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नेपाल-चीन सीमा आपदा: तबाही से 48 दिन पहले ही उपग्रहों ने दिए थे संकेत, आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
Sat, 17 Oct 2026 06:51 PM IST
अमन मौर्या
अमर उजाला नेटवर्क, काठमांडू, नेपाल
अमर उजाला नेटवर्क, काठमांडू, नेपाल
Published by: अमन मौर्या
Updated Sat, 17 Oct 2026 06:51 PM IST
सार
आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त 2026 को आई भीषण आपदा से 48 दिन पहले पहाड़ी ढलान में हलचल के संकेत मिले थे। इस घटना में झील नहीं, बल्कि विशाल चट्टान और ग्लेशियर ढहने से तबाही मची थी।
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नेपाल बाढ़
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
हिमालय में विनाशकारी भूस्खलन और ग्लेशियर टूटने जैसी आपदाओं से पहले पहाड़ों की सतह में होने वाले बदलावों को उपग्रहों की मदद से पहचाना जा सकता है। नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त 2026 को हुई भीषण आपदा से करीब 48 दिन पहले ही एक पहाड़ी ढलान में हलचल के संकेत मिले थे। उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण में अधिकतम 40 सेंटीमीटर तक सतही विकृति दर्ज की गई। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की 13 अक्तूबर को जारी वैज्ञानिक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।
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रिपोर्ट के मुताबिक लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से से लगभग 13.2 करोड़ घन मीटर चट्टान और ग्लेशियर की बर्फ टूटकर ल्हेंदे खोला नदी घाटी में जा गिरी। इससे चट्टान, बर्फ, पानी और मलबे का तेज बहाव पैदा हुआ, जिसने नेपाल-चीन सीमा के आसपास के क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया। नेपाल के संबंधित आपदा प्राधिकरण के अनुसार इस घटना में नेपाल में कम से कम 1,451 लोगों की मौत हुई और 5,745 लोग लापता बताए गए। चीन में भी 43 लोगों की मौत और 519 के लापता होने की सूचना दी गई।
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झील फटने से नहीं, पहाड़ ढहने से आई तबाही
आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट अंडरस्टैंडिंग द ग्यिरोंग-रसुवा डिजास्टर ऑफ 26 अगस्त 2026 के अनुसार शुरुआत में इस घटना को हिमनदीय झील फटने से आई बाढ़ माना गया था। लेकिन वैज्ञानिक जांच में सामने आया कि पहाड़ की आधारभूत चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उसके साथ ऊपर मौजूद ग्लेशियर का हिस्सा भी उखड़ गया। इस तरह चट्टान, बर्फ, पानी और तलछट के एक साथ नीचे आने से विनाशकारी बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।वैज्ञानिकों ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 रडार उपग्रहों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। सात जुलाई से 24 अगस्त के बीच दर्ज बदलावों से पता चला कि आपदा से पहले ढलान में अस्थिरता के संकेत मौजूद थे। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सतह में हलचल का पता लगने का अर्थ यह नहीं है कि पहाड़ ढहने का सटीक समय बताया जा सकता है।
चेतावनी पहुंचने में हुई देर
आपदा ने मौजूदा पूर्व चेतावनी व्यवस्था की सीमाएं भी उजागर कीं। रिपोर्ट के अनुसार पहाड़ का ढहाव नेपाल के समयानुसार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर हुआ। मलबे का तेज बहाव करीब सात मिनट में सीमा क्षेत्र तक पहुंच गया, जबकि मोबाइल संदेशों के जरिये चेतावनी लगभग सुबह 9 बजकर 15 से 9 बजकर 16 मिनट के बीच जारी की गई। यानी प्रभावित क्षेत्र तक खतरा पहुंचने के काफी देर बाद।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश और नदी के जलस्तर पर आधारित प्रणालियां अचानक चट्टान और ग्लेशियर ढहने से पैदा होने वाले खतरों का समय रहते पता लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे मामलों में आपदा शुरू होने और आबादी तक उसका असर पहुंचने के बीच बहुत कम समय मिल सकता है।
कई कारणों की जांच जरूरी
रिपोर्ट में चट्टानों की भूगर्भीय कमजोरियों, 2015 के नेपाल भूकंप से हुई क्षति, स्थायी रूप से जमी जमीन यानी पर्माफ्रॉस्ट में बदलाव और ग्लेशियरों की स्थिति को संभावित कारकों के रूप में देखा गया है। हालांकि, किसी एक कारण को इस आपदा का निर्णायक ट्रिगर नहीं माना गया है।रिपोर्ट में जुलाई 2025 में प्योरपु की हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलने के कारण आई बाढ़ का भी उल्लेख है। दोनों घटनाओं में आपदा पैदा होने का तरीका अलग था। इसके अलावा, नेपाल के बूढ़ी गंडकी नदी बेसिन में चट्टानी हिमस्खलन और ग्लेशियर ढहने की एक अन्य घटना के संकेत भी मिले हैं, जिसका आकलन जारी है।आईसीआईएमओडी के वैज्ञानिकों के अनुसार उपग्रह निगरानी को जमीनी सर्वेक्षण, भूकंपीय आंकड़ों और जल विज्ञान संबंधी सूचनाओं से जोड़ना जरूरी है। नेपाल और चीन के बीच समय पर जानकारी साझा करना भी अहम है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में संभावित अस्थिर ढलानों की पहचान के साथ चेतावनी समय पर स्थानीय लोगों तक पहुंचाना ही ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
