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इंटरनेट पर 'पाबंदी' के लिए रूस में कानून
बीबीसी हिन्दी
Updated Fri, 02 Nov 2012 11:19 AM IST
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इंटरनेट पर मौजूद बच्चों के लिए कथित हानिकारक सामग्री पर पाबंदी लगाने या उन पर निगरानी रखने के लिए रूस में एक नया कानून लागू किया गया है।
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इस कानून के लागू होने के बाद रूस में अधिकारियों को किसी भी वेबसाइट पर पाबंदी लगाने या उनके किसी सामग्री को साइट से हटाने के लिए आदेश देने का हक होगा। यह कानून इसी साल जुलाई में दोनों संसद में पास हुआ था और फिर उस पर राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की मुहर लग गई थी।
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सरकार का कहना है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अत्यधिक यौन सामग्री देखने पर नियंत्रण रखना, खुदकुशी करने के तरीके बताने पर पाबंदी लगाना, नशीले पदार्थों के सेवन के प्रोत्साहन पर अंकुश लगाना और अश्लील फिल्मों के लिए बच्चों के इस्तेमाल पर नजर रखना है।
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लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि नए कानून से देश में सेंसर-व्यवस्था या अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगाने को बढ़ावा मिलेगा। कानून के विरोधियों का कहना है कि नया कानून लोगों पर अंकुश लगाने का राष्ट्रपति पुतिन का एक और हथकंडा है।
सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक मानवाधिकार संगठन 'सिटिजेन्स वॉच' के उपाध्यक्ष यूरी डोविन ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''ये सच है कि बहुत सारी ऐसी वेबसाइट्स हैं जिन्हें बच्चों को नहीं देखना चाहिए, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि बात सिर्फ वहीं तक सीमित रहेगी। सरकार किसी भी लोकतंत्र समर्थक वेबसाइट को बंद कर देगी। और ये अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला होगा।''
मानवाधिकार संगठनों के अलावा रूस की सर्च इंजन वेबसाइट यानडेक्स और सोशल मीडिया साइट मेंलडॉटआरयू ने भी नए कानून का विरोध किया है। लेकिन रूस के दूरसंचार मंत्री ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इंटरनेट हमेशा से स्वतंत्र रहा है।
उनका कहना था, ''सेंसरशिप लागू करने का सरकार की कोई मंशा नहीं है। यूटयूब और फेसबुक सामाजिक रूप से जिम्मेदार कंपनियां हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि अगर वो रूसी कानून का पालन नहीं करतीं तो उन्हें बंद कर दिया जाएगा।''
भारत
भारत में भी समय-समय पर सोशल मीडिया या इंटरनेट पर पाबंदी लगाने की बातें होती रही हैं। पिछले साल दिसंबर में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक सामग्री अपलोड किए जाने के कारण उनके खिलाफ कार्रवाई करने और उन पर पाबंदी लगाने की बात कहकर एक नई बहस छेड़ दी थी।
सिब्बल के इस बयान का कई लोगों ने विरोध किया था और फिर बाद में उन्हें सफाई देनी पड़ी थी कि सरकार का सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का कोई इरादा नहीं है।
इस साल जुलाई में असम में फैली हिंसा के बाद कुछ लोगों ने फेसबुक, ट्विटर और एसएमएस के जरिए देश के दूसरे इलाकों में रह रहे पूर्वोत्तर के छात्रों को डराने वाले संदेश भेजे थे जिसके बाद अफवाह फैल गई और पूर्वोत्तर के छात्रों का पलायन शुरू हो गया था।
उस समय भी सोशल मीडिया और मोबाइल फोन पर पाबंदी लगाने की बात उठी थी. सरकार ने कुछ समय के लिए भारी संख्या में एसएमएस भेजने पर पाबंदी भी लगा दी थी। बाद में सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया था। रूस ने सोशल मीडिया के कथित गलत प्रयोग को रोकने के लिए कानून बना दिया है। अब देखना है कि क्या भारत पर इसका कोई असर होगा या नहीं।