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कैपिटल हिंसा से भयः क्या मार्शल प्लान बचाएगा यूरोप और अमेरिका में लोकतंत्र?
Sun, 10 Jan 2021 11:08 PM IST
सुरेंद्र जोशी
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बॉन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बॉन
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Sun, 10 Jan 2021 11:08 PM IST
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us capitol violence
- फोटो : PTI
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अमेरिका में कैपिटल हिल (अमेरिकी संसद भवन) पर हुए हमले से यूरोप की राजधानियों में भी भय बैठ गया है। खासकर जर्मनी में इसका असर देखा गया है। जर्मनी में कुछ महीने पहले वैक्सीन और लॉकडाउन के विरोधियों की भीड़ ने संसद भवन में घुसने की कोशिश की थी। यहां के जानकार उस नाकाम कोशिश की तुलना अमेरिकी संसद भवन पर छह जनवरी को हुए हमले से कर रहे हैं।
जर्मनी के विदेश मंत्री का अमेरिका से अनुरोध
इसी बीच जर्मनी के विदेश मंत्री हेइको मास ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह लोकतंत्र को बचाने के लिए यूरोप के साथ मिल कर एक “मार्शल प्लान” बनाए। मास ने कहा है कि अगर अमेरिका में लोकतंत्र नहीं रहा, तो इसका यूरोप में भी बचना असंभव हो जाएगा।
लोकतंत्र के लिए खतरनाक
जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धुर-दक्षिणपंथी समर्थकों ने कैपिटल हिल में जाकर उस पर कब्जे की कोशिश की, उसे यहां लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक माना गया है। चूंकि यूरोप में भी हाल के वर्षों में धुर दक्षिणपंथी समूहों की ताकत बढ़ी है, इसलिए यूरोप के नेता और विशेषज्ञ इस रुझान को अपने लिए भी खतरा मान रहे हैं।
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मास ने एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘हम लोकतंत्र के लिए मार्शल प्लान पर अमेरिका के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। हमें उदार लोकतंत्र के विरोधियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। यह बात सिर्फ अमेरिका पर लागू नहीं होती, बल्कि जर्मनी और पूरे यूरोप पर भी लागू होती है।’
दूसरे विश्व युद्ध के बाद बना था मार्शल प्लान
गौरतलब है कि मार्शल प्लान दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था। इसे यूरोप रिकवरी प्रोग्राम के नाम से भी जाना जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध में यूरोप में भारी तबाही हुई थी। तब यूरोप को फिर से खड़ा करने के लिए अमेरिका ने मार्शल प्लान बनाया था। वैसे तब अमेरिका का असल मकसद यूरोप में कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रसार रोकना था। इसलिए उसने अरबों डॉलर खर्च करके यूरोप के बर्बाद हुए शहरों और इन्फ्रास्ट्रक्चर को फिर से खड़ा किया। दूसरे विश्व युद्ध और उसके पहले हिटलर के शासन काल में जर्मनी में भारी तबाही हुई थी। इसलिए मार्शल प्लान के तहत सबसे ज्यादा फायदा जर्मनी को ही पहुंचाया गया था।
हेइको मास ने कहा कि इस समय लोकतंत्र खतरे में है। इसे यूरोप और अमेरिका दोनों जगहों पर बचाने की जरूरत है। इसके लिए खास कोशिश करनी होगी। मास ने कहा- भविष्य में सामाजिक विभाजन के कारणों को समझना और उन्हें खत्म करना यूरोप और अमेरिका के लोगों के सामने एक प्रमुख कार्य होगा। उन्होंने कहा कि सिर्फ आपसी सहयोग से ही समरसता, इस विश्वास कि लोकतंत्र सबसे मानवीय शासन प्रणाली है, और विज्ञान और विवेक की प्रेरक शक्ति में लोगों के यकीन को कायम रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस कार्य को करने के लिए यूरोपियन यूनियन और अमेरिका से बेहतर, निकटस्थ और अधिक स्वाभाविक भागीदार कोई और नहीं है।
बाइडन ने किया है यह वादा
