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Hindi News ›   World ›   In Pew survey of 14 countries, 80 percent people are angry with China

‘प्यू’ के 14 देशों के सर्वे में 80 फीसदी लोग चीन से नाराज

Sat, 10 Oct 2020 04:13 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 10 Oct 2020 04:13 PM IST
सार

  • रिपोर्ट में नकारात्मक छवि से परेशान चीन, कोवाक्स में शामिल होगा
  • डब्लूएचओ की अगुवाई में कोरोना वैक्सीन के लिए काम कर रहा है कोवाक्स
  • कितनी कामयाब होगी चीन की ‘सॉफ्ट’ डिप्लोमेसी?

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In Pew survey of 14 countries, 80 percent people are angry with China
चीन - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

इस हफ्ते के शुरू में अमेरिका की मशहूर सर्वे संस्था प्यू रिसर्च की जारी हुई रिपोर्ट से अंदाजा लगा था कि इस वक्त दुनिया- खासकर पश्चिमी देशों में चीन की छवि कितनी बिगड़ी हुई है। 14 देशों में जनमत सर्वेक्षण के आधार पर प्यू रिसर्च ने बताया था कि इन सभी देशों में आधे से ज्यादा लोग चीन के बारे में प्रतिकूल राय रखते हैं। कहीं-कहीं तो ऐसी राय रखने वाले लोगों की संख्या 80 फीसदी से ऊपर पहुंच गई है। सर्वे जिन देशों में हुआ, उनमें ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, नीदरलैंड्स, स्वीडन, दक्षिण कोरिया, स्पेन, कनाडा और अमेरिका शामिल थे।

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ऐसा लगता है कि इस रिपोर्ट का चीन के नेताओं पर असर हुआ। रिपोर्ट आने के सिर्फ चार दिन बाद- शुक्रवार को- चीन ने कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए वैक्सीन बनाने के चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयास- कोवाक्स में शामिल होने का एलान किया। ये कोशिश विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की अगुआई में चल रहा है। ध्यान देने की बात यह है कि अमेरिका ने पिछले महीने इस साझा प्रयास का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया था, इसके लिए दुनिया भर में उसकी कड़ी आलोचना हुई। अब चीन ने इसमें शामिल होकर अपनी छवि सुधारने की अहम पहल की है।
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इसका तुरंत असर हुआ, कोवाक्स से जुड़े अधिकारियों ने चीन के फैसले का स्वागत किया और कहा कि चीन के शामिल होने से भविष्य में कोरोना वायरस की वैक्सीन का पूरी दुनिया में न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करने में बड़ी मदद मिलेगी। कोवाक्स में 75 देश शामिल हैं, जिनमें ब्रिटेन, जापान, जर्मनी जैसे धनी देश भी हैं.।इस गठजोड़ का मकसद 92 गरीब और मध्य आय वाले देशों में सभी लोगों तक वैक्सीन पहुंचाने के लिए धन जुटाना है। मकसद है कि 2021 तक वैक्सीन की दो अरब खुराकें वहां मुहैया कराई जाएं।
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चीन कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने के प्रयासों में भी आगे चल रहा है। चीन में इस समय चार वैक्सीन पर तीसरे चरण का परीक्षण चल रहा है। दुनिया में वैक्सीन तैयार करने के आधा दर्जन अन्य प्रयास भी चल रहे हैं। चीन ने अपने प्रयासों को वैज्ञानिकों के वैश्विक समूह के साथ साझा कर रखा है। इससे उसके वैक्सीन प्रयोगों को लेकर वैसे संदेह नहीं हैं, जैसा रूस के मामले में देखने को मिला था।

विश्लेषकों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में जिस तरह अमेरिका ने वैश्विक नेतृत्व के कदम वापस खींचे हैं, चीन ने उसमें अपने लिए नया मौका देखा है। वह अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा बन कर अपना वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अपनी मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण वह गरीब देशों को मदद देकर अपना नया गुट तैयार कर रहा है, जिसका असर अब दिखने लगा है।  
इसी हफ्ते संयुक्त राष्ट्र में 39 देशों ने साझा तौर पर मानवाधिकार के मुद्दे पर चीन की कड़ी आलोचना की। इनमें अमेरिका और पश्चिम यूरोप के ज्यादातर देश शामिल थे। उन्होंने चीन पर शिनजियांग प्रांत में उइघुर मुसलमानों के दमन करने और हांगकांग में नागरिक अधिकारों के हनन का आरोप लगाया। गौरतलब बात यह रही कि 50 से ज्यादा देशों ने इन मुद्दों पर चीन का समर्थन किया।


45 देशों ने तो एक लिखित बयान में कहा कि शिनजिंयाग में चीन के कदम आतंकवाद-विरोधी कार्रवाई हैं। इन देशों में पाकिस्तान समेत इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के सदस्य कई देश शामिल थे। उनके अलावा कई अफ्रीकी देश, सीरिया, वेनेजुएला, क्यूबा, उत्तर कोरिया आदि जैसे देशों ने भी चीन का समर्थन किया। अब चीन ने कोरोना वायरस से लड़ाई में शामिल होकर एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे अपनी छवि सुधारने का उसका मकसद एक सीमा तक जरूर कामयाब हो सकता है।


 
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