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उत्तराखंड विशेष: उदय और उत्कर्ष का साथी

Fri, 25 Feb 2022 08:30 AM IST
Kashi Singh Airy काशी सिंह ऐरी
Updated Fri, 25 Feb 2022 08:30 AM IST
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सार
एक समय ऐसा भी आया कि बीबीसी सुनना और अमर उजाला पढ़ना राज्य के लोगों की आदत बन गया। अमर उजाला राज्य आंदोलन की आवाज बन गया था। हर तरह के संघर्ष में अखबार ने आंदोलन की सच्चाई को दुनिया के सामने रखा। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग जहां भी रहे, अखबार के संवाददाता ग्राउंड जीरो पर पहुंचे।
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Separate Uttarakhand state movement was started when the State Reorganization Commission was formed on linguis
उत्तराखंड विधान सभा। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : PTI

विस्तार

पच्चीस नहीं, मैं थोड़ा और पीछे यानी 43 बरस पहले से आरंभ करता हूं। भाषायी आधार पर राज्य पुनर्गठन आयोग बना तो अलग उत्तराखंड राज्य आंदोलन की शुरुआत हुई। 1979 में मसूरी में अलग पर्वतीय राज्य की मांग के लिए अपने-अपने ढंग से आवाज उठा रहे अग्रज नेताओं ने उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का गठन किया। अलग राज्य आंदोलन की उस शुरुआत के समय अमर उजाला एक नया-नया अखबार था। लेकिन यह अखबार जनसरोकारों की पत्रकारिता का एक नया मुहावरा गढ़ने लगा था। महिलाएं, युवा, छात्र, बुजुर्ग, पूर्व सैनिक आंदोलन की सशक्त ताकत बने, तो इसका श्रेय अमर उजाला को देना होगा।



वह समय भी आया कि बीबीसी सुनना और अमर उजाला पढ़ना राज्य के लोगों की आदत बन गया। अमर उजाला राज्य आंदोलन की आवाज बन गया था। हर तरह के संघर्ष में अखबार ने आंदोलन की सच्चाई को दुनिया के सामने रखा। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग जहां भी रहे, अखबार के संवाददाता ग्राउंड जीरो पर पहुंचे। यह अमर उजाला की निष्पक्ष, निर्भीक और विश्वसनीय खबरों का प्रभाव ही था कि देश और दुनिया के मीडिया में इसे जगह मिली। निष्पक्ष पत्रकारिता का ऐसा प्रभाव था कि चाहकर भी आंदोलन को दबाने वाली शक्तियां सिर नहीं उठा सकीं। जब-जब ऐसी कोशिशें हुईं, अखबार ने पूरी बेबाकी के साथ उन्हें बेनकाब किया।


जैसे जनता का राज्य आंदोलन पर विश्वास जगा, उनका वैसा ही भरोसा अमर उजाला पर भी बढ़ता गया। समूचे उत्तराखंड विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में अमर उजाला का प्रसार और विश्वास राज्य आंदोलन के समय अधिक तेजी से बढ़ा। आंदोलन के सिलसिले में जब हम दिल्ली में होते थे, तब देहरादून, श्रीनगर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली, पौड़ी, उत्तरकाशी, टिहरी में अपने साथियों को टेलीफोन कर पूछते थे कि अमर उजाला में क्या-क्या समाचार प्रकाशित हुए। तब छोटे और लघु पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं थीं। लेकिन अमर उजाला अच्छी छपाई के साथ पाठकों के बीच पहुंचा। राज्य में सभी स्थानों पर अखबार के रिपोर्टरों की टीम ने आंदोलन के हर पहलू को कवर किया।