गौरतलब है कि जो बाइडन ने वादा किया था कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो वे लोकतंत्र के लिए एक वैश्विक सम्मेलन का आयोजन करेंगे। इस बीच छह जनवरी की घटना से अमेरिकी लोकतंत्र के लिए पैदा हुए खतरे की तरफ सारी दुनिया का ध्यान गया है। उसी सिलसिले में अब जर्मनी ने एक पहल की है। उसके सुझाव पर जो बाइडन की टीम ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अमेरिका का नया प्रशासन इस मामले में क्या कहता है, इसे जानने में दुनिया भर की दिलचस्पी रहेगी।
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जर्मनी के विदेश मंत्री का अमेरिका से अनुरोध
इसी बीच जर्मनी के विदेश मंत्री हेइको मास ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह लोकतंत्र को बचाने के लिए यूरोप के साथ मिल कर एक “मार्शल प्लान” बनाए। मास ने कहा है कि अगर अमेरिका में लोकतंत्र नहीं रहा, तो इसका यूरोप में भी बचना असंभव हो जाएगा।
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लोकतंत्र के लिए खतरनाक
जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धुर-दक्षिणपंथी समर्थकों ने कैपिटल हिल में जाकर उस पर कब्जे की कोशिश की, उसे यहां लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक माना गया है। चूंकि यूरोप में भी हाल के वर्षों में धुर दक्षिणपंथी समूहों की ताकत बढ़ी है, इसलिए यूरोप के नेता और विशेषज्ञ इस रुझान को अपने लिए भी खतरा मान रहे हैं।
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मास ने एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा- ‘हम लोकतंत्र के लिए मार्शल प्लान पर अमेरिका के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं। हमें उदार लोकतंत्र के विरोधियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए। यह बात सिर्फ अमेरिका पर लागू नहीं होती, बल्कि जर्मनी और पूरे यूरोप पर भी लागू होती है।’
दूसरे विश्व युद्ध के बाद बना था मार्शल प्लान
गौरतलब है कि मार्शल प्लान दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था। इसे यूरोप रिकवरी प्रोग्राम के नाम से भी जाना जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध में यूरोप में भारी तबाही हुई थी। तब यूरोप को फिर से खड़ा करने के लिए अमेरिका ने मार्शल प्लान बनाया था। वैसे तब अमेरिका का असल मकसद यूरोप में कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रसार रोकना था। इसलिए उसने अरबों डॉलर खर्च करके यूरोप के बर्बाद हुए शहरों और इन्फ्रास्ट्रक्चर को फिर से खड़ा किया। दूसरे विश्व युद्ध और उसके पहले हिटलर के शासन काल में जर्मनी में भारी तबाही हुई थी। इसलिए मार्शल प्लान के तहत सबसे ज्यादा फायदा जर्मनी को ही पहुंचाया गया था।
हेइको मास ने कहा कि इस समय लोकतंत्र खतरे में है। इसे यूरोप और अमेरिका दोनों जगहों पर बचाने की जरूरत है। इसके लिए खास कोशिश करनी होगी। मास ने कहा- भविष्य में सामाजिक विभाजन के कारणों को समझना और उन्हें खत्म करना यूरोप और अमेरिका के लोगों के सामने एक प्रमुख कार्य होगा। उन्होंने कहा कि सिर्फ आपसी सहयोग से ही समरसता, इस विश्वास कि लोकतंत्र सबसे मानवीय शासन प्रणाली है, और विज्ञान और विवेक की प्रेरक शक्ति में लोगों के यकीन को कायम रखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस कार्य को करने के लिए यूरोपियन यूनियन और अमेरिका से बेहतर, निकटस्थ और अधिक स्वाभाविक भागीदार कोई और नहीं है।
बाइडन ने किया है यह वादा
गौरतलब है कि जो बाइडन ने वादा किया था कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो वे लोकतंत्र के लिए एक वैश्विक सम्मेलन का आयोजन करेंगे। इस बीच छह जनवरी की घटना से अमेरिकी लोकतंत्र के लिए पैदा हुए खतरे की तरफ सारी दुनिया का ध्यान गया है। उसी सिलसिले में अब जर्मनी ने एक पहल की है। उसके सुझाव पर जो बाइडन की टीम ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अमेरिका का नया प्रशासन इस मामले में क्या कहता है, इसे जानने में दुनिया भर की दिलचस्पी रहेगी।