भारत-चीन सीमा विवादः पड़ोसी देश से तनातनी के बीच किस काम आती है 'हॉटलाइन'?
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भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने के लिए आज रूस की राजधानी मॉस्को में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हो रही है। जून में गलवान घाटी में जो कुछ हुआ उसके बाद दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की ये पहली बैठक होगी। पिछले चार दशकों में पहली बार ऐसा हुआ जब एलएसी पर गोली चलने की नौबत आई। 45 सालों में दोनों देशों के बीच ऐसे तनावपूर्ण रिश्ते कभी नहीं रहे।
इस लिहाज से ना सिर्फ भारत और चीन में इस बातचीत के नतीजे का बेसब्री से इंतजार हो रहा है, बल्कि रूस और दुनिया के दूसरे ताक़तवर देशों की नजरें भी इस बातचीत पर टिकी है।
राजनयिक स्तर की बातचीत से बात नहीं बनी तो मंत्री स्तर की बातचीत शुरू हुई है। जानकारों की राय में आज बात नहीं बनी तो आगे का रास्ता दोनों के प्रधानमंत्रियों की बातचीत से होकर ही निकलेगा, जो फिलहाल महीनों से बंद है।
सीमा के तनाव के मद्देनजर भले ही कुछ स्तरों की बातचीत कभी-कभी बंद हो जाती हो लेकिन एक स्तर की बातचीत है जो हमेशा चलती रहती है और वो है 'हॉटलाइन' पर।
हॉटलाइन क्या है?
अक्सर तनाव की स्थिति में 'हॉटलाइन पर दोनों देशों की बीच बात हुई' ऐसी हेडलाइन अखबारों में पढ़ने को मिलती है। पर इसका मतलब ये नहीं कि शांतिपूर्ण माहौल में हॉटलाइन बंद हो जाते हैं।
दरअसल हॉटलाइन दो देशों के सैनिकों के बीच एक 'वन टू वन कम्युनिकेशन' का जरिया है। आम भाषा में इसे 'कॉन्फिडेंस बिल्डिंग' के तरीका के तौर देखा जाता है। दो देशों की सीमा पर सैनिकों के बीच जो टुकड़ी तैनात रहती है, उनके बीच बातचीत का ये एक जरिया होता है।
भारत में इस तरह की हॉटलाइन की पूरी व्यवस्था डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स (डीजीएमओ) देखते हैं। इसके जरिए संदेश भेजने के अपने तय तरीके होते हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) विनोद भाटिया भारत के डीजीएमओ रह चुके हैं। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने विस्तार से इन हॉटलाइन्स के काम करने का तरीका बताया।
वो कहते हैं कि वर्तमान में भारत-चीन एलएसी सीमा पर पाँच जगह ऐसी हैं जहाँ हॉटलाइन काम करते हैं।
ये हॉटलाइन पूर्वी लद्दाख सीमा के पास दौलत बेग ओल्डी और स्पांगूर में है। सिक्किम सीमा पर नाथुला के पास है और अरुणाचल में बुमला दर्रा और तिबूट के पास हॉटलाइन का इस्तेमाल होता है।
बकायदा अफसरों की ड्यूटी लगती है
'हॉटलाइन' जैसा कि नाम से ही पता चलता है - एक ऐसी फोन लाइन है जिससे दो देशों के सैनिक सीमा पर एक दूसरे के साथ संपर्क में रह सकते हैं।
इसके लिए बकायदा अफसरों की ड्यूटी लगती है। जैसे ही हॉटलाइन का फोन बजता है, सीमा पर तैनात सैनिकों को पता चल जाता है कि फोन सीमा पार के देश से आया है। दूसरी तरफ मैसेज रीसिव करने वाले तक संदेश भेज दिया जाता है। और जब दूसरे पक्ष को उस संदेश का जवाब देना होता है तो वो भी अपनी तरफ के हॉटलाइन का इस्तेमाल कर लेते हैं।
भारत में हॉटलाइन पर संदेश भेजने और रिसीव करने के लिए एलएसी पर तैनात सेना की टुकड़ी के कमांडर को ही अधिकृत किया गया है।
हॉटलाइन पर किस तरह के संदेश भेजे जा सकते हैं इसका एक उदाहरण हाल ही में अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर देखा गया। हॉटलाइन की चर्चा उसी वक्त मीडिया में शुरू हुई।
