फेसबुक की री ब्रांडिंग: शिगूफा नहीं है मेटावर्स, जुकरबर्ग की हैं बड़ी तैयारियां
facebook rebrands as meta: कुछ जानकारों का कहना है कि अब चूंकि कंपनी ने अपनी पूरी पहचान मेटावर्स के साथ जोड़ दी है, इसलिए यह लाजिमी है कि मेटावर्स को हकीकत बनाने में वह अपनी पूरी ताकत झोंक देगी।
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फेसबुक कंपनी का नाम बदलने का एलान करते समय कंपनी के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने अपने प्रस्तावित मेटावर्स तकनीक को दुनिया की अगली 'बड़ी चीज' बताया। जुकरबर्ग हाल में लगातार इस तकनीक को अगली पीढ़ी का इंटरनेट बताते रहे हैं। जानकारों ने मेटावर्स को ऐसी वर्चुअल रियलिटी के रूप में समझाने का प्रयास किया है, जिसमें यूजर के सामने का स्क्रीन थ्री-डाइमेंशनल रियलिटी (त्रिआयामी यथार्थ) का भान कराएगा। उनके मुताबिक मेटावर्स एक ऐसे मॉल की तरह होगा, जिसमें सारी चीजें उपलब्ध होंगी और रियल टाइम (पलक झपकते ही) में ऑनलाइन खरीदारी और भुगतान हो सकेंगे।
यूजर्स के लिए एक बिल्कुल नया अनुभव
फेसबुक का दावा है कि यह यूजर्स के लिए एक बिल्कुल नया अनुभव होगा। अभी जो वर्ल्ड वाइड वेब (इंटरनेट) मौजूद है, द्विआयामी है। इसलिए यह फ्लैट (चिपटा) तस्वीर पेश करता है। जबकि मेटावर्स असली दुनिया जैसी छवियां पेश करेगा। मेटावर्स की चर्चा दूसरी कंपनियां भी करती रही हैं। खास कर वीडियो गेम और ग्राफिक्स के कारोबार से जुड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट के साथ मेटावर्स अनुभव देने की बात करती रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी भी इसकी चर्चा कर चुकी है।
कंपनी मेटावर्स को हकीकत बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंक देगी
लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके बारे में जैसी पहल मार्क जुकरबर्ग ने की है, वैसी अभी किसी कंपनी नहीं की है। कुछ समय पहले फेसबुक ने कहा था कि वह यूरोप में दस हजार इंजीनियरों की भर्ती कर रहा है, जो मेटावर्स बनाने के लिए काम करेंगे। अब कंपनी ने अपना नाम ही मेटा रख लिया है। कुछ जानकारों का कहना है कि अब चूंकि कंपनी ने अपनी पूरी पहचान मेटावर्स के साथ जोड़ दी है, इसलिए यह लाजिमी है कि मेटावर्स को हकीकत बनाने में वह अपनी पूरी ताकत झोंक देगी। लेकिन कई विशेषज्ञों ने संदेह जताया है कि जुकरबर्ग ने मेटावर्स का जुमला फेसबुक की लगातार हो रही बदनामी से लोगों का ध्यान हटाने के लिए उछाला है। उनके मुताबिक जुकरबर्ग मेटावर्स निर्मित करने के प्रयासों से जरूर जुड़े रहे हैं, लेकिन इसके लिए उनका अपनी कंपनी का नाम ही बदल देना समझ से बाहर है। लेकिन जानकार इस राय से सहमत नहीं हैं।
जुकरबर्ग अगली पीढ़ी के इंटरनेट पर अपना वर्चस्व जमाना चाहते हैं
मेसाचुसेस्ट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में प्ले लैब्स के संस्थापक रिजवान विर्क ने टीवी चैनल की एनबीसी की वेबसाइट पर एक विश्लेषण में लिखा है- 'जुकरबर्ग अगली पीढ़ी के इंटरनेट पर अपना वर्चस्व जमाना चाहते हैं। इसलिए फेसबुक ने इस पर बड़ा दांव खेला है। फेसबुक ने बड़ा दांव ऑगमेंटेटे रियेलिटी (एआर) ग्लासेज को लेकर भी खेला है, जिसे कंपनी चश्मा बनाने वाली मशहूर कंपनी रे-बैन के साथ मिल कर लॉन्च करेगी। ये ग्लास मेटावर्स को कंप्यूटर से दूर ले जाएगा। (यानी बिना कंप्यूटर के इंटरनेट के इस्तेमाल को संभाव बनाएगा।) इससे ऐसा कुछ नजर आएगा कि वर्चुअल वस्तुएं हमारी आसपास की दुनिया की हिस्सा हैं।'
मेटावर्स निभा सकता है माइक्रोसॉफ्ट-गूगल जैसी भूमिका
विश्लेषकों का कहना है कि अतीत में फेसबुक जैसी उथल-पुथल मचा देने वाली तकनीकों (डिसरप्टिव टेक्नोलॉजी) ने उस समय इंडस्ट्री की अग्रणी हस्तियों को पीछे चलने के मजबूर कर दिया था। एक समय माइक्रोसॉफ्ट आईटी की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी थी। लेकिन गूगल के उदय ने उसके दबदबे को तोड़ दिया। कुछ ऐसी भूमिका मेटावर्स निभा सकता है। जुकरबर्ग ने फेसबुक के साथ एक समय उथल-पुथल मचाई थी। उन्होंने अगली डिसरप्टिव टेक्नोलॉजी के साथ अपनी बढ़त बनाए रखने की पहल की है।