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'भूख से बेहाल कैदियों को पौधे खाने पर मार दिया'

Sat, 13 Jan 2018 12:40 PM IST
मार्गरिता रोड्रिगेज, बीबीसी वर्ल्ड
मार्गरिता रोड्रिगेज, बीबीसी वर्ल्ड Updated Sat, 13 Jan 2018 12:40 PM IST
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Naazi Soldiers killed prisoners who ate plants and trees in strived condition
HOLOCAUST MEMORIAL MUSEUM - फोटो : BBC Hindi
"मुझे याद है एक कैदी किसी गार्ड के बच्चे की मां बनने वाली थी।।। उसके साथ क्या हुआ यह मैं कभी नहीं भूल सकता।" थॉमस बरगेनथाल सोच में डूबे हुए बोल रहे हैं, "बच्चे से छुटकारा पाने के कई तरीके आजमा रहे उन लोगों ने उस औरत के पेट पर एक बोर्ड रखा और उस पर तब तक कूदते रहे जब तक बच्चा मर नहीं गया।"
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यह घटना किसी नाजी कैंप की नहीं बल्कि उत्तर कोरिया के एक जेल की है। "वहां बहुत सी दिल दहलाने वाली घटनाएं होती थीं लेकिन इसे बयां करना मुश्किल है।" थॉमस के ये शब्द उनके उस अतीत का दरवाजा खोलते हैं, जिसे भुलाना नामुमकिन है।
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हिटलर के यातना शिविर

नाजियों के दो यातना कैंप आउशवित्ज और जेक्सनहाउजेन में बंदी रहे थॉमस यहूदियों के सामूहिक नरसंहार (होलोकॉस्ट) के भुक्तभोगी भी रहे हैं। लेकिन उन्हें उत्तर कोरिया की जेल हिटलर के यातना कैंपों से भी खतरनाक लगती हैं।
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थॉमस बरगेनथाल कहते हैं, "मैं ये देखकर हैरान रह गया कि उत्तर कोरिया की जेल में होने वाली कुछ घटनाएं जर्मनी के नाजी यातना गृहों से भी बुरी हैं।" लेकिन नाजियों के अत्याचार से बुरा क्या हो सकता है?

थॉमस का जवाब तैयार है, "नाजियों के यातना कैंप संगठित तरीके से बनाई गई किलिंग मशीन की तरह थे। वहां गार्ड ज्यादातर वही करते थे जो उन्हें करने के लिए कहा जाता था। वे आदेश का पालन करते थे। लेकिन उत्तर कोरिया में गार्डों को मनचाहा करने की पूरी आजादी है। सोचिए ऐसी जगहों में क्या होता होगा? वहां अगर किसी ने शासन के खिलाफ कुछ कह दिया तो सिर्फ वह शख्स ही नहीं, उसकी पूरी तीन पीढ़ियां भी जेल में डाल दी जाती हैं। असली फर्क यही है कि उत्तर कोरिया में जो भी भयानक चीजें हो रही हैं वो ज्यादातर अनुशासन और संगठन की कमी की वजह से है।"

हिटलर के सत्ता में आने के बाद

थॉमस बरगेनथाल आगे बताते हैं, "जर्मनी के यातना कैंप में हर रोज लोगों को गैस चेम्बर में डाला जाता था। जो हुआ वो भयानक था लेकिन कम से कम सबको पता होता था कि क्या होने वाला है। यहां उत्तर कोरिया में गार्ड बिल्कुल अनुशासित नहीं हैं। ऐसे में हत्यारे शासन के साथ मिलकर उनका जैसा मन चाहे, वे लोगों के साथ वैसा सुलूक करते हैं।"

थॉमस के माता-पिता यहूदी थे और जर्मनी में रहते थे। 1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद थॉमस का परिवार उस समय के चेकोस्लोवाकिया चला गया।

थॉमस का जन्म 11 मई 1934 को वहीं के लुबोकना शहर में हुआ। जर्मनी में थॉमस के पिता बैंक में काम करते थे लेकिन चेकोस्लोवाकिया में उन्होंने एक होटल खोल लिया जिसमें हिटलर की नीतियों से आजिज आकर भागे बहुत से लोग रहे।

लेकिन हिटलर की ताकत और पहुंच बढ़ती गई और 1938 में थॉमस के पिता के होटल पर स्थानीय सेना ने कब्जा कर लिया।

Naazi Soldiers killed prisoners who ate plants and trees in strived condition
THOMAS BUERGENTHAL - फोटो : BBC
जेक्सनहाउजेन कैंप

सितंबर 1939 में थॉमस बरगेनथाल के परिवार को एक ट्रेन पकड़कर वहां जाना था जहां से एक जहाज ब्रिटेन रवाना होने वाला था लेकिन जर्मन सेना ने पोलैंड पर हमला कर दिया और उस ट्रेन को भी बम से उड़ा दिया गया।

थॉमस के परिवार को बतौर शरणार्थी एक घेटो और उसके बाद एक मजदूर कैंप में भेज दिया गया। थॉमस ने बताया, "1944 में मुझे माता-पिता के साथ आउशवित्ज भेज दिया गया।" वहां से थॉमस को जेक्सनहाउजेन कैंप भेजा गया जहां से अप्रैल 1945 में सोवियत सेना ने उन्हें छुड़ाया।

तकरीबन 11 साल के थॉमस को वहां से पोलैंड के एक अनाथाश्रम भेज दिया गया जहां 1946 में उन्हें उनकी मां मिल गई। 17 साल की उम्र में थॉमस अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पढ़ाई की।

