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G7 Summit: जी-7 के नए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लान पर तुरंत ही उठे कई सवाल

Mon, 27 Jun 2022 02:54 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, एलमाउ
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, एलमाउ Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 27 Jun 2022 02:54 PM IST
सार

चीन ने बीआरआई के तहत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में दर्जनों विकासशील देशों से गहरा रिश्ता बना लिया है। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों का आरोप है कि बीआरआई के तहत चीन जो कर्ज देता है, उसमें गोपनीय शर्तें शामिल की जाती हैं। इस कारण संबंधित देश को बताई गई रकम की तुलना में अधिक रकम चुकानी पड़ती है...

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G7 Summit 2022: US President Joe biden announced 600 billion doller global infrastructure plan to counter china BRI project
जी-7 नेता - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

दुनिया के सबसे धनी ‘लोकतांत्रिक’ देशों के समूह जी-7 के नेताओं ने रविवार को जब अपना वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लान घोषित किया, तो तुरंत उस पर कई सवाल उठाए गए। 600 बिलियन डॉलर की इस योजना का एलान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने किया। हालांकि बाइडन ने अपने भाषण में चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक यह जग-जाहिर है कि ये योजना चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के जवाब में तैयार की गई है।

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साल भर पहले जब जी-7 की शिखर बैठक ब्रिटेन में हुई थी, तब भी ऐसी योजना का एलान हुआ था। उस समय उसका नाम बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड रखा गया था। लेकिन उस पर कोई प्रगति नहीं हुई। इस बीच बिल्ड बैक बेटर नाम से अमेरिका में घोषित बाइडन की योजना को उनकी ही डेमोक्रेटिक पार्टी का पूरा समर्थन नहीं मिल सका। अब बाइडन ने पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर नाम से नई योजना घोषित की है। इस बीच यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन अलग-अलग अपनी ऐसी योजना का एलान कर चुके हैं।

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चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट की सच्चाई

चीन ने बीआरआई के तहत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में दर्जनों विकासशील देशों से गहरा रिश्ता बना लिया है। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों का आरोप है कि बीआरआई के तहत चीन जो कर्ज देता है, उसमें गोपनीय शर्तें शामिल की जाती हैं। इस कारण संबंधित देश को बताई गई रकम की तुलना में अधिक रकम चुकानी पड़ती है। इसके अलावा चीनी प्रोजेक्ट में जलवायु परिवर्तन संबंधी लक्ष्यों की अनदेखी की जाती है।

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अमेरिकी अधिकारियों ने रविवार को कहा कि अब पश्चिमी देश विकासशील देशों को अपना विकल्प देंगे। बाइडन ने कहा कि नई योजना के तहत कई देशों में शुरुआती प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है। उनमें अंगोला में सौर ऊर्जा परियोजना, सेनेगल में वैक्सीन उत्पादन कारखाना लगाने की परियोजना, रोमानिया में मोड्यूलर रिएक्टर लगाने की परियोजना, और सिंगापुर से मिस्र होते हुए फ्रांस तक समुद्र के अंदर दूरसंचार केबल बिछाने की परियोजना शामिल है।

ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने अपनी एक रिपोर्ट में ध्यान दिलाया है कि इस बीच ईयू 300 बिलियन यूरो की अपनी ग्लोबल गेटवे योजना पर काम शुरू कर चुकी है। उधर ब्रिटेन ने क्लीन ग्रीन इनिशिएटिव प्रोजेक्ट लॉन्च किया है। जापान भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की 65 बिलियन डॉलर की योजना का खाका तैयार कर रहा है। अब पार्टनरशिप फॉर ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर योजना के साथ इन सबका तालमेल बनाने की चुनौती पेश आएगी।

अमेरिकी योजना से फायदा उठाएगा चीन

रविवार को जर्मनी के चांसलर ओलोफ शोल्ज ने परोक्ष रूप से स्वीकार किया कि इन योजनाओं से भ्रम पैदा हुआ है। उन्होंने कहा- ‘अगर जी-7 देश अपने प्रयासों को एक छाते के अंदर ला सकें, तो उसके अपने फायदे होंगे।’ विश्लेषकों के मुताबिक नई घोषित योजना के लिए फंडिंग की समस्या कैसे दूर होगी, इसका कोई रोडमैप अभी नहीं पेश किया गया है। बाइडेन ने कहा कि अमेरिका अगले पांच साल में 200 बिलियन डॉलर जुटाएगा। ये रकम सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के योगदान से जुटाई जाएगी। लेकिन क्या निजी क्षेत्र सचमुच इसमें भूमिका निभाएगा, ये अहम सवाल है।



अर्थशास्त्री डेविड पी गोल्डमैन ने कहा है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पूंजीगत सामग्रियों का दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक चीन ही है। वैसे में अगर अमेरिकी योजना सचमुच परवान चढ़ी तो उसका मतलब चीनी कंपनियों को नए ग्राहक मिलना होगा। यानी संभवतः इस योजना में भी चीन को फायदा होगा।

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