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थाईलैंड में लगा आपातकाल, राजशाही के खिलाफ फूटा विद्रोह

Thu, 15 Oct 2020 04:41 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बैंकॉक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बैंकॉक Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 15 Oct 2020 04:41 PM IST
सार

  • अब नेपाल की तरह थाईलैंड में भी निशाने पर राजशाही
  • राजशाही के खिलाफ सड़कों पर बढ़ते जनांदोलनों को रोकने के लिए लगी इमरजेंसी

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Emergency imposed in Thailand, rebellion erupted against monarchy
Protest in Thailand - फोटो : Agency

विस्तार

थाईलैंड में बुधवार को हुए विशाल जन प्रदर्शनों के बाद थाईलैंड सरकार ने गुरुवार तड़के देश में आपातकाल लागू कर दिया। टेलीविजन पर पुलिस अधिकारियों ने एक लाइव प्रसारण में कहा कि ये कदम “शांति और व्यवस्था” बनाए रखने के लिए उठाया गया है। इसके तहत प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई है। आंदोलन के प्रमुख नेताओं सहित बहुत से कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। ये आंदोलन पिछली फरवरी से चल रहा है। गुजरे अगस्त में आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे और राजशाही पर नियंत्रण लगाने की मांग की थी। ये पहला मौका था, जब सीधे तौर पर राजतंत्र या राज परिवार का सड़कों पर उतरकर जन समुदाय ने विरोध किया हो। बुधवार को इस विरोध के और तेज होने के संकेत मिले।

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गिरफ्तार नेताओं में 36 वर्षीय मानवाधिकार अधिवक्त एनोन नम्पा और युवा नेता पनुसाया सिथिजिरावत्तनकुल भी हैं। पिछले अगस्त में भी थाईलैंड में बड़े पैमाने पर जन प्रदर्शन हुए थे। उस दौरान एनोन नम्पा ने तब तक जारी वर्जनाओं को तोड़ते हुए खुलकर राजशाही पर सार्वजनिक बहस छेड़ दी थी। उन्होंने इस व्यवस्था में सुधार की अपील की थी। प

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नुसाया ने तब 10 सूत्री घोषणापत्र जारी किया था, जिसमें राजशाही में सुधार की बात भी शामिल थी। तब आंदोलनकारियों ने कहा था कि उनका विरोध तभी ठहरेगा, जब उनकी ये तीन मांगें पूरी की जाएंगी- संसद भंग की जाए, संविधान को फिर से लिखा जाए और सरकार आलोचकों का दमन बंद करे।
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कोरोना महामारी के कहर के बावजूद अगस्त में हफ्ते भर तक जोरदार प्रदर्शन हुए थे। उसी आंदोलन का अगला दौर पिछले कुछ दिनों से राजधानी बैंकाक और थाईलैंड के दूसरे शहरों की सड़कों पर दिख रहा था। इस पर काबू पाने के लिए ही देश में इमरजेंसी लगाई गई है। अब ये देखने की बात होगी कि इससे जन विरोध को कब तक रोका जा सकता है।
 
थाईलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल का लंबा इतिहास है। मगर ताजा दौर के प्रदर्शन इस साल फरवरी में शुरू हुए, जब युवाओं की खास पसंद फ्यूचर फॉरवर्ड पार्टी (एफएफपी) को भंग कर दिया गया। मार्च 2019 में हुए संसदीय चुनाव में ये पार्टी तीसरे नंबर आई थी। युवा मतदाताओं ने उम्मीद जोड़ी थी कि ये पार्टी लंबे समय से चले आ रहे सैनिक शासन से देश को मुक्त कराएगी।

गौरतलब है कि 2014 में सेना ने तख्ता पलट कर सत्ता संभाल ली थी। भारी जनविरोध के दबाव में आकर 2019 में उसने चुनाव कराया था। इस चुनाव के बाद सैनिक तानाशाह प्रयुथ चन-ओचा फिर से प्रधानमंत्री बन गए। मगर एफएफपी विपक्ष की मजबूत आवाज बनकर उभरी। लेकिन इस साल के शुरु में कथित तौर पर गैर-कानूनी चंदा लेने के आरोप में पार्टी को भंग कर दिया गया।    

उसके विरोध में शुरू हुए आंदोलन का एजेंडा अब देश में वास्तविक लोकतंत्र कायम करना हो गया है। इसी सिलसिले में राजतंत्र पर बहस खड़ी की गई है, जबकि अब तक राजतंत्र और राजा को आलोचना और बहस से ऊपर माना जाता था। देश के शासक और मध्यवर्गों में अभी भी ऐसी ही सोच है। लेकिन ‘रेड शर्ट्स’ नाम से चर्चित नौजवान इस सोच को चुनौती दे रहे हैं। उन्हें इसमें वामपंथी गुटों और राजतंत्र विरोधी कई दूसरे समूहों का भी समर्थन हासिल है।

थाईलैंड में 1932 में ‘संवैधानिक राजतंत्र’ की स्थापना हुई थी। मगर राजा सामाजिक आदर के पात्र बने रहे। महाराज भूमिबोल काफी हद तक इस सम्मान को बनाए रखने में कामयाब रहे, लेकिन 2016 में उनके निधन के बाद स्थितियां तेजी से बदली हैं। भूमिबोल के बेटे 68 वर्षीय वजिरालोंगकर्ण इस वक्त राजा हैं, लेकिन वो ज्यादातर जर्मनी में रहते हैं। मुख्य राजकाज में सैनिक शासन ने उन्हें किनारे पर ही रखा है।


इस बीच सैनिक शासकों के संरक्षण में कंजरवेटिव और निहित स्वार्थी ताकतों का देश पर शिकंजा कसता गया है। मौजूदा आंदोलन उसके खिलाफ ही उठा एक जन विद्रोह है, जिसमें ये सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि अगर राजा की कोई भूमिका ही नहीं है, तो फिर उसकी उपयोगिता क्या है? 

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