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Global Hunger Index: नेपाल पर मंडरा रहा भूख-कुपोषण की समस्या के गंभीर होने का खतरा, जानें क्या कहते हैं आंकड़े
Sun, 23 Oct 2022 03:59 PM IST
शिव शरण शुक्ला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: शिव शरण शुक्ला
Updated Sun, 23 Oct 2022 03:59 PM IST
सार
नेपाल के स्वास्थ्य और जनसंख्या मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि देश में भूख और कुपोषण की समस्या के पीछे मुख्य कारण खाद्य सुरक्षा का अभाव है। कोविड-19 महामारी के बाद देश में ये समस्या और गंभीर हो गई है।
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नेपाल के पीएम शेर बहादुर देउबा
- फोटो : ANI
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विस्तार
नेपाल में गरीबी और कुपोषण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैँ। हालांकि ये स्थिति बीते कई वर्षों के दौरान अधिक गंभीर हुई है, लेकिन इस पर चर्चा हाल में ताजा ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी होने के बाद तेज हुई है। इस इंडेक्स में नेपाल को 19.1 अंक प्राप्त हुए। यह इस बात का संकेत है कि नेपाल भूख की समस्या गंभीर स्थिति के करीब पहुंच गई है।
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इस इंडेक्स में अगर किसी देश को 10 से कम अंक मिलें, तो उसका मतलब यह समझा जाता है कि वहां भूख की स्थिति अपेक्षाकृत कम है। 10 से 19 अंक तक समस्या को हलका माना जाता है। 20 से 34.9 अंक के बीच आने वाले देश गंभीर श्रेणी में माने जाते हैं, जबकि 35 से 49.9 अंक तक को खतरनाक और 50 से ऊपर अंक मिलने को बेहद खतरनाक स्थिति कहा जाता है।
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पोषण विशेषज्ञ डॉ. अतुल चीर ने कहा है- ‘अगर अतीत से तुलना करें, तो स्थिति सुधरी है। लेकिन इस पर खुश होने का कोई कारण नहीं है। हम अभी उस हाल में हैं, जिसमें भूख की समस्या गंभीर रूप ले सकती है।’ चीर ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं, जिन्हें पोषण के लिहाज से पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है।’
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ग्लोबर हंगर इंडेक्स में भूख को तीन पैमानों पर मापा जाता है। ये हैं- खाद्य की नाकाफी सप्लाई, बाल कुपोषण, और बाल मृत्यु दर। बाल कुपोषण के कारण बच्चों का पर्याप्त शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है। पांच साल से कम उम्र के अविकसित बच्चों की संख्या के लिहाज से नेपाल ने अच्छी प्रगति की है। 2001 में देश में ऐसे बच्चों की संख्या 57 प्रतिशत थी, जो अब 32 फीसदी के करीब रह गई है। फिर भी ये संख्या चिंताजनक है।
नेपाल के स्वास्थ्य और जनसंख्या मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि देश में भूख और कुपोषण की समस्या के पीछे मुख्य कारण खाद्य सुरक्षा का अभाव है। कोविड-19 महामारी के बाद देश में ये समस्या और गंभीर हो गई है। महामारी से आम जिंदगी में जो रुकावट आई, उस कारण हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। ऊपर से यूक्रेन युद्ध के कारण अनाज समेत जरूरी चीजों के आयात महंगे हो गए हैं। इससे हजारों लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस सूरत के लिए राजनेताओं को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि नेता कुर्सी की जोड़तोड़ में इस तरह उलझे रहते हैं कि भूख जैसी बुनियादी समस्या उनके एजेंडे से बाहर बनी रहती है। अभी भी जबकि ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट से बिगड़ती स्थिति पर रोशनी पड़ी है, तमाम दल चुनावी बिसात सजाने में लगे हुए हैँ। चुनाव प्रचार के दौरान कहीं भी ये मुद्दा उठते नहीं देखा गया है। जबकि इस दिशा में तुरंत कदम उठान की जरूरत है।
राष्ट्रीय योजना आयोग में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप विभाग के प्रमुख डॉ. किरण रुपाखेती ने काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘हमें यह स्वीकार करना होगा कि कुपोषण की समस्या के समाधान के लिए तुरंत हस्तक्षेप करने की जरूरत है। अगर जल्द से जल्द इसका समाधान नहीं किया गया, तो समस्या और गंभीर रूप ले लेगी।’