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फ्रांसः नए विधेयक से राष्ट्रपति मैक्रों ने बढ़ाया अपना संकट

Mon, 23 Nov 2020 04:44 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 23 Nov 2020 04:44 PM IST
सार

नए मसौदे में प्रावधान है कि अगर किसी मीडिया संस्थान ने “नुकसान पहुंचान के इरादे से” किसी पुलिसकर्मी की तस्वीर दिखाई, तो यह दंडनीय अपराध होगा। इसके लिए एक साल तक की कैद और 45 हजार यूरो का जुर्माना हो सकेगा...

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France President Emmanuel Macron increased his crisis with the new bill
France Protest - फोटो : Agency

विस्तार

आर्थिक संकट को लेकर जन आक्रोश झेल रहे फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपनी मुसीबत खुद और बढ़ा ली है। मीडिया पर लगाम लगाने के लिए लाए गए एक विधेयक को लेकर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक हाल में मैक्रों की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। 2017 में जबरदस्त उम्मीदें जगाते हुए सत्ता में आए मैक्रों के खिलाफ अब आम मजदूर, किसान, छात्र और पत्रकार लामबंद हो गए हैँ। इसका नजारा बीते शनिवार देश की सड़कों पर दिखा, जब लाखों की संख्या में लोगों ने उनकी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया।

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ताजा गुस्सा एक नए सुरक्षा कानून के मसविदे को लेकर भड़का है। विरोधियों का आरोप है कि इससे सूचना की स्वतंत्रता और मीडिया के अधिकार संकुचित होंगे। इसमें प्रावधान है कि अगर किसी मीडिया संस्थान ने “नुकसान पहुंचान के इरादे से” किसी पुलिसकर्मी की तस्वीर दिखाई, तो यह दंडनीय अपराध होगा। इसके लिए एक साल तक की कैद और 45 हजार यूरो का जुर्माना हो सकेगा।
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सरकार का कहना है कि ये कानून पुलिस अधिकारियों को हिंसा से बचाने के लिए बनाया जा रहा है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे पत्रकारों और दूसरे आम लोगों के लिए खतरा पैदा होगा, जो ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के फोटो खींचते हैं। खासकर जन प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा के समय ऐसी तस्वीरें खींचना या वीडियो बनाना आम बात है।
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मानव अधिकार संगठनों ने फ्रांस सरकार की इस कोशिश की कड़ी आलोचना की है। जिन संगठनों ने इसके खिलाफ बयान जारी किए हैं, उनमें रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर, ह्यमून राइट्स लीग और फ्रांस के कई पत्रकार संघ शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयुक्त और फ्रांस के ह्यूमन राइट्स आयोग के प्रमुख ने भी इस कानून को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि नए कानून से लोगों के मौलिक अधिकारों की अनदेखी हो सकती है।  

इन आलोचनाओं के बाद मैक्रों सरकार की तरफ से सफाई दी गई है कि उसका इरादा नागरिकों या मीडिया के मौलिक अधिकारों को संकुचित करना नहीं है। प्रधानमंत्री ज्यां कातें ने कहा है कि इस कानून से सूचना की स्वतंत्रता बाधित नहीं होगी। इसके दायरे में सिर्फ वो लोग आएंगे, जो जानबूझ कर पुलिसकर्मियों को नुकसान पहुंचाने के लिए फोटो खींचते हैं।

लेकिन इस स्पष्टीकरण से देश में नाराजगी शांत नहीं हुई है। ये मुद्दा इतना गरमा गया है कि शनिवार को पत्रकारों के साथ-साथ हजारों की संख्या में छात्र और आम लोग भी जन प्रदर्शनों में शामिल हुए। इसके अलावा मशहूर येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग भी प्रदर्शनों का हिस्सा बने।

जानकारों के मुताबिक इस नाराजगी की वजह फ्रांस के सुरक्षा बलों का संदिग्ध अतीत है। उन पर अकसर प्रदर्शनकारियों के साथ क्रूरता से पेश आने के इल्जाम लगते रहे हैं। खासकर अश्वेत और अरब देशों से आए अल्पसंख्यकों के विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाइयों को लेकर गंभीर सवाल उठाते रहे हैँ। येलो वेस्ट आंदोलन के दौरान भी पुलिस पर ज्यादती करने के आरोप लगे थे।

येलो वेस्ट प्रदर्शनों की शुरुआत 2018 में तब हुई थी, जब मैक्रों सरकार ने परिवहन शुल्क बढ़ा दिए थे। ये प्रदर्शन तब से आज तक हर सप्ताहांत में होते हैं। इसमें शामिल होने वाले लोग पीले रंग का जैकेट पहनकर सड़कों पर आते हैं। येलो वेस्ट आंदोलन फ्रांस में बढ़ती आर्थिक समस्याओं और मैक्रों सरकार की ‘पूंजीवाद समर्थक’ नीतियों के विरोध का प्रतीक बन गया है।

ये आंदोलन मार्च में लगे लॉकडाउन के दौरान ठहरा था, लेकिन दो महीने पहले फिर शुरू हो गया। कुछ समय पहले मैक्रों सरकार ने पेंशन नियमों को बदलने की पेशकश की, तब देश भर के कर्मचारी सड़कों पर उतर गए। इन मौकों पर भी पुलिस के आचरण की कड़ी आलोचना हुई थी।


हाल में आए आईफॉप एजेंसी के सर्वे के मुताबिक मैक्रों की लोकप्रियता का स्तर 38 फीसदी ही रह गया है। यानी लगभग दो तिहाई लोगों की उनसे उम्मीद टूट चुकी है। ऐसे में ये आशंका गहराती जा रही है कि जिस धुर दक्षिणपंथ को रोकने के लिए देश की मुख्यधारा की तमाम सियासी ताकतों के समर्थन से तीन साल पहले मैक्रों ने भारी जीत दर्ज की थी, उनकी नाकामियों के कारण 2022 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उन्हीं दक्षिणपंथी ताकतों के सत्ता में आने का रास्ता खुल सकता है।

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