दहल उठा था न्यूयॉर्क का 'लिटिल पाकिस्तान'
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न्यूयॉर्क के टाइम्स स्कवेयर से मुश्किल से आधे घंटे की दूरी पर बसा हुआ है एक इलाका जिसे अमरीका लिटिल पाकिस्तान के नाम से जानता है। कहते हैं न्यूयॉर्क के एयरपोर्ट पर उतरते ही जब किसी पाकिस्तानी को अपने घर की याद सताती है तो वो यहां आ जाता है। यहां उसे पाकिस्तानी खाना, बॉलीवुड का गाना, पाकिस्तानी कपड़े और पाकिस्तानी चेहरे सब कुछ मिल जाता है।
लेकिन ग्यारह सितंबर का हमला हुआ तो यहां के हालात काफी बदल गए। यहां रहने वाले हजारों ऐसे पाकिस्तानी जिनके पास कानूनी दस्तावेज नहीं थे, उन्हें अमरीका से बाहर कर दिया गया। कुछ डर के मारे कनाडा चले गए। पेशे से एकाउंटेट और कम्यूनिटी वर्कर, बाजा रूही को तब अमरीका आए मुश्किल से तीन चार बरस हुए थे। वो बताती हैं कि कभी लाहौर की याद दिलाने वाला ये इलाका ग्यारह सितंबर के हमले के बाद जैसे उजाड़ सा हो गया।
रूही कहती हैं, "चारों तरफ खौफ का माहौल था। सुबह उठते तो पता चलता था कि बीती रात पड़ोस के पूरे परिवार को पुलिस उठा ले गई। जिसे ढूंढने आई थी वो नहीं मिले, तो उसके पड़ोसी को ले गए। हर कोई सहमा हुआ था।"
यहां के माहौल में उन दिनों का खौफ अब नहीं नजर आता। लेकिन क्या हालात पूरी तरह से सामान्य चुके हैं? बाज़ा रूही कहती हैं कि लोगों में अब भी वो आत्मविश्वास नहीं लौटा है। वो बताती हैं, "जब भी ग्यारह सितंबर की बरसी होती है, रेड या ऑरेंज एलर्ट होता है, तो सुरक्षा बल सबसे ज्यादा इसी इलाके में और मस्जिदों के बाहर नजर आते हैं।"
ग्यारह सितंबर के बाद के हालात ने यहां के रहनेवालों और पुलिस के आपसी विश्वास पर भी खासा असर डाला। मुसलमानों पर जिस तरह से नजर रखी गई उस पर अक्सर सवाल उठे। लेकिन मुसलमानों और पुलिस के बीच पुल का काम करने वाले मोहम्मद असलम ढिल्लन कहते हैं कि हालात बेहतर हुए हैं।
कहते हैं, "हम पुलिसवालों से कहते हैं कि आपको मस्जिदों पर नजर रखने की जरूरत नहीं है, खुफिया कैमरे लगाने की जरूरत नहीं है। हम जब भी कुछ गलत होता हुआ देखेंगे या गलत लोगों को देखेंगे, हम खुद आपको सूचना देंगे। हम शांतिप्रिय लोग हैं।"यहां पर महिलाएं भी हमलों का निशाना बनी थीं। बहुत सी महिलाओं ने तो हमलों के डर से हिजाब और पारंपरिक लिबास पहनना छोड़ दिया था।
वहीं पर ब्यूटी पार्लर चलाने वाली नबीला असलम को फोन पर धमकियां और भद्दी बातें भी सुननी पड़ी थीं। कहती हैं कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी वहां से चले गए तो बिजनेस पर भी खासा असर पड़ा। लेकिन आज उनके पार्लर में रौनक दिखती है। बिज़नेस में फर्क इस बात से भी पड़ा है कि ग्राहकों में अब गैर-पाकिस्तानी भी शामिल हैं।
हालात बदले हैं लेकिन अब भी पुराने दिन भूले नहीं हैं। बाजा रूही कहती हैं अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार में मुसलमानों के बारे में जिस तरह की बातें हो रही हैं उनकी वजह से दहशत जैसे फिर से दस्तक देने लगती है।
लिटिल पाकिस्तान में पाकिस्तानियों की आबादी पहले जितनी नहीं है लेकिन बढ़ रही है। जिदगी काफी हद तक ढर्रे पर लौट चुकी है। लेकिन बहुतों का कहना है कि अब भी जब ग्यारह सितंबर का जिक्र आता है या फिर अमरीका के किसी कोने में चरमपंथी हमला होता है और तमाम मुसलमानों पर उंगलियां उठती हैं, तो जैसे पुराने जख्म फिर से हरे हो जाते हैं।