाले जानकार अब ये कहने लगे हैं कि सस्ते तेल के दिन लदने अब शुरू हो गए हैं।

तेल का बाजार

ये हमेशा से होता आया है कि तेल का बाजार अनिश्चितताओं भरा रहता है और इसमें कीमतों के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। अमेरिकी बैंकों और कई वित्तीय संस्थाओं ने पहले ही कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की भविष्यवाणी की थी।

सेंट पीट्सबर्ग में आयोजित इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम की बैठक में इस साल तेल के उत्पादन में कटौती पर सहमति बनी थी। हालांकि जानकार लोगों ने इस घोषणा को ज्यादा अहमियत नहीं दी थी। लेकिन तीन ऐसे कारण हैं जो बताते हैं कि सस्ता तेल अब बीते जमाने की बात बनता जा रहा है।

पहला कारण: तेल की आपूर्ति में कटौती

दुनिया को तेल बेचने वाले देश आपूर्ति में कटौती की एक योजना पर सख्ती से अमल कर रहे हैं। उनका इरादा तेल के उत्पादन को 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन के पैमाने तक ले जाने का है। दरअसल वो चाहते हैं कि दुनिया में तेल की मांग बढ़े और साथ ही कीमतें भी।

दूसरा कारण: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध

ईरान का मुद्दा तेल की कीमतों में हुए इजाफे का एक बड़ा कारण है। दरअसल ईरान पर प्रतिबंधों की आशंका के बाद से ही तेल की कीमतें चढ़ने लगी थीं और जब इन प्रतिबंधों की घोषणा हुई तो कीमतें एक बार फिर बढ़ीं थीं।

तीसरा कारण: वेनेजुएला में तेल उत्पादन में कमी

वेनेजुएला के राजनीतिक संकट का खामियाजा उसके तेल उद्योग को काफी हद तक भुगतना पड़ा है। पिछले दो साल में उसके उत्पादन में एक तिहाई कटौती हुई है।

भारत-ईरान संबंध

भारत और ईरान के बीच गहरे मजबूत कूटनीतिक संबंध रहे हैं। ईरान दूसरा देश है जिससे भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। पहला स्थान इराक का है। ईरान के लिए भारत भी सबसे ज्यादा तेल आयात करने वाले देशों में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है। इस वजह से दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध हैं। इसके अलावा भारत आतंकवाद और पाकिस्तान के खिलाफ भी ईरान को अपना साझेदार मानता है।

ईरान और पाकिस्तान के बीच कभी भी मधुर संबंध नहीं रहे हैं। पाकिस्तान की भारत विरोधियों गतिविधियों के खिलाफ ईरान भारत का साथ देते रहा है। इसके अलावा पिछले साल ही ईरान के चबाहर में बंदरगाह के निर्माण करवाने में भारी निवेश किया है। इससे भारत को समुद्र के रास्ते अफगानिस्तान को भी सहायता देने में आसानी होगी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से ईरान मध्यपूर्व का एक महत्वपूर्ण देश है। अंतराराष्ट्रीय राजनीति में अकेला सा नजर आने वाला ईरान भू-रणनीतिक रूप से और प्राकृतिक तेल के भंडार के दृष्टिकोण से दुनिया की नजरों से अनदेखा नहीं रह पाता। इतिहास में यह क्षेत्र फारस के नाम से जाना जाता था।

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