जीनोम सीक्वेंसिंग से कोविड-19 से मुकाबले की तैयारी, जानें ये क्या है और जरूरी क्यों?
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कोविड-19 बीमारी फैलाकर विश्व में तबाही मचा रहे सार्स-सीओवी-2 वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग के जरिये दुनियाभर के वैज्ञानिक इसे रोकने का प्रयास कर रहे हैं। जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय की अप्लाइड भौतिकी प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों पीटर थाइलिन और थॉमस मेहोक का कहना है कि जीनोम सीक्वेंसिंग करने पर इस वायरस के अलग-अलग रूप पहचाने जा सकेंगे।
इससे न केवल इलाज की तलाश में मदद मिलेगी, बल्कि अगर वायरस नए रूप लेकर फैलता है तो उसे पहचाना जा सकेगा। हालांकि, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की जरूरत पड़ेगी। जानिए कोरोना वायरस को लेकर हो रहे इस अध्ययन के बारे में।
जीनोम सीक्वेंसिंग क्या है और जरूरी क्यों?
जीनोम यानी किसी जीव में मौजूद आनुवांशिक तत्व। जीनोम सीक्वेंसिंग तकनीक वैज्ञानिकों को वायरस के डीएनए व आरएनए में मौजूद आनुवांशिक सूचनाओं को जानने और परिभाषित करने में मदद करती है। इससे किसी मरीज में मिला वायरस कहां से आया जाना जाता है।
वैज्ञानिक जानने में जुटे हैं कि वायरस फैलते हुए किस प्रकार से विकसित होता है। कोरोना के एक हजार जीनोम विश्व में पहचाने गए हैं। वैज्ञानिकों के पास वायरस की पूरी सीक्वेंसिंग होगी तो महामारी बढ़ने से रोकने में मदद मिलेगी।
वायरस कैसे फैल रहा- ऐसे समझें?
बिल्कुल! वायरस जब भी अपना रूप बदलेगा, उसके जीनोम सीक्वेंस से वैज्ञानिक जान सकेंगे। किसी खास जगह मिला वायरस वहां कैसे और किस व्यक्ति के जरिये आया, उसने अपना रूप कितने समय में और किस व्यक्ति में बदला, यह कुछ ऐसी जानकारियां हैं, जिनके मिलने से वायरस के प्रसार की मात्रा और समय का सही आकलन हो सकता है।
वायरस भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार भी स्वयं को बदलता है, ऐसे में उसके किसी खास स्वरूप के मूल ठिकानों को पता लगाया जा सकता है। जैसे भारत में वायरस चीन से आया या यूरोप से, देश में वह किन जगहों पर पनपा, किन दूसरे क्षेत्रों में, किसके जरिये और कब फैला आदि बातों का पता लगाया जा सकता है।
लोगों के इलाज में इससे क्या मदद मिलेगी?
जीनोम सीक्वेंस मालूम होने पर एक अनुमान मिल सकता है कि कितने लोगों में, किस खास क्षेत्र में यह वायरस फैला है। केवल पॉजिटिव टेस्ट से मिली मरीजों की संख्या ही नहीं, बल्कि इस अनुमान से आंकी गई संख्या के अनुसार इलाज के लिए पहले से तैयारियां की जा सकती हैं।
विश्वभर के वैज्ञानिक एक दूसरे की मदद कैसे कर रहे हैं?
सभी देश अब डाटा को एक दूसरे से साझा कर रहे हैं। अब तक इस प्रकार के अध्ययनों में जिन देशों से डाटा नहीं मिलता था और उन्हें ‘डाटा डार्क स्पॉट’ कहा जाता था, वहां से भी सूचनाएं मिल रहींं। अब एक लैपटॉप और मोबाइल फोन के आकार के डीएनए सीक्वेंसर से यह डाटा मुहैया करवाया जा सकता है, बड़ी प्रयोगशालाओं की जरूरत नहीं रही।
वायरस के आनुवांशिक तत्व कहां से जुटाए जाते हैं?
मरीजों की नाक से मिले स्वाब के सैंपल से डीएनए सीक्वेंसर से आनुवांशिक तत्व अलग किए जाते हैं। जितने अलग-अलग स्थानों से सैंपल जुटाए जाते हैं, जीनोम सीक्वेंसिंग उतनी ही विस्तृत होती है। इस डाटा को डाटाबेस में अपलोड किया जाता है, जिससे वायरस के नए स्वरूपों के बारे में पूरा विश्व जान पाता है।