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भारत ने चेताया: आतंकवाद बना युद्ध छेड़ने का जरिया, विश्व युद्धों की तरह जनसंहार का खतरा
Wed, 02 Dec 2020 12:33 PM IST
सुरेंद्र जोशी
पीटीआई , संयुक्त राष्ट्र
पीटीआई , संयुक्त राष्ट्र
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Wed, 02 Dec 2020 12:33 PM IST
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यूएन में भारत के स्थायी मिशन के सचिव आशीष शर्मा.
- फोटो : social media
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दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के 75 वर्ष पूरे होने के मौके पर भारत ने दुनिया का चेताया है कि आतंकवाद समकालीन विश्व में युद्ध छेड़ने का तरीका बनकर सामने आया है। इससे पृथ्वी पर उसी तरह का जनसंहार होने का खतरा है, जैसा दोनों विश्व युद्धों के दौरान देखा गया था।
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बता दें, दूसरा विश्व युद्ध 1 सितंबर 1939 को शुरू हुआ था और 2 सितंबर 1945 को समाप्त हुआ था। जापान द्वारा अमेरिका के समक्ष सरेंडर करने के बाद यह खत्म हुआ था। इसमें 6 से 8 करोड़ लोग मारे गए थे। यह विश्व की तत्कालीन आबादी का 3 फीसदी था। 2020 में इसकी समाप्ति को 75 वर्ष पूरे हो गए हैं।
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युद्ध के अभिशाप से पीढ़ियों को बचाना यूएन का मकसद
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव आशीष शर्मा ने सोमवार को कहा, ‘द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के 75 वर्ष पूरा होना, हमें संयुक्त राष्ट्र के मकसद और इसके आधारभूत सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को पुन: पुष्ट करने का अवसर देता है। संयुक्त राष्ट्र का मकसद युद्ध के अभिशाप से आने वाली पीढ़ियों को बचाना है।’
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दूसरे विश्व युद्ध के पीड़ितों के सम्मान में आयोजित विशेष बैठक में शर्मा ने कहा, ‘आतंकवाद समकालीन दुनिया में युद्ध छेड़ने के एक तरीके के रूप में सामने आया है। इससे दुनिया में उसी प्रकार का नरसंहार होने का खतरा है, जो हमने दोनों विश्व युद्धों के दौरान देखा था। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और वैश्विक स्तर पर प्रयासों के जरिए ही इससे निपटा जा सकता है।’ उन्होंने विश्व के देशों से अपील की कि वे युद्ध छेड़ने के समकालीन प्रारूपों से लड़ने और अधिक शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित दुनिया सुनिश्चित करने के लिए स्वयं को समर्पित करें।
भारत के 25 लाख जवान लड़े थे दूसरे विश्व युद्ध में
शर्मा ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय महाद्वीप के इतिहास में सबसे अधिक संख्या में सैन्यकर्मियों ने भाग लिया। औपनिवेशिक शासन के अधीन होने के बाजवूद भारत के 25 लाख जवान द्वितीय विश्व युद्ध में लड़े। भारतीय सेना इतिहास का सबसे बड़ा स्वयंसेवी बल है, जिसके 87,000 जवानों की जान गई या वे लापता हो गए और लाखों जवान गंभीर रूप से घायल हुए।
उचित सम्मान नहीं मिलना निराशाजनक
शर्मा ने दुनिया को बचाने के लिए लड़ने वाले सभी देशों के बहादुर लोगों को सलाम करते हुए कहा कि यह निराशाजनक है कि औपनिवेशिक जगत के हजारों स्वयंसेवकों के युद्ध में योगदान के बावजूद उन्हें उचित सम्मान एवं मान्यता नहीं दी गई।