{"_id":"b1ba63f8-445f-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"a-breath-test-for-detecting-cancer","type":"story","status":"publish","title_hn":"सांस से पता लगेगा आंत के कैंसर का","category":{"title":"Europe","title_hn":"यूरोप","slug":"europe"}}
सांस से पता लगेगा आंत के कैंसर का
Updated Wed, 12 Dec 2012 06:57 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने कैंसर के परीक्षण का एक ऐसा तरीका ईजाद किया है जो कि आंत के कैंसर के बारे में काफी सही जानकारी दे सकता है।
विज्ञापन
'ब्रीद टेस्ट' नामक ये परीक्षण सांस लेने के जरिए किया जाता है और फिर सांस को बाहर निकालने पर उसमें मौजूद रसायनों में ट्यूमर बनाने की क्षमता के आधार पर मरीज का परीक्षण किया जाता है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ सर्जरी ने इस परीक्षण को 76 प्रतिशत तक सही बताया है।
विज्ञापन
वैज्ञानिक सांस लेने वाले परीक्षणों को दूसरी बीमारियों जैसे- टीबी, कैंसर और मधुमेह के लिए भी इस्तेमाल करने पर काम कर रहे हैं। कैंसर की पहचान यदि आरंभिक अवस्था में हो जाती है और इसका सही इलाज होता है तो इसके ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
विज्ञापन
मौजूदा तकनीक
मौजूदा समय में आंत के कैंसर की जांच के लिए मल के साथ आने वाले खून का सहारा लिया जाता है। लेकिन इससे आंत के केवल कुछ हिस्सों में मौजूद कैंसर का ही पता चल पाता है। ब्रीद टेस्ट' तकनीक इस विचार पर आधारित है कि ट्यूमर्स की प्रकृति ऐसी होती है कि वे कुछ खास किस्म के अस्थिर यौगिक का निर्माण करते हैं।
ये यौगिक मरीज की सांस के साथ कुछ मात्रा में बाहर आ जाते हैं। शुरुआती अध्ययन से पता चलता है कि इनके परीक्षण के लिए कुत्तों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। दक्षिणी इटली के शहर बारी से आई डॉक्टरों की एक टीम ने आँत के कैंसर वाले 37 मरीजों की साँसों और 41 सामान्य लोगों की सांसों का तुलनात्मक अध्ययन किया।
शुरुआती दौर में ये परीक्षण करीब 85 प्रतिशत तक सही पाए गए। यहां तक कि जब उसके बाद भी परीक्षण किया गया तब भी इनकी शुद्धता 76 प्रतिशत थी। शोधकर्ताओं के लिए ये परिणाम काफी उत्साहजनक थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये परीक्षण उन मरीजों के लिए भी फायदेमंद हो सकता है जिनमें इलाज के बाद कैंसर दोबारा दिखने लगता है।
इस परीक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि व्यापक पैमाने पर इसके इस्तेमाल के लिए अभी और काम करने की जरूरत है।