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एससी बनाम ओबीसी आरक्षण: 2017 की सियासत का रिहर्सल

Thu, 05 May 2016 02:46 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 05 May 2016 02:46 AM IST
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Reason behind protest for reservation in UP.
प्रदर्शन करते छात्र - फोटो : amar ujala

राजधानी के बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में एससी बनाम ओबीसी मुद्दा कहीं सूबे में आने वाले समय की राजनीति का रिहर्सल तो नहीं है? पिछड़े वर्ग के छात्रों की आरक्षण की मांग के जवाब में दलित छात्रों की आरक्षण बचाने की जद्दोजहद के पीछे राजनीतिक मंसूबे तो नहीं छिपे हैं?

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जातिवाद की राजनीति से जूझते सूबे में ये सवाल शिद्दत से उठ रहे हैं। यहां जाति के सवाल बड़े मुद्दों से ध्यान भटकाते रहे हैं। बीबीएयू में दाखिले के लिए 50 फीसदी सीटें अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों के लिए आरक्षित हैं।
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केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते भारत सरकार ने 23 नवंबर 2004 को पहले एकेडमिक ऑर्डिनेंस में इसका प्रावधान किया है। इसे चुनौती देते हुए पिछड़ा वर्ग कल्याण समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दाखिल करके पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए भी आरक्षण मांगा है। इस समिति के पीछे कुछ शिक्षक और राजनीतिज्ञ बताए जा रहे हैं।
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50 फीसदी आरक्षण का अधिकार छिनने की आशंका भर से मंगलवार को अंबेडकर विश्वविद्यालय में दलित छात्रों का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने इस मसले पर दबाव बनाने के लिए कुलपति को घंटों बंधक बनाए रखा। पुलिस के दखल और बल प्रयोग के बाद ही स्थिति सामान्य हो सकी।

विवाद के लिए शिक्षक व बाहर के लोग जिम्मेदार

Reason behind protest for reservation in UP.

माना जा रहा है कि बीबीएयू का घटनाक्रम एकाएक सामने नहीं आया। इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम हुआ है। विश्वविद्यालय की अंदरूनी राजनीति के जानकार मानते हैं कि जहां एक जातिवादी खेमे ने आरक्षण के हक के लिए पिछड़ों की लामबंदी की कोशिश की, वहीं दूसरे खेमे ने दलित छात्रों को एकजुट कर विश्वविद्यालय प्रशासन पर दबाव बनाया।

विवाद की पटकथा लिखने में कैंपस के कुछ शिक्षकों के साथ ही बाहर के लोगों का भी हाथ माना जा रहा है।

लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि आरक्षण बहुत संवेदनशील मुद्दा बन गया है। इस पर जातियों की लामबंदी आसानी से हो जाती है। जिस तरह बीबीएयू का घटनाक्रम सामने आया है, उसमें भी राजनीतिक दल कूद पड़ेंगे।

दलित छात्रों को एक दल (बसपा) समर्थन देगा और ओबीसी छात्रों के पक्ष में दूसरे दल खड़े हो जाएंगे। ये दल दलित या ओबीसी वोटों के लिए राजनीति का खेल खेलने में पीछे नहीं रहेंगे। खुलकर नहीं तो पर्दे के पीछे से वे अपनी भूमिका निभाएंगे।

संभव है पूरे घटनाक्रम के पीछे भी उनकी भूमिका रही हो। द्विवेदी कहते हैं कि सामाजिक जीवन में भले ही जाति का प्रभाव कम हुआ हो, लेकिन दुखद है कि राजनीति में जाति का महत्व गहराता जा रहा है।

जातिवाद पर टिकी है सूबे की राजनीति

Reason behind protest for reservation in UP.

दरअसल विश्वविद्यालय कैंपस में जो कुछ हो रहा है, उसके बीज राजनीति में बहुत समय पहले बोए गए थे। सूबे की राजनीति में जातियों की जड़ें बहुत गहरी हैं। जातियों से वोटों की फसल लहलहाती है। उनकी लामबंदी सत्ता तक पहुंचने का माध्यम बनती रही है।

प्रदेश में पिछड़ी जातियों की आबादी लगभग 54 फीसदी और अनुसूचित जाति, जनजाति की 21 फीसदी है। इन जातियों पर सभी राजनीतिक दल सियासी दांव चलते हैं। यहां बेस वोट के इर्द-गिर्द कुछ दूसरी जातियों की लामबंदी से सरकारें बनती हैं।

भाजपा की सत्ता के लिए जरूरी हैं पिछड़े
प्रदेश में जहां बसपा को दलितों का अलंबरदार माना जाता है, वहीं सपा का बेस वोट यादव और मुस्लिम माने जाते हैं। प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए भाजपा को पिछड़ी जातियों का समर्थन जरूरी है। इन्हीं जातियों के भरोसे पूर्व में भाजपा सत्ता में आई थी। तब कल्याण सिंह पिछड़ी जातियों का चेहरा होते थे।

अब पिछड़ी जातियों को साधने के लिए भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर केशव प्रसाद मौर्य को सौंपी है। भाजपा के लिए पिछड़ी जातियां इतनी अहम हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यह संदेश देने में पीछे नहीं रहते कि वे पिछड़ी जाति से आते हैं।

देश भर के विश्वविद्यालयों में उठापटक

Reason behind protest for reservation in UP.

अलग-अलग कारणों से देश भर में केंद्रीय विश्वविद्यालयों में उठापटक मची है। मुद्दे भले ही अलग-अलग हों, लेकिन जेएनयू, एएमयू, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, एनआईटी श्रीनगर, हैदराबाद विवि के बाद लखनऊ के बीबीएयू में भी छात्र अलग-अलग गुटों में विभाजित हैं।

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े छात्र नेता प्रवीन कुमार कहते हैं कि मोदी सरकार बनने के बाद से विश्वविद्यालयों के छात्रों को बांटने की कोशिश की जा रही है।

इसके लिए जाति, धर्म और क्षेत्रवाद का सहारा लिया जा रहा है। यह सब इसलिए हो रहा है कि छात्र हितों के कॉमन मुद्दों पर कोई चर्चा न हो सके। दो साल में छात्रों के मुद्दों पर लिए गए फैसलों पर केंद्र सरकार घिरती रही है।

असली मुद्दा रोजगार
बीबीएयू में समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर कामेश्वर चौधरी विश्वविद्यालय के घटनाक्रम पर तो टिप्पणी नहीं करते, लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि असली मुद्दा रोजगार है। निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन है नहीं और सरकारी सेक्टर का विस्तार नहीं हो रहा है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित नहीं हो