उत्तर कोरिया की जेल

यहां से शुरू हुआ थॉमस बरगेनथाल का सफर इंटर-अमरीकी मानवाधिकार कोर्ट से होते हए संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ जस्टिस तक पहुंचा। हेग की इस कोर्ट में थॉमस दस साल तक जज रहे।

थॉमस ने दो और जजों के साथ मिलकर उत्तर कोरिया की जेल में चल रही बर्बरता पर 'इंवेस्टीगेशन ऑफ क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी इन द पॉलिटिकल प्रिजन्स ऑफ नॉर्थ कोरिया' नाम की रिपोर्ट तैयार की जो दिसंबर में सामने आई।

इस रिपोर्ट को बनाने के लिए ज्यूरी ने 2016 में उत्तर कोरिया छोड़कर आए कई लोगों के बयान सुने। इनमें कई राजनीतिक बंदी, एक बहुत ऊंचे पद पर रहे अधिकारी और एक गार्ड भी शामिल हैं। इन लोगों ने उत्तर कोरिया में चल रही बर्बरता को या तो खुद देखा है या उसे भोगा है।

थॉमस बरगेनथाल की रिपोर्ट

ज्यूरी को इस मामले में 2014 में आई संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की एक रिपोर्ट से भी मदद मिली। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि "वहां ऐसे अत्याचार होते हैं जिन्हें बताया भी नहीं जा सकता। इसमें टॉर्चर, यौन हिंसा और जबरदस्त राजनीतिक दमन शामिल हैं।"

जेनेवा में बीबीसी संवाददाता इमोजेन फोक्स के मुताबिक "यह संयुक्त राष्ट्र की उत्तर कोरिया पर छापी गई सबसे विस्तृत और दिल दहलाने वाली रिपोर्ट है।" थॉमस बरगेनथाल की रिपोर्ट में सामने आई जानकारी भी कम खौफनाक नहीं है। थॉमस बताते हैं, "वहां के हालात पर यकीन करना मुश्किल है। उनके यहां चार बड़ी जेल हैं जिसमें एक लाख से भी ज्यादा लोगों को बेहद खराब हालात में रखा गया है।"

Naazi Soldiers killed prisoners who ate plants and trees in strived condition
THOMAS BUERGENTHAL - फोटो : BBC
इस रिपोर्ट में सामने आई कुछ अहम बातें
  • भूख से बेहाल कैदियों को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे जमीन खोदकर खाने लायक पौधे निकालने की कोशिश कर रहे थे।
  • एक कैदी ने मकई चुरा ली। डर के मारे उसने मकई को मुंह में छिपा लिया लेकिन उसे इतना मारा गया कि उसकी मौत हो गई।
  • वहां नियमित रूप से सार्वजनिक तौर पर कैदियों को मारा जाता है। इस दौरान बच्चे भी वहां मौजूद रहते हैं।
  • वहां जानबूझकर कैदियों को भूखा रखा जाता है, ज्यादा काम करवाया जाता है और जबरन गर्भ गिरा दिए जाते हैं।
  • एक सुरक्षा अधिकारी ने बंदी महिला के साथ बलात्कार किया, उसे पीटा और फिर उसकी योनि में लकड़ी का डंडा डाल दिया। कुछ दिन बाद महिला की मौत हो गई।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि 'रोम समझौते में मानवता के खिलाफ किए जाने वाले जिन 11 अपराधों को शामिल किया गया है, उत्तर कोरियाई नेतृत्व के उनमें से दस जुर्म करने के सुबूत हैं। रंगभेद अकेला ऐसा जुर्म है जिसे करने के सुबूत नहीं मिले हैं।'

ग़ौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट इन्हीं 11 ग़ुनाहों की सुनवाई करता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल

थॉमस बरगेनथाल बताते हैं कि कुछ लोगों को तो ये सब सिर्फ इसलिए झेलना पड़ा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया का एक रेडियो स्टेशन सुन लिया था, "यही उनका संगीन जुर्म था।" उत्तर कोरिया अपने यहां ऐसी कोई भी राजनीतिक जेल होने से इंकार करता रहा है।

लेकिन 2016 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दावा किया कि इलाके की सैटेलाइट तस्वीरों में साफ नजर आता है कि न सिर्फ ऐसे कैंप हैं बल्कि उत्तर कोरिया का प्रशासन वहां मरम्मत का काम भी करवाता है। 2014 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद उत्तर कोरिया ने खबरिया एजेंसी रायटर्स को दिए एक बयान में कहा कि "वह साफ तौर पर पूरी तरह इन दावों को खारिज करता है।"

उत्तर कोरियाई नेतृत्व

ऐसे में थॉमस बरगेनथाल अपनी रिपोर्ट से क्या बदलाव आता देखते हैं? 

"मैं बस यह चाहता हूं कि लोग इस रिपोर्ट को पढ़ें, मुझे उम्मीद है कि चीजें बेहतर हों। मेरा इरादा इस रिपोर्ट के जरिए कोई जंग छेड़ना नहीं है। अगर उत्तर कोरियाई नेतृत्व को लगे कि सारी दुनिया को पता चल गया है कि वहां क्या हो रहा है तो हो सकता है कि वे हालात बदलने के लिए कुछ करें।"

लेकिन थॉमस एक ऐसे काम में समय क्यों लगा रहे हैं जो उन्हें उनके दर्दनाक अतीत की याद दिलाए?

"मैं किस्मत से बच गया। लेकिन मेरे पिता और दादा-दादी नहीं बच सके। अब मुझे लगता है कि ये मेरी उनके प्रति जिम्मेदारी बनती है। ऐसे सभी लोग जो बचकर निकल गए, उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे बाकी लोगों की रक्षा करें ताकि उन्हें वो ना भुगतना पड़े, जो हमने भुगता।"
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