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इबोला जैसी जानलेवा बीमारियों का इलाज खोजने वालों ने अब कोरोना के टीके के लिए कसी कमर

Mon, 10 Feb 2020 07:01 AM IST
योगेश साहू वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, सिंगापुर। Published by: योगेश साहू Updated Mon, 10 Feb 2020 07:01 AM IST
सार

  • छह माह में टीका विकसित करने का लक्ष्य, दिन-रात काम में जुटे
  • चुनौती: चीन में हर रोज करीब 100 लोगों की जान ले रहा है कोरोना

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Ebola curers begins testing vaccine for treatment of Coronavirus diseases threatening world
coronavirus - फोटो : ANI

विस्तार

चीन समेत दुनिया के कई देशों में कहर बनकर उभरे जानलेवा कोरोना वायरस के कारगर इलाज तलाशने के लिए अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक दुनिया भर के वैज्ञानिक जोर-आजमाइश कर रहे हैं। इसी कड़ी में अब उन वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने कोरोना का टीका बनाने के लिए कमर कसी है, जिन्होंने पश्चिम अफ्रीका में तबाही मचाने वाले घातक इबोला और सार्स के लिए टीके और दवाएं विकसित की थीं।

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कोरोना से अब तक चीन की धरती पर ही 800 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 37 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। वहीं, 24 से ज्यादा देशों में कोरोना के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। आम तौर पर किसी टीके के विकास में बरसों लग जाते हैं, क्योंकि इसमें पशुओं पर परीक्षण की जटिल प्रक्रिया, इंसानों पर चिकित्सकीय परीक्षण और तमाम तरह की मंजूरी जैसी जटिलताएं भी शामिल हैं। इसके बावजूद वैज्ञानिकों की कई टीमें 24 घंटे अलग-अलग स्तरों पर टीके के तेजी से विकास करने में जुट गई हैं।
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इन्हें एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम कोएलिशन फॉर एपीडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशंस (सीईपीआई) भी मदद दे रही है। वैज्ञानिकों का दावा है कि वे अगले छह माह में यह टीका तैयार कर लेंगे। ऑस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के एक समूह का हिस्सा बने वरिष्ठ वैज्ञानिक कीथ चैपल का कहना है कि यह वक्त बेहद दबाव का है और हम पर बड़ी जिम्मेदारी है। हालांकि, छह माह का यह वक्त हर दिन भारी पड़ रहा है। माना जा रहा है कि कोरोना वायरस हर रोज चीन में तकरीबन 100 लोगों की जान ले रहा है।

इबोला से गई थी 11,000 लोगों की जान
सीईपीआई का गठन 2017 में उस वक्त किया गया था, जब पश्चिम अफ्रीका में जानलेवा इबोला कहर बरपा रहा था। इस संस्था ने जैव तकनीकी शोधों के लिए वैज्ञानिकों पर बेइंतिहा पैसे खर्च किए थे। संस्था ने कारगर इलाज तलाशने के लिए लाखों डॉलर खर्च करके दुनियाभर में चार परियोजनाओं पर पैसे लगाए थे, ताकि टीके विकसित किए जा सकें।

इसी परियोजना से फिर उम्मीद जगी है कि अब कोरोना का भी सफल इलाज तलाशा जा सकेगा। वहीं, 2002-03 में महामारी का रूप धारण करने वाले सीवीयर एक्यूट रिस्परेटरी सिंड्रोम (सार्स) से दुनियाभर में तकरीबन 800 लोगों की मौत हो गई थी। सीईपीआई से जुड़े वैज्ञानिकों का सार्स के इलाज तलाशने का भी अनुभव रहा था।

16 हफ्ते में चिकित्सकीय परीक्षण का लक्ष्य

सीईपीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिचर्ड हैचेट ने बताया कि कोरोनो के टीके का चिकित्सकीय परीक्षण तकरीबन 16 हफ्ते में कर लिया जाएगा। जर्मन बायोफार्मास्यूटिकल कंपनी क्योरवैक और अमेरिकी कंपनी मॉडर्ना थेरेप्यूटिक्स भी टीका बनाने में जुटी हैं। ये कंपनियां संदेशवाहक आरएनए (अनुवांशिक गुणों को धारण करने वाला प्रोटीन) के आधार पर टीका तैयार करने में लगी हैं, जबकि एक और अमेरिकी कंपनी इनोवियो डीएनए आधारित तकनीक की मदद ले रही है।

वायरस को उसी के गुणों से मात देगी डीएनए-आरएनए तकनीक
सिंगापुर में ड्यूक-एनयूएस मेडिकल स्कूल में संक्रमित रोग कार्यक्रम के डिप्टी डायरेक्टर ओई एंग ओंग ने बताया कि डीएनए और आरएनए आधारित टीके दरअसल वायरस के जेनेटिक कोड का इस्तेमाल कर शरीर में ऐसी कोशिकाएं विकसित करते हैं जो वायरस जैसा ही प्रोटीन पैदा करते हैं और वायरस को मात देते हैं। ये प्रोटीन वायरस के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत कर लेते हैं और जैसे ही वायरस शरीर में कहीं भी प्रवेश करता है, उस पर हमला बोल देते हैं।

किसके कैसे प्रयास....

ऑस्टेलियाई शोधकर्ता टीके तैयार करने के लिए मॉलिक्यूलर क्लैंप टेकभनोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह तकनीक वायरस के डीएनए के क्रम को पहचान कर उसके जैसा ही लड़ाकू प्रोटीन तैयार करती है।
पाश्चर इंस्टीट्यूट में फ्रांसीसी वैज्ञानिक चेचक के टीके को कोरोना के खिलाफ तैयार करने में जुटे हैं। हालांकि, वे मानते हैं कि इसमें करीब 20 माह का वक्त लगेगा। वहीं, चीन के रोग रोकथाम और बचाव केंद्र ने भी टीका तैयार करने का काम शुरू कर दिया है।

सार्स के चचेरे भाई कोरोना का ऐसे हो रहा इलाज
कोरोना वायरस के लिए अभी कोई टीका नहीं होने से डॉक्टर भी लाचार साबित हो रहे हैं। हालांकि, कुछ डॉक्टर कोरोना से ग्रस्त मरीजों को जहां एंटी रिट्रोवायरल दवाएं दे रहे हैं तो कुछ फ्लू से संबंधित दवाएं दे रहे हैं। कोरोना को सार्स के वायरस से काफी मिलता-जुलता माना जाता है। इसीलिए इसे सार्स का चचेरा भाई कहा जाता है।   

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