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रंग देखकर बच्चों को निशाना बना रहा कोविड-19 वायरस, अश्वेत-हिस्पैनिक आठ गुना अधिक बीमार

Fri, 04 Sep 2020 06:14 AM IST
संजीव कुमार झा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: संजीव कुमार झा Updated Fri, 04 Sep 2020 06:14 AM IST
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Coronavirus targeting children by seeing color
Coronavirus infected children - फोटो : पीटीआई

कोरोना संक्रमण बच्चों का 'रंग' देखकर निशाना बना रहा है। सिलसिलेवार हुए अध्ययनों से पता चला है कि इस महामारी ने अश्वेत व हिस्पैनिक बच्चों को ज्यादा प्रभावित किया है। श्वेतों की तुलना में इन बच्चों की अस्पताल में भर्ती होने की दर पांच से आठ गुना ज्यादा रही तो उनकी मौत भी कहीं अधिक हुई है।

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साथ ही जिन बच्चों में जानलेवा मल्टी सिस्टम इन्फ्लेमेटरी सिंड्रोम पाया गया, उनमें भी अश्वेत बहुतायत में मिले। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशऩ के अनुसार, अमेरिका में अब तक करीब 100 बच्चों ने कोरोना से जान गंवाई है, जिनमें ज्यादातर अल्पसंख्यक समुदाय के ही हैं।
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जर्नल बीएमजे में छपी रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में ही नहीं, ब्रिटेन में भी अश्वेत बच्चों  को कोरोना अधिक प्रभावित कर रहा है। ब्रिटेन के अस्पतालों में आईसीयू में जाने वाले संक्रमित बच्चों में अश्वेतों की तादाद तुलनात्मक रूप से ज्यादा रही है।साथ ही एमआईएस -सी ने उन्हें ज्यादा शिकार बनाया है। 
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हिस्पैनिक के लिए खतरा छह गुणा
अमेरिका में चिल्ड्रंस नेशनल हॉस्पिटल की डॉ मोनिका  के. गोयल का कहना है, मार्च -अप्रैल के दौरान वाशिंगटन के एक क्षेत्र में जो एक हजार बच्चे संक्रमित मिले थे, उनमें  से आधे हिस्पैनिक और एक तिहाई अश्वेत थे। गोयल के अध्ययन के मुताबिक, वाशिंगटन में श्वेतों की तुलना हिस्पैनिक बच्चों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने की संभावना छह गुना रही। वहीं अश्वेतों में यह दोगुनी दिखाई दी।

सीडीसी की रिपोर्ट ने भी की पुष्टि
सीडीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में अश्वेत बच्चे ज्यादा जोखिमग्रस्त मिले हैं। एक मार्च से 25 जुलाई के बीच अस्पतालों में भर्ती हुए 18 साल से छोटे 576 बच्चों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि इनमें से आधे किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त थे। इसमें मोटापा, फेफड़ों की बीमारी सामान्य रही। सीडीसी ने एमआईएस सी को लेकर भी 2 मार्च से 18 जुलाई के बीच 40 राज्यों के 570 बच्चों पर अध्ययन किया था।

इसमें सामने आया कि इस बीमारी से ग्रस्त 40 फीसदी बच्चे हिस्पेनिक और 33 फीसदी अश्वेत थे। वहीं श्वेतों का आंकड़ा सिर्फ 13 फीसदी था।

जरूरी सेवाओं से जुड़े अधिकांश पीड़ितों के अभिभावक
यूनिवर्सिटी ऑफ स्टैनफोर्ड में पीडियाट्रिक्स की प्रो. युवोन माल्डोनाडो के मुताबिक, इन अधिकांश बच्चों के माता -पिता कमजोर तबके से हैं औऱ वे सेवाओं से जुड़े हैं। इनका बाहर काफी आना-जाना होता है, इससे इनके बच्चों में संक्रमण का जोखिम ज्यादा है।


हावर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया है कि मैसाचुसेट्स मेें अप्रवासियों खाद्य सेवा से जुड़े कामगारों और साझा घरों में रहने वाले समुदायों में संक्रमण दर ज्यादा रही है।

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