बीते रविवार अरुणाचल प्रदेश सीमा से खबर आई कि भारत के बॉर्डर से चीन की सेना द्वारा कथित रूप से पांच भारतीयों का अपहरण कर लिया। एक पत्रकार ने ये सवाल ट्विटर पर केंद्र सरकार से पूछा, जिस पर केंद्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने जवाब में लिखा कि भारतीय सेना ने चीनी सेना को हॉटलाइन पर मैसेज भेजा है, और उनके जवाब का इंतजार है।
वो पांच भारतीय बाद में चीनी सेना ने खोज निकाले और भारत को सौंप दिए। कई बार सीमा पर पालतू जानवरों के लापता होने पर भी ऐसा होता है।
ऐसे मामलों में हॉटलाइन की खास भूमिका होती है। चूंकि दोनों देशों की सीमा ऐसी नहीं कि बहुत ऊंची दीवारों से बाउंड्री खींची गई हो, अक्सर जानवर और कभी-कभी लोग भूल से सीमा पार कर जाते हैं।
ऐसी किसी घटना की सूचना पर सीमा की दूसरी तरफ हॉटलाइन पर बात कर मामले को सुलझाया जा सकता है।
लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया की मानें तो शांति के समय में इस हॉटलाइन सेवा की ज़्यादा अहमियत होती है। बॉर्डर मैनेजमेंट के लिए ये ज्यादा जरूरी होते हैं।
डिसइंगेजमेंट का मतलब क्या है?
लेकिन कई बार सीमा के पास बर्फबारी ज्यादा हो जाती है, आने जाने में असुविधा होती है या फिर फ्लैग मीटिंग करने वाले अधिकारी दूसरे जरूरी काम में व्यस्त हो जाते हैं और मीटिंग कैंसल या आगे बढ़ाने की जरूरत होती है, तो वो सूचना भी हॉटलाइन के जरिए ही भेजी जा सकती है।
फ्लैग मीटिंग के लिए निर्धारित मीटिंग प्वाइंट एलएसी के दोनों तरफ हैं - चीन की ओर भी और भारत की तरफ भी।
लेकिन क्या इन हॉटलाइन्स पर डिसइंगेजमेंट और डी-एस्केलेशन पर भी बात हो सकती है? इस सवाल पर लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया कहते हैं ये दोनों बातें आमने-सामने बैठ कर ही होती है। इन हॉटलाइन्स पर ऐसी मीटिंग सिर्फ फिक्स की जाती है।
डिसइंगेजमेंट का मतलब समझाते हुए वो कहते हैं कि सीमा पर जिन फ्लैश प्वाइंट पर सेना आमने सामने होती है, उस जगह से सेना पीछे ले जाने को डिसइंगेजमेंट कहा जाता है।
दरअसल लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के दोनों तरफ दोनों देशों की सैनिक पैट्रोलिंग करते हैं, कोई भी सेना दूसरे की सीमा में प्रवेश करती है तो उन्हें पहले ही सावधान कर दिया जाता है। कई बार सैनिक अपनी ग़लती मानते हुए पीछे हट जाते हैं, लेकिन कई बार सेना पीछे नहीं हटती तो मामला गंभीर हो सकता है।
डी-एस्केलेशन का मतलब क्या है?
जब तनाव लंबा चलता है, जैसा कि मई के महीने से पूर्वी लद्दाख सीमा पर चल रहा है, तो ऐसे में फ्लैग मीटिंग के जरिए डिसइंगेजमेंट करने पर बातचीत होती है, जो हॉटलाइन पर फिक्स किए जाते है।
डी-एस्केलेशन का मतलब होता है कि सैनिकों के जमावड़े में कमी लाना। एलएसी पर तनाव जब लंबा चलता है तो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए भारत और चीन दोनों तरफ से सैनिकों का जमावड़ा बढ़ा दिया जाता है।
जब दोनों देश डिसइंगेजमेंट के लिए तैयार हो जाते हैं, तब ही डि-एस्कलेशन होता है। लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया के मुताबिक़ दोनों ही प्रक्रिया एक दूसरे से जुड़ी है।
और जब सीमा पर डिसइंगेजमेंट और डी-एस्केलेशन हो जाता है तो आखिरी प्रक्रिया की शुरुआत होती है - डी-इंडक्शन। इसका मतलब ये कि अब सैनिक वापस अपने पुराने बेस पर लौट जाएंगे।