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Hindi News ›   World ›   Economic inequality in the world is increasing continuously during the Corona period

कोरोना काल में लगातार बढ़ रही है दुनिया में आर्थिक गैर-बराबरी

Thu, 19 Nov 2020 06:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 19 Nov 2020 06:52 PM IST
सार

  • अर्थशास्त्रियों ने किया शोध, तमाम देशों में लोकतंत्र के वजूद को बताया खतरा
  • वैश्विक आमदनी का महज नौ फीसदी हिस्सा ही मिल रहा है 50 फीसदी निचली आबादी को

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Economic inequality in the world is increasing continuously during the Corona period
Crowd - फोटो : PTI (फाइल फोटो)

विस्तार

दुनिया में बढ़ती गैर-बराबरी के बारे में एक ताजा अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगर आर्थिक गैर-बराबरी पर काबू नहीं पाया गया, तो तमाम देशों में लोकतंत्र का वजूद खतरे में पड़ जाएगा। ये अध्ययन मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी की देखरेख में हुआ है। इसमें तकरीबन 150 अनुसंधानकर्ता शामिल हुए। उन्होंने अपना डाटा वर्ल्ड इनइक्वालिटी डाटाबेस की वेबसाइट डब्लूआईडी.वर्ल्ड पर प्रकाशित कर दिया है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह भी है कि कोरोना महामारी के कारण गैर-बराबरी की स्थिति और बिगड़ेगी।

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थॉमस पिकेटी ने एक लेख में चेतावनी दी है कि मौजूदा दौर में धार्मिक, नस्लीय और राष्ट्रीयता आधारित नफरत को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि गैर-बराबरी के असल सवाल पर परदा डाला जा सके। ताजा प्रकाशित डेटा के मुताबिक अगर दुनिया के पैमाने पर देखें, तो आज निचली 50 फीसदी आबादी के हाथ में वैश्विक आमदनी का सिर्फ नौ फीसदी हिस्सा ही जा रहा है। बेशक यह 1980 की तुलना में ज्यादा है, जब आबादी के इस हिस्से के पास वैश्विक आय का सिर्फ पांच फीसदी भाग ही जाता था। इस दौरान सबसे धनी एक फीसदी आबादी के पास कुल वैश्विक आय के जाने वाले हिस्से में तीन फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह 17 से 20 फीसदी हो गया है। लेकिन असल कहानी यह है कि इन दोनों बीच की आबादी की आमदनी में भारी गिरावट आई है। खासकर ऐसा धनी देशों में हुआ है।
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विशेषज्ञों ने इस घटनाक्रम को ग्लोबलाइजेशन का नतीजा बताया है। इसी का परिणाम है कि आज अमेरिका और यूरोप में बड़ी संख्या में मध्य वर्ग के लोग अशांत हैं और वे धुर दक्षिणपंथी और नस्लवादी ताकतों के साथ गोलबंद हो रहे हैं। थॉमस पिकेटी के मुताबिक शोधकर्ताओं ने कुल 173 देशों के ताजा आंकड़े जुटाए हैं। इन देशों में दुनिया की 97 फीसदी आबादी रहती है। इन आंकड़ों के आधार पर अब यह जानना संभव हो गया है कि 1980 के बाद से गरीब या मध्य वर्ग का कितना हिस्सा उनके हाथों से निकल कर धनी लोगों के पास गया है।
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ताजा आंकड़ों के मुताबिक गैर-बराबरी सभी देशों में बढ़ी है। आज इन देशों में टॉप 10 फीसदी आबादी के पास वहां की कुल आय का 30 से 70 फीसदी तक हिस्सा जा रहा है। अगर धन के मामले में देखें तो खाई और भी ज्यादा चौड़ी है। आय का अर्थ वह रकम होती है, जो व्यक्ति एक साल के दौरान कमाते हैं। जबकि धन आमदनी के साथ पहले से मौजूद संपत्ति का योग होता है। शोधकर्ताओं ने कहा है कि अभी धन के बारे में दिए गए आंकड़े पूरे नहीं हैं। इस बारे में वे अपनी वेबसाइट को अगले साल अपडेट करेंगे।


थॉमस पिकेटी ने कहा है कि ये रिपोर्ट यह बताती है कि किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद या प्रति व्यक्ति औसत आय में बढ़ोतरी का यह मतलब नहीं है कि इससे हर व्यक्ति का जीवन स्तर सुधर रहा हो। अगर जीडीपी या राष्ट्रीय आय का बड़ा हिस्सा एक छोटी धनी आबादी के हाथ में जा रहा हो, तो देश के धनी होने के साथ-साथ लोगों की गरीबी भी बनी रहेगी। पिकेटी ने कहा है कि इसलिए अब ये जरूरी हो गया है कि अलग-अलग देशों की सरकारें अपनी नीतियों में धन के सामाजिक वितरण की नीतियों में ठोस बदलाव करें। तभी दुनिया में पैदा हो रहे धन से सबकी बेहतरी संभव हो सकेगी।

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