मुझे एक वाकया याद आ रहा है। मोतीलाल बोहरा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे। उनके एडीसी दार्जिलिंग के रहने वाले एक आईपीएस अधिकारी थे। वे आंदोलन के दिन थे। उनके एडीसी ने मुझसे पूछा कि आपके राज्य में आंदोलन को अखबार बहुत हाईलाइट करता है, जबकि हमारे यहां भी आंदोलन होते हैं, लेकिन वहां अखबारों में उन्हें वैसा स्थान नहीं मिल पाता, आखिर ऐसा क्यों हैं? मैंने उन्हें इसकी दो प्रमुख वजह बताई। पहली यह कि राज्य से लेकर दिल्ली तक मीडिया में उत्तराखंड के बहुत बड़ी संख्या में लोग रहे, जिनका नैतिक और वैचारिक समर्थन और मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा। दूसरा अमर उजाला जैसे अखबारों का जन आंदोलन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था। अमर उजाला राज्य की नब्ज जानता था कि यहां लोग क्या चाहते हैं। बच्चा, बूढ़ा, जवान ऐसा कोई वर्ग नहीं था, जिसने सड़कों पर उतरकर 'आज दो अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो' के नारे नहीं लगाए। इन नारों को अखबार ने ताकत दी। मुझे याद आ रहा है कि राज्य के ठेठ दूरस्थ गांवों में भी लोग कई-कई किमी पैदल चलकर अखबार लेने जाते थे। मुजफ्फरनगर में आंदोलनकारियों पर बर्बरता की खबरें लोगों ने सुबह अमर उजाला में पढ़ीं।

अखबार में खबरें पढ़कर लोगों ने आंदोलनकारियों के जत्थों में गए परिजनों की कुशलता के बारे में जाना। राज्य आंदोलनकारियों की कुर्बानी, संघर्ष और अखबार से मिली ताकत के दम पर वह दिन भी आ गया, जब अलग उत्तराखंड राज्य का सपना साकार हुआ। राज्य गठन के बाद आंदोलन तो खत्म हो गया था, लेकिन अलग पर्वतीय राज्य की अवधारणा से जुड़े मूल प्रश्न जहां के तहां थे। नई सरकारों के सामने हमारा सबसे पहला प्रश्न गैरसैंण को राजधानी बनाने का था। हमने गैरसैंण के लिए आवाज उठाई। तब एक राष्ट्रीय दल के नेताओं ने आरोप लगाया कि काशी सिंह ऐरी और बिपिन त्रिपाठी ने गैरसैंण में जमीनें खरीदी हैं, इसलिए वे वहां राजधानी बनाने की मांग कर रहे हैं। ये आरोप निराधार थे। लेकिन हम किस-किस को सफाई दे सकते थे? एक बार फिर अमर उजाला ने अपनी निष्पक्ष और खोजी पत्रकारिता का प्रमाण दिया। अखबार की टीम गैरसैंण पहुंची और उसकी रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि यूकेडी के किसी नेता के नाम कोई जमीन नहीं थी। उन पर लगाए गए आरोप पूरी तरह से असत्य और पूर्वाग्रह से ग्रसित थे।

अमर उजाला की 25 वर्ष की यात्रा पूरी हुई और इधर उत्तराखंड राज्य को बने 21 वर्ष हो चुके हैं। इन वर्षों में जन संवाद के नए माध्यम तेजी से जुड़े। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद अब सोशल मीडिया का प्रसार बढ़ा। पर विश्वसनीयता की पुष्टि आज भी पाठक अखबार से ही करते हैं। राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की अब तक की यात्रा में कई अच्छे और बुरे पड़ाव देखने को मिले हैं। इन पड़ावों से गुजरते हुए हम आज भी उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अवधारणाओं से जुड़े प्रश्नों के उत्तर तलाशते हैं।

मेरा मानना है कि इन सवालों के जवाब के बिना उत्तराखंड अधूरा है। जिस तरह के पर्वतीय राज्य का सपना ऐतिहासिक आंदोलन में शरीक रहे लोगों ने देखा था, वे आज मायूस हैं। इस मायूसी को दूर करने की जिम्मेदारी हम सबकी है, अखबार की भी... नेताओं की भी और राज्य की जनता की भी।

-लेखक उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष हैं

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