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ग्लोबल वॉर्मिंग- ग्लेशियर को पिघलने से रोकने की तरकीब वैज्ञानिकों ने खोज निकाली

Wed, 26 Sep 2018 01:24 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला
न्यूज डेस्क,अमर उजाला Updated Wed, 26 Sep 2018 01:24 PM IST
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global warming- scientist new invention to protect glacier from melting
पिघलते ग्लेशियर
दुनिया भर में आ रहीं प्राकृतिक आपदायें हर साल कई जिंदगियां लील लेती हैं। लेकिन अगर आप इसके पीछे के कारण के बारे में गंभीरता से विचार करेंगे तो मानेंगे कि इस हालत के लिए इंसान ही जिम्मेदार है। प्रकृति के साथ हमने लगातार और भयानक ज्यादती की है जिस वजह से हमें उसके प्रतिशोध का भाजन बनना पड़ रहा है। ग्लेशियर ग्लोबल वॉरमिंग की वजह से तेजी से पिघल रहे हैं और दुनिया के लिए ये सबसे ज्यादा चिंता की बात है।   
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क्या इन पिघलते ग्लेशियरों को तबाही मचाने से रोका जा सकता है ? तो इसका जवाब तलाशने में दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिक निरंतर शोध कर रहे हैं। ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने नई तरकीब निकाली है। एक ऐसी तकनीक जो ग्लेशियर को भारी नुकसान होने से बचा सकती है।
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ग्लेशियर को पिघलने से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच बनाने की तैयारी हो चुकी है। इसके तहत समुद्र में 980 फीट ऊंची धातु की दीवार बनानी होगी। जो पहाड़ के नीचे मौजूद गर्म पानी को ग्लेशियरों तक नहीं पहुंचने देगी। ऐसे में हिमखंड टूटकर समुद्र में नहीं गिरेंगे। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने में भी कमी आएगी। 
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समुद्र के जल स्तर बढ़ने की वजह से धरती सागर में समाती जा रही है और गर्भ में भूकंप आने की वजह से अक्सर सूनामी और तूफान से तबाही मचती है। अगर ये तकनीक काम कर गई तो तटीय शहरों के डूबने का खतरा भी कम होगा। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया है कि इस दीवार में 0.1 क्यूबिक किमी से 1.5 क्यूबिक किमी तक धातु लगेगी। 

इस धातु की दीवार बनाने में अरबों रुपए खर्च होने का अनुमान है। इससे पहले इस तकनीक से दुबई का पाम जुमैरा पास और हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाया जा चुका है। दुबई के पाम जुमैरा के लिए 0.1 क्यूबिक किमी धातु से दीवार बनाई गई थी, जिस पर 86 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। 


2016 में नासा की जेट प्रपुल्शन लेबोरेटरी ने बताया था कि पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ काफी तेजी से पिघल रही है। एक रिपोर्ट में ये भी बताया गया था कि पहाड़ के नीचे मौजूद गर्म पानी बर्फ पिघलने का कारण हो सकता है। इसके बाद बीजिंग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक जॉन मूरे और वोलोविक दुनिया के सबसे बड़े ग्लेशियर में से एक थ्वाइट्स पर अध्ययन किया।
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