संतोषम परम सुखम!: बढ़ती गैर-बराबरी छीन रही है लोगों के जीवन की शांति
अध्ययन का नेतृत्व करने वाले विशेषज्ञ डॉ. डेविड बारट्रैम का दावा है कि यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है। उन्होंने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा- ‘जब गैर-बराबरी बढ़ती है, तो ऊंची आमदनी वाले लोगों का ध्यान भी अपनी हैसियत पर केंद्रित नहीं रहता। वे उन लोगों को देखते हैं, जिनके पास उनसे ज्यादा कुछ है...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी लोगों के जीवन का चैन छीन रही है। जिन देशों में आर्थिक गैर-बराबरी बढ़ने के साथ ही समृद्धि भी बढ़ी है, वहां भी यही हाल है। ये बात एक नए अध्ययन से सामने आई है। ये अध्ययन ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ लीस्टर के विशेषज्ञों ने किया है। उनके मुताबिक अब तक यही माना जाता था कि आम आर्थिक विषमता का जीवन में संतुष्टि से कोई संबंध नहीं है। लेकिन 78 देशों के आंकड़ों के आधार पर हुए ताजा अध्ययन ने ये बात गलत साबित कर दी है। इस अध्ययन में बीते चार दशक में इकट्ठा हुए आंकड़ों पर ध्यान दिया गया।
ताजा अध्ययन का नेतृत्व करने वाले विशेषज्ञ डॉ. डेविड बारट्रैम का दावा है कि यह अपनी तरह का पहला अध्ययन है। उन्होंने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा- ‘जब गैर-बराबरी बढ़ती है, तो ऊंची आमदनी वाले लोगों का ध्यान भी अपनी हैसियत पर केंद्रित नहीं रहता। वे उन लोगों को देखते हैं, जिनके पास उनसे ज्यादा कुछ है। लोगों को यह कभी महसूस नहीं होता कि उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं।’
गिनी को-एफिशिएंट पैमाना
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों की आमदनी कम है और जो पीछे छूट गए हैं, वे अपने को बहिष्कृत और असंतुष्ट महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे उन लोगों की बराबरी भी नहीं कर पा रहे हैं, जिनकी औसत आमदनी है। ताजा अध्ययन रिपोर्ट को ब्रिटिश सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन के ऑनलाइन सम्मेलन में पेश किया जाएगा। डॉ. बारट्रैम के मुताबिक इस अध्ययन के दौरान गिनी को-एफिशिएंट पैमाने के बरक्स लोगों के संतुष्टि स्तर से संबंधित आंकड़ों की जांच-परख की गई। गिनी को-एफिशिएंट आर्थिक गैर-बराबरी मापने का दुनियाभर में स्वीकृत पैमाना है।
इस अध्ययन के दौरान पाया गया कि 1981 में ब्रिटेन मंदी का शिकार था। उस समय वहां संतुष्टि स्तर 7.7 था। 1980 के दशक से आई खुशहाली के साथ गैर-बराबरी बढ़ी। 1999 आते-आते एक से 10 के पैमाने पर वहां संतुष्टि गिर कर 7.4 रह गई। बाद के वर्षों में जब गैर-बराबरी घटाने के उपाय किए गए, तो देखा गया कि 2018 में संतुष्टि स्तर पर 7.8 पर पहुंच गई है।
धनी देशों में गैर-बराबरी बढ़ी
डॉ. बारट्रैम ने कहा- ‘ब्रिटेन के आंकड़े आम निष्कर्ष से मेल खाते हैं। जिन धनी देशों में गैर-बराबरी बड़ी है, वहां उसका जीवन संतोष के भाव पर खराब असर देखा गया है। हाल के वर्षों में लगभग तमाम धनी देशों में गैर-बराबरी बढ़ी है।’ उन्होंने कहा कि गैर-बराबरी और जीवन संतोष के बीच ऐसा रिश्ता सिर्फ धनी देशों की ही बात नहीं है।
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1990 में संतुष्टि स्तर 6.7 था। 2006 आते-आते यह गिर कर 5.8 तक चली गई। जबकि ये वो अवधि है, जब भारत में समृद्धि तेजी से बढ़ी थी। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी बीते चार दशकों के दौरान संतुष्टि स्तर पर में गिरावट देखने को मिली है। जबकि इस दौरान पोलैंड, पेरू, मेक्सिको और यूक्रेन (रूसी हमले के पहले तक) में गैर बराबरी घटी, तो देखा गया कि वहां के लोगों में अपने जीवन से संतुष्ट होने का भाव बढ़ा है।