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आसमान छूएंगी खाद्य पदार्थ की कीमतें
लंदन/एजेंसी
Updated Mon, 24 Sep 2012 11:25 PM IST
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अमेरिका में पड़ा भीषण सूखा पूरी दुनिया के लिए महंगाई का सबब बन सकता है। एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि एक साल के भीतर दुनिया में खाद्य पदार्थों की कीमतें एक नई ऊंचाई को छू सकती हैं, जो आगे भी बढ़ती जाएंगी। खाद्य पदार्थों का एक विशेषज्ञ समूह राबोबैंक ने अपने विश्लेषण में कहा है कि अगले साल की पहली तिमाही के दौरान खाद्य पदार्थों की कीमतों में आग लग सकती है।
अमेरिका में 1936 के बाद पड़े सबसे भीषण सूखे को इसकी मुख्य वजह बताया गया है। बैंक के अनुसार, जून 2013 तक खाद्य पदार्थों की कीमतें (जिस पर संयुक्त राष्ट्र भी नजर रखता है) मौजूदा स्तर से करीब 15 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। इसके मुताबिक, अगले साल खाद्य पदार्थों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को दोबारा मुद्रास्फीति का सामना करना होगा। अनाज और तिलहन का भंडार काफी कम हो जाने से खाद्य एवं कृषि संगठन को खाद्य मूल्य सूचकांक (जो फरवरी 2011 में तय किया गया था) को रिकार्ड स्तर पर करना होगा।
टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से नीति निर्माताओं (जन प्रतिनिधियों) को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि कीमतें बढ़ने से लोगों की बेचैनी बढ़ जाएगी। हालांकि राबाबैंक समूह ने यह भी कहा है कि उपभोक्ताओं पर इसका असर 2008 की तुलना में कम कष्टदायी होगा, उस समय गेहूं और चावल की भारी कमी हो गई थी। समूह ने कहा है कि आज के समय में मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की कमी देखी जा रही है, जो पशुओं को खिलाया जाता है। आगे कहा गया है कि चीन से मांग घटने और पश्चिमी देशों के कर्ज की समस्या वैश्विक प्रगति को प्रभावित करेगी। राबोबैंक ने कहा कि ब्रिटेन, जहां मांस एवं डेयरी उत्पादों की सबसे ज्यादा खपत होती है, निश्चित रूप से मुद्रास्फीति का प्रभाव महसूस करेगा।
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अमेरिका में 1936 के बाद पड़े सबसे भीषण सूखे को इसकी मुख्य वजह बताया गया है। बैंक के अनुसार, जून 2013 तक खाद्य पदार्थों की कीमतें (जिस पर संयुक्त राष्ट्र भी नजर रखता है) मौजूदा स्तर से करीब 15 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। इसके मुताबिक, अगले साल खाद्य पदार्थों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को दोबारा मुद्रास्फीति का सामना करना होगा। अनाज और तिलहन का भंडार काफी कम हो जाने से खाद्य एवं कृषि संगठन को खाद्य मूल्य सूचकांक (जो फरवरी 2011 में तय किया गया था) को रिकार्ड स्तर पर करना होगा।
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टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से नीति निर्माताओं (जन प्रतिनिधियों) को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि कीमतें बढ़ने से लोगों की बेचैनी बढ़ जाएगी। हालांकि राबाबैंक समूह ने यह भी कहा है कि उपभोक्ताओं पर इसका असर 2008 की तुलना में कम कष्टदायी होगा, उस समय गेहूं और चावल की भारी कमी हो गई थी। समूह ने कहा है कि आज के समय में मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की कमी देखी जा रही है, जो पशुओं को खिलाया जाता है। आगे कहा गया है कि चीन से मांग घटने और पश्चिमी देशों के कर्ज की समस्या वैश्विक प्रगति को प्रभावित करेगी। राबोबैंक ने कहा कि ब्रिटेन, जहां मांस एवं डेयरी उत्पादों की सबसे ज्यादा खपत होती है, निश्चित रूप से मुद्रास्फीति का प्रभाव महसूस करेगा।
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