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भारत-जापान ने तीसरे देशों में सहयोग बढ़ाने का लिया संकल्प, शिंजो आबे से मिले पीएम मोदी

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 05 Nov 2019 05:41 AM IST
पीएम मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे
पीएम मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे - फोटो : Twitter
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे ने हिंद प्रशांत क्षेत्र के सुरक्षा हालातों की समीक्षा की। दोनों नेताओं ने क्षेत्र में शांति, समृद्धि और विकास में सहयोग के लिए तीसरे देशों में द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने का संकल्प लिया। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन से इतर हुई इस मुलाकात में हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीनी सेना के बढ़ते प्रभुत्व व आर्थिक दबदबे का मुद्दा प्रमुखता से उठा।


विदेश मंत्रालय ने बैठक की जानकारी देते हुए बताया, भारत और जापान के प्रधानमंत्रियों ने मुक्त व समावेशी हिंद प्रशांत क्षेत्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। क्षेत्र में साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दोनों नेताओं ने तीसरे देशों में सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई।


मंत्रालय के मुताबिक, दोनों नेताओं ने इस महीने के अंत में भारत और जापान के विदेश व रक्षा मंत्रालयों के बीच भारत में होने वाली टू प्लस टू वार्ता के बारे में भी बात की। मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने ट्वीट किया, मोदी और आबे के बीच हुई ‘अच्छी वार्ता’ से टू प्लस टू और वार्षिक शिखर सम्मेलन का आधार तैयार हुआ। पीएम मोदी ने भरोसा जताया कि आगामी शिखर सम्मेलन सफल होगा और इससे भारत और जापान के बीच विशेष रणनीतिक व वैश्विक साझेदारी और गहरी होगी।

भारत ने म्यांमार को दिया विद्रोही समूहों के खिलाफ सहयोग का भरोसा

पीएम नरेंद्र मोदी ने म्यांमार की स्टेट काउंसिलर आंग सान सू की को विद्रोही समूह के खिलाफ सहयोग को लेकर आश्वस्त किया। पीएम ने कहा कि भारत इस बात को सुनिश्चित करता है कि विद्रोही समूहों को भारत-म्यांमार सीमा पर गतिविधियां संचालित करने की जगह न मिले।

पीएम मोदी ने रविवार को आसियान शिखर सम्मेलन से इतर सू की से मुलाकात की। इस दौरान पीएम ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में सामाजिक आर्थिक परियोजनाओं के विस्तार की बात कही।  

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, मोदी ने बांग्लादेश से विस्थापित लोगों की रखाइन प्रांत में उनके घरों में जल्द, सुरक्षित व स्थायी वापसी पर भी जोर दिया। पीएम ने कहा कि विस्थापितों का उनके घर पहुंचना तीनों पड़ोसी देश भारत, बांग्लादेश और म्यांमार के हित में है।

दोनों नेताओं ने इस बात पर भी सहमति जताई कि द्विपक्षीय साझेदारी के निरंतर विस्तार के लिए एक स्थिर और शांतिपूर्ण सीमा होना अहम है। पीएम ने यह सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया कि दोनों देश यह सुनिश्चित करें कि विद्रोही समूहों को सीमावर्ती इलाकों में काम करने की जगह न मिले।

ट्रंप की गैरमौजूदगी में सिर्फ तीन देशों के नेताओं ने की अमेरिकी दल से मुलाकात

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आसियान बैठक में नहीं आने के बाद कई दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के नेताओं ने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात में दिलचस्पी नहीं दिखाई। आसियान के दस देशों में से केवल थाईलैंड, वियतनाम और लाओस के नेताओं ने बैठक में शिरकत की।

अमेरिका ने आसियान बैठक के लिए वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ ब्रायन के अलावा किसी शीर्ष नेता को नहीं भेजा है।

एक देश के राजनयिक ने कहा कि आसियान देशों के लिए अपने नेताओं को भेजना उचित नहीं है क्योंकि अमेरिकी प्रतिनिधित्व में समानता नहीं है। एक अन्य राजनयिक ने कहा कि इसे अमेरिका के बहिष्कार के नजरिये से न देखा जाए।

हमारे नेताओं की अन्य बैठकें भी थीं, इसलिए वे अमेरिका के साथ बैठक में शामिल नहीं हुए। इस बीच, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आसियान सम्मेलन में नहीं आनेे के बावजूद एशियाई देशों के साथ अमेरिका का भरपूर संवाद हुआ।

रॉस ने सोमवार को आसियान शिखर सम्मेलन से इतर व्यापार मंच की बैठक में कहा, ट्रंप प्रशासन इस क्षेत्र को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है और हमारा बेहतर संवाद हुआ। हम इस क्षेत्र के देशों के साथ व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी रखेंगे। इससे पहले ट्रंप ने 2017 में फिलीपींस में हुई आसियान की बैठक में हिस्सा लिया था।

उपराष्ट्रपति माइक पेंस भी अमेरिकी दल का हिस्सा थे। हालांकि, इस बीच व्हाइट हाउस ने इस बात से इनकार किया कि चीन के साथ जारी ट्रेड वार के चलते अमेरिका ने आसियान बैठक की अनदेखी की है।

पिछले समझौते से हुआ था भारत को नुकसान 

यूपीए सरकार के दौरान आसियान देशों के लिए 74 फीसदी बाजार को खोला था, लेकिन इंडोनेशिया जैसे अमीर देश ने भारत के लिए सिर्फ 50 फीसदी बाजार खोला था।

इसके साथ ही यूपीए शासनकाल में भारत ने 2007 में भारत-चीन एफटीए को लेकर सहमति जताई थी और चीन के साथ 2011-12 में आरसीईपी समझौते पर वार्ता को लेकर भी राजी हुआ था।

भारत के इस फैसले से आरसीईपी देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 2004 में 7 अरब डॉलर से बढ़कर 2014 में 78 अरब डॉलर हो गया था। इस फैसले से भारत का घरेलू उद्योग अभी तक उबर नहीं सका।    
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