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बूढ़ी गंडकी में भी खतरे के संकेत
ग्यिरोंग-रसुवा गलियारे में 13 महीनों के भीतर दो बड़ी सीमा-पार आपदाएं हुईं। जुलाई 2025 में प्योरपु की हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलने से बाढ़ आई, जबकि अगस्त 2026 में लांगटांग लिरुंग पर्वत से चट्टान और ग्लेशियर ढहने से तबाही मची। अब नेपाल के बूढ़ी गंडकी नदी बेसिन में भी चट्टानी हिमस्खलन और ग्लेशियर ढहने के संकेत मिले हैं। उपग्रह चित्रों के आधार पर इस घटना का आकलन जारी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, उपग्रह निगरानी से अस्थिर पर्वतीय ढलानों की पहचान कर जोखिम वाले क्षेत्रों में नियमित निगरानी मजबूत की जा सकती है।
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रिपोर्ट के मुताबिक लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से से लगभग 13.2 करोड़ घन मीटर चट्टान और ग्लेशियर की बर्फ टूटकर ल्हेंदे खोला नदी घाटी में जा गिरी। इससे चट्टान, बर्फ, पानी और मलबे का तेज बहाव पैदा हुआ, जिसने नेपाल-चीन सीमा के आसपास के क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया। नेपाल के संबंधित आपदा प्राधिकरण के अनुसार इस घटना में नेपाल में कम से कम 1,451 लोगों की मौत हुई और 5,745 लोग लापता बताए गए। चीन में भी 43 लोगों की मौत और 519 के लापता होने की सूचना दी गई।
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झील फटने से नहीं, पहाड़ ढहने से आई तबाही
आईसीआईएमओडी की रिपोर्ट अंडरस्टैंडिंग द ग्यिरोंग-रसुवा डिजास्टर ऑफ 26 अगस्त 2026 के अनुसार शुरुआत में इस घटना को हिमनदीय झील फटने से आई बाढ़ माना गया था। लेकिन वैज्ञानिक जांच में सामने आया कि पहाड़ की आधारभूत चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और उसके साथ ऊपर मौजूद ग्लेशियर का हिस्सा भी उखड़ गया। इस तरह चट्टान, बर्फ, पानी और तलछट के एक साथ नीचे आने से विनाशकारी बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।वैज्ञानिकों ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 रडार उपग्रहों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। सात जुलाई से 24 अगस्त के बीच दर्ज बदलावों से पता चला कि आपदा से पहले ढलान में अस्थिरता के संकेत मौजूद थे। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि सतह में हलचल का पता लगने का अर्थ यह नहीं है कि पहाड़ ढहने का सटीक समय बताया जा सकता है।
चेतावनी पहुंचने में हुई देर
आपदा ने मौजूदा पूर्व चेतावनी व्यवस्था की सीमाएं भी उजागर कीं। रिपोर्ट के अनुसार पहाड़ का ढहाव नेपाल के समयानुसार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर हुआ। मलबे का तेज बहाव करीब सात मिनट में सीमा क्षेत्र तक पहुंच गया, जबकि मोबाइल संदेशों के जरिये चेतावनी लगभग सुबह 9 बजकर 15 से 9 बजकर 16 मिनट के बीच जारी की गई। यानी प्रभावित क्षेत्र तक खतरा पहुंचने के काफी देर बाद।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश और नदी के जलस्तर पर आधारित प्रणालियां अचानक चट्टान और ग्लेशियर ढहने से पैदा होने वाले खतरों का समय रहते पता लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे मामलों में आपदा शुरू होने और आबादी तक उसका असर पहुंचने के बीच बहुत कम समय मिल सकता है।
कई कारणों की जांच जरूरी
रिपोर्ट में चट्टानों की भूगर्भीय कमजोरियों, 2015 के नेपाल भूकंप से हुई क्षति, स्थायी रूप से जमी जमीन यानी पर्माफ्रॉस्ट में बदलाव और ग्लेशियरों की स्थिति को संभावित कारकों के रूप में देखा गया है। हालांकि, किसी एक कारण को इस आपदा का निर्णायक ट्रिगर नहीं माना गया है।रिपोर्ट में जुलाई 2025 में प्योरपु की हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलने के कारण आई बाढ़ का भी उल्लेख है। दोनों घटनाओं में आपदा पैदा होने का तरीका अलग था। इसके अलावा, नेपाल के बूढ़ी गंडकी नदी बेसिन में चट्टानी हिमस्खलन और ग्लेशियर ढहने की एक अन्य घटना के संकेत भी मिले हैं, जिसका आकलन जारी है।आईसीआईएमओडी के वैज्ञानिकों के अनुसार उपग्रह निगरानी को जमीनी सर्वेक्षण, भूकंपीय आंकड़ों और जल विज्ञान संबंधी सूचनाओं से जोड़ना जरूरी है। नेपाल और चीन के बीच समय पर जानकारी साझा करना भी अहम है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में संभावित अस्थिर ढलानों की पहचान के साथ चेतावनी समय पर स्थानीय लोगों तक पहुंचाना ही ऐसी आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
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बूढ़ी गंडकी में भी खतरे के संकेत
ग्यिरोंग-रसुवा गलियारे में 13 महीनों के भीतर दो बड़ी सीमा-पार आपदाएं हुईं। जुलाई 2025 में प्योरपु की हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलने से बाढ़ आई, जबकि अगस्त 2026 में लांगटांग लिरुंग पर्वत से चट्टान और ग्लेशियर ढहने से तबाही मची। अब नेपाल के बूढ़ी गंडकी नदी बेसिन में भी चट्टानी हिमस्खलन और ग्लेशियर ढहने के संकेत मिले हैं। उपग्रह चित्रों के आधार पर इस घटना का आकलन जारी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, उपग्रह निगरानी से अस्थिर पर्वतीय ढलानों की पहचान कर जोखिम वाले क्षेत्रों में नियमित निगरानी मजबूत की जा सकती है।