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Hindi News ›   World ›   How long will Israel be able to survive war against Iran without the US? A long war with Tehran is not easy

कठिन चुनौती: US के बिना ईरान के सामने दो हफ्ते तक युद्ध में टिक पाएगा इस्राइल? तेहरान से लंबी लड़ाई आसान नहीं

Sun, 22 Jun 2025 03:48 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क, तेल अवीव/ वाशिंगटन
अमर उजाला नेटवर्क, तेल अवीव/ वाशिंगटन Published by: शिव शुक्ला Updated Sun, 22 Jun 2025 03:48 AM IST
सार

ईरान और अमेरिकी विदेश नीति के जानकार करीम सादजपोर के अनुसार, ईरान की रणनीति स्पष्ट है, वह प्रत्यक्ष युद्ध के साथ-साथ अपने छोटे सहयोगी (प्रॉक्सी ग्रुप्स) जैसे हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया के जरिये इस्राइल को थकाए रखना चाहता है। जब तक अमेरिका खुलकर मैदान में नहीं उतरता, ईरान खुद को ‘शिकार’ के रूप में पेश करेगा, लेकिन हर जवाबी हमले की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष तौर पर निभाता रहेगा।

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How long will Israel be able to survive  war against Iran without the US? A long war with Tehran is not easy
इस्राइल और ईरान के प्राधनमंत्री - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस्राइल और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच पूर्ण हवाई युद्ध छिड़ा रहता है, तो क्या अमेरिका की प्रत्यक्ष उपस्थिति के बिना इस्राइल आगामी 14 दिनों तक टिक पाएगा? सामरिक विशेषज्ञों ने यह विश्लेषण सामरिक शक्ति, सैन्य क्षमताओं, सहयोगी देशों, भौगोलिक स्थितियों, हथियार प्रणालियों और नागरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

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पश्चिम एशिया की ज्वलंत होती लड़ाई में आने वाले दो सप्ताह बेहद निर्णायक हो सकते हैं। इस्राइल लगातार नौ दिनों से ईरान समर्थित ठिकानों और सैन्य प्रतिष्ठानों पर हवाई हमले कर रहा है, लेकिन सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यह मोर्चा अब जटिलता की ओर बढ़ रहा है। क्या इस्राइल इसी आक्रामक शैली में टिका रहेगा, या फिर अमेरिका की सीधी भूमिका के अभाव में उसे रणनीतिक विराम लेना पड़ेगा। इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बदले हुए सुर कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं। इस पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस्राइल को थकान और रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
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इस्राइली मिलिट्री इंटेलिजेंस के पूर्व प्रमुख और आईएनएसएस (इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज) के वरिष्ठ विश्लेषक अमोस यादलिन का मानना है कि इस्राइल के पास रणनीतिक बढ़त है, लेकिन वह लंबी लड़ाई के लिए नहीं बना है। ईरान अपने प्रॉक्सी नेटवर्क के माध्यम से मोर्चा खींच रहा है, जिससे इस्राइल को हर दिन संसाधनों और सैन्य मनोबल की कीमत चुकानी पड़ रही है। यादलिन ने चेताया कि यदि अमेरिका निर्णायक सैन्य समर्थन नहीं देता तो इस्राइल को अगले 10–15 दिनों में ठहराव की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
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ईरान के लिए मददगार साबित होंगे छोटे सहयोगी
ईरान और अमेरिकी विदेश नीति के जानकार करीम सादजपोर के अनुसार, ईरान की रणनीति स्पष्ट है, वह प्रत्यक्ष युद्ध के साथ-साथ अपने छोटे सहयोगी (प्रॉक्सी ग्रुप्स) जैसे हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया के जरिये इस्राइल को थकाए रखना चाहता है। जब तक अमेरिका खुलकर मैदान में नहीं उतरता, ईरान खुद को ‘शिकार’ के रूप में पेश करेगा, लेकिन हर जवाबी हमले की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष तौर पर निभाता रहेगा। इस्राइली रक्षा विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस युद्ध में ईरान के प्रॉक्सी ग्रुप गोपनीय रूप से पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं।

अमेरिका की भूमिका निर्णायक लेकिन अब तक सीमित
ईरान की परमाणु नीति और धार्मिक सत्ता की गहरी जानकारी रखने वाले काउंसिल आफ  फॉरेन रिलेशंस के विश्लेषक रे तकीह ने कहा कि व्हाइट हाउस ईरान के साथ सीधे युद्ध में जाने से बचना चाहता है, लेकिन यदि अगले 2 हफ्तों में हिजबुल्लाह या ईरान समर्थित किसी तत्व द्वारा इस्राइली शहरों पर बड़ा हमला हुआ तो अमेरिका को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। फिलहाल अमेरिका सैन्य सहायता और खुफिया जानकारी देने तक ही सीमित है। हालांकि अमेरिका द्वारा सीधे दखल देने के बाद यह आग पश्चिम एशिया के साथ वैश्विक स्तर पर फैल सकती है।


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ट्रंप बोले, ईरान हमसे बात करना चाहता है, यूरोप से नहीं
इस्राइल-ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए यूरोप की कूटनीतिक पहल को खारिज करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेहरान यूरोपीय शक्तियों के बजाय वाशिंगटन के साथ सीधी वार्ता करना पसंद करता है। उन्होंने कहा, ईरान यूरोप से नहीं, हमसे बात करना चाहता है। उन्होंने मध्यस्थता के लिए यूरोप की क्षमता पर सवाल उठाया। मालूम हो कि डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों विभिन्न देशों के बीच मध्यस्थता कर शांतिदूत बनने की कोशिश कर रहे हैं।

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