भारत का जातिवाद ब्रिटेन में भी नहीं छोड़ता साथ
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क्या जाति शब्द ब्रिटेन के समानता कानून में शामिल होगा? ब्रिटिश सरकार जाति शब्द पर कई सालों से विचार कर रही है और हाल में सार्वजनिक तौर पर इस शब्द पर चर्चा हो चुकी है। इसकी वजह यह है कि कई संगठनों ने इस बात को माना है कि एशियाई समुदाय में जातिगत भेदभाव है जिसको समाप्त होना चाहिए। हालांकि, कई लोगों का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं है।
लता लंदन के पास एक दूसरे शहर में रहती हैं। वह अपनी पहचान ना जाहिर करते हुए अपनी कहानी बीबीसी को बताती हैं। वह जब एक बार शॉपिंग करने गई थीं तो उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था। वह कहती हैं, "एक महिला और उसकी बेटी मुझे जानते थे क्योंकि हम लोग एक शादी में मिले थे। टेस्को में उन्होंने मुझे कार पार्किंग में देखा तो उन्होंने मेरा रास्ता रोका। लेकिन मैंने उन्हें एक्सक्यूज मी कहा। जिसके बाद वह मुझ पर गुस्सा करने लगीं और मुझे भद्दी गालियां देने लगीं। उन्होंने मुझे 'भद्दी चमारी' कहा जिसके बाद मैं और मेरा बेटा बुरी तरह डर गए।"
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पुलिस नहीं कर पाई मदद
लता बताती हैं कि इसके बाद उनके बेटे ने उनसे 'चमारी' का मतलब पूछा तो उन्होंने कहा कि वह लंदन में ऐसा कुछ नहीं लाई थीं और यहां सब भारतीय हैं, लेकिन यह हादसा चौंकाने वाला है। लता को इस हादसे ने चौंका दिया और जब भी वह इस बारे में सोचती हैं तो उनको बुरा लगता है। उन्होंने बताया कि वह पुलिस के पास गई थीं, लेकिन पुलिस उनकी मदद नहीं कर पाई क्योंकि वह नहीं जानते थे कि जाति क्या होती है।
फेडरेशन ऑफ अंबेडकराइट एंड बुद्धिस्ट ऑर्गनाइजेशन ब्रिटेन के संतोष दास कहते हैं, "नए अध्ययन में हमने पाया है कि जाति के आधार पर ऐसे भेदभाव देखने को मिल रहे हैं जो हमने आज तक नहीं सुने थे। एक ऑनलाइन सर्वे में नौ फीसदी लोगों ने बताया कि उन्हें काम में तरक्की नहीं मिलती है जबकि नौ फीसदी लोगों ने कहा कि उनके साथ मौखिक दुर्व्यवहार होता है।" दास ने आगे बताया कि 12 साल से कम उम्र के सात फीसदी लोगों ने बताया कि स्कूल में उन्हें धमकी मिली और 12 साल के बच्चों ने बताया कि एशिया के शिक्षकों ने जाति के बारे में उनसे पूछा था।
कुछ का मानना नहीं है ऐसी बात
हालांकि, कुछ हिंदू संगठन इन रिपोर्टों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि यह रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू टेम्पल्स के महासचिव सतीश के। शर्मा ने बताया, "जब हमने यह जांचा कि किस प्रकार से इस मामले को लिया गया तो नतीजे बड़े चौंकाने वाले थे। इस रिपोर्ट को तैयार करने में पक्षपात किया गया था।"
सामुदायिक संगठनों ने जाति को लेकर कानून बनाने को लेकर भी चेताया है। उनका कहना है कि जाति को लेकर ऐसा करने से रोजगार को लेकर समस्याएं बढ़ सकती हैं। संगठनों का कहना है कि अगर ऐसा कोई कानून बना तो कंपनियां हिंदू और भारतीय उप-महाद्वीप से आने वाले लोगों को नौकरी देने से पहले सोचेंगी क्योंकि कोई भी व्यक्ति फिर जाति के आधार पर केस कर सकता है।
हालांकि, हर कोई इस बात से सहमत जरूर है कि जाति के आधार पर भेदभाव काफी गलत है और इसे बंद होना चाहिए, लेकिन इस पर कानून बनाने से समस्याएं हल होंगी इस पर आम सहमति नहीं है। अब देखना यह है कि अगले कुछ हफ्तों में ब्रिटेन सरकार इसको लेकर क्या हल निकालेगी।