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अनगिनत खतरों से जूझने को मजबूर हैं हाथ से मैला ढोने वाले सफाईकर्मी

Fri, 15 Nov 2019 03:52 AM IST
संजीव कुमार झा यूएन हिंदी समाचार
यूएन हिंदी समाचार Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 15 Nov 2019 03:52 AM IST
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Hand scavengers are forced to fight countless dangers
हाथ से मैला ढोने वाले सफाईकर्मी - फोटो : यूएन हिंदी समाचार

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि विकासशील देशों में स्वच्छता कर्मचारियों की दुर्दशा पर तात्कालिक कार्रवाई होनी चाहिए। मंगलवार, 19 नवंबर, को 'विश्व शौचालय दिवस' से ठीक पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शौचालय, सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करने वाले करोड़ों लोगों के लिए खतरों को उजागर किया है। यूएन एजेंसी ने कहा है कि सफाई कर्मचारियों के अधिकार, उनका स्वास्थ्य और सम्मान खतरे में है।

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यूएन एजेंसी का कहना है कि ये कर्मचारी एक जरूरी सेवा दे रहे हैं, लेकिन इससे उनके खुद के स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है और समाज भी उन्हें बहिष्कृत कर देता है। एक नई रिपोर्ट पर आधारित जारी बयान में आगाह किया गया है कि ये कर्मचारी अक्सर बिना किसी उपकरण या सुरक्षा के काम करते हैं और मानव कचरे के सीधे संपर्क में आते हैं, जिससे उनमें खुद भी अनगिनत स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों का खतरा पैदा हो जाता है।
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रिपोर्ट में कहा गया है, "सफाई कार्मचारियों की दुर्दशा तभी सामने आती है जब या तो ये महत्वपूर्ण सेवाएँ ठप हो जाएँ और नालियों, सड़कों, नदियों, और समुद्र तटों पर मल इकट्ठा हो जाए, या फिर कभी सफाई करते हुए मज़दूरों की मौत होने की इक्का-दुक्का ख़बरें मीडिया में आ जाएं.”

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कथित कलंक के शिकार 

अंतरराष्ट्रीय श्रम  संगठन (ILO), विश्व बैंक (World Bank) और वॉटरएड (WaterAid) के साथ साझा रूप से प्रकाशित इस रिपोर्ट - "Health, Safety and Dignity of Sanitation Workers: An Initial Assessment" में कम और मध्य आय वाले देशों के नौ सफाई कर्मचारियों के जीवन का अध्ययन किया गया है, जो गढ्ढे और टैंक साफ करने, मल वा हटाने और सीवर के रख-रखाव का काम करते हैं।


समाज में उचित स्थान ना होने के कारण भी स्वच्छता कर्मचारियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

रिपोर्ट में इन कर्मचारियों को "अदृश्य, अशिक्षित और बहिष्कृत" बताते हुए कहा गया है कि सफाई कर्मचारियों को कई चुनौतियों का सामना इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि उनके काम की अहमियत को कोई स्वीकार ही नहीं करता।

हालांकि इनमें से कुछ कर्मचारियों को स्वास्थ्य लाभ, पेंशन और कानूनी सुरक्षा वाली पक्की नौकरियां प्राप्त है, लेकिन में ज्यादातर लोग समाज के "सबसे कमजोर, हाशिए पर धकेले हुए गरीब और पीड़ित" तबके से आते हैं। 

खतरनाक वातावरण में काम करते हुए जिन विषैले जैविक और रासायनिक एजेंटों से इनका सामना होता है, उसका जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि “इन्हें जो काम दिया जाता है वो बेहद निम्न-श्रेणी का, थकाने वाला और जोखिम से भरपूर है।

रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि स्वच्छता रखने के अलावा ये भी जरूरी है कि जो लोग हमारे स्वास्थ्य की रक्षा करने वाली स्वच्छता सेवाएँ चलाते हैं, उन्हें सुरक्षित और गरिमामय वातावरण दिया जाए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि असंगठित क्षेत्र के बाक़ी लोगों की तुलना में सफाई क्षेत्र के अनौपचारिक कार्यकर्ता कहीं ज्यादा असुरक्षित हैं। इन अनौपचारिक स्वच्छता कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिलता है और ये स्वास्थ्य सेवा जैसे लाभों से वंचित रहते हैं. साथ ही इनकी सुरक्षा के लिए कानून और प्रवर्तन नीतियां भी बेहद कमज़ोर हैं।

खराब निवेश और बुनियादी ढांचे के अभाव में इनमें से लाखों लोग हर साल पानी की कमी, साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता से जुड़ी बीमारियों के मरीज हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार केवल साफ-सफाई की कमी की वजह से ही सालाना लगभग चार लाख 32 हजार लोगों की मौत डायरिया की चपेट में आकर हो जाती है।

साथ ही, हैजा, पेचिश, टायफायड, हेपेटाइटिस-ए और पोलियो सहित अन्य बीमारियों के संक्रमण फैलने का एक बड़ा कारण सफाई की कमी रही है। 

विकासशील देशों में दिशानिर्देशों की कमी

वर्ष 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा स्थापित 17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों में से एक, टिकाऊ विकास लक्ष्य-6 का उद्देश्य वर्ष 2030 तक सभी के लिए साफ पानी, सही व उपयुक्त शौचालय और साफ-सफाई उपलब्ध कराना है। 

सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र, स्वच्छता कार्यकर्ताओं के सुरक्षा मानकों को विभिन्न देशों की राष्ट्रीय स्वच्छता नीतियों और जोखिम-मूल्यांकन और प्रबंधन में शामिल करने में मदद दे रहा है।

रिपोर्ट में दक्षिण अफ़्रीका का उदाहरण देते हुए उन क्षेत्रों को भी रेखांकित किया गया जहां सफाई के काम को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करके उसे औपचारिक रूप दिया गया है या फिर जहां सार्वजनिक और निजी कर्मचारियों को इस कार्य के लिए उचित उपकरण और प्रशिक्षण दिया जाता है और राष्ट्रीय श्रम मानकों का पूर्ण पालन होता है।

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी का मानना है कि कई चुनौतियां का सामना तो स्वच्छता कर्मचारियों को इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि समाज उन्हें और उनके काम को उचित मान्यता नहीं देता।

दुनिया में कुछ ही विकासशील देश ऐसे हैं जहां सफ़ाई कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए उचित नीतियां हैं।

स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक जहां कानून मौजूद भी हैं, वहां उन्हें लागू करने के लिए वित्तीय या तकनीकी साधनों की कमी होती है, और फिर ज्यादातर अनौपचारिक और असंगठित होने की वजह से भी विविध प्रकार की चुनौतियां सामने आती हैं। 

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