तनाव का असर: यूक्रेन संकट से पूर्वी एशिया की सुरक्षा व्यवस्था के लिए पैदा हुई हैं नई चुनौतियां
पूर्वी एशिया में सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि फिलहाल रूस और चीन के सामरिक उद्देश्य एक दूसरे जुड़ गए हैं। जबकि दक्षिण चीन सागर में प्रभाव क्षेत्र को लेकर इस इलाके के कई देशों का चीन से टकराव चल रहा है। रूस के साथ जापान के सीमाई विवाद हैं। चार उन द्वीपों पर जापान का दावा है, जिन पर अभी रूस का कब्जा है...
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रूस और यूक्रेन के बीच जारी तनाव का असर एशिया के सुरक्षा ढांचे पर भी पड़ने की संभावना है। इस आशंका के मद्देनजर जापान सरकार कई मुद्दों पर गंभीरता से विचार कर रही है। जापान की सबसे बड़ी चिंता युद्ध की स्थिति में ऊर्जा सप्लाई को स्थिर बनाए रखने की है। यहां ये विचार भी किया जा रहा है कि अगर रूस अगर यूक्रेन पर हमला करता है, तो क्या जापान को रूस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और उस कदम का जापान क्या असर पड़ेगा।
विश्लेषकों ने कहा है कि रूस और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव की स्थिति आई, तो उससे रूस का सुदूर पूर्वी इलाका सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। रूसी फौज पहले से इस क्षेत्र में तैनात है। ये इलाका जापान सागर के काफी करीब है। इसलिए वहां की गतिविधियों का जापान और अन्य पूर्वी एशियाई देशों पर सीधा असर हो सकता है। पहले से ही रूस ने प्रशांत महासागर में अपनी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ा रखी हैं। उसने एलान किया है कि वह माटुआ द्वीप पर जमीन से समुद्र में मार करने वाली मिसाइलें तैनात करेगा।
जापान के द्वीपों पर काबिज रूस
पूर्वी एशिया में सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि फिलहाल रूस और चीन के सामरिक उद्देश्य एक दूसरे जुड़ गए हैं। जबकि दक्षिण चीन सागर में प्रभाव क्षेत्र को लेकर इस इलाके के कई देशों का चीन से टकराव चल रहा है। रूस के साथ जापान के सीमाई विवाद हैं। चार उन द्वीपों पर जापान का दावा है, जिन पर अभी रूस का कब्जा है। जापान में आशंका है कि यूक्रेन के संकट के सिलसिले में इन द्वीपों पर रूस अपनी सैनिक तैनाती बढ़ा देगा। उससे जापान की उन द्वीपों को वापस पाने की उम्मीद और कमजोर हो जाएगी।
अमेरिका के प्रस्ताव चीन को पहुंचाएंगे फायदा
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूक्रेन संकट से चीन को लेकर अमेरिका और जापान की रणनीति के लिए भी नई चुनौतियां पैदा हुई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन संकट को दूर करने के लिए जो प्रस्ताव रखे हैं, अगर उन पर अमल किया गया तो उसका सीधा लाभ चीन को मिलेगा। बाइडेन ने कहा है कि छोटी और मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों की तैनाती रोकने के मुद्दे पर रूस के साथ बातचीत के लिए अमेरिका तैयार है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर छोटी और मध्यम दूरी की मिसाइलों की तैनाती पर रोक लगाने के लिए रूस और अमेरिका सहमत हो गए, तो चीन के लिए उससे अनुकूल स्थिति बनेगी। चीन ऐसे किसी समझौते से बंधा नहीं होगा, जबकि अमेरिका ऐसी मिसाइलें तैनात नहीं कर पाएगा।
विश्लेषकों का कहना है कि एशिया क्षेत्र में चीन पहले ही सबसे बड़ी नौसैनिक और वायु सैनिक ताकत बन चुका है। रूस और अमेरिका के बीच मिसाइलों के मामले में समझौता होने पर इस मामले में भी उसे बढ़त मिल जाएगी। जापान और पूर्वी एशिया के अन्य देशों के लिए असल चिंता यही है। उनकी ज्यादा प्रतिस्पर्धा रूस से नहीं, बल्कि चीन से है। उनकी निगाह इस बात पर टिकी हुई है कि कहीं यूक्रेन संकट से चीन के लिए लाभदायक स्थिति ना बन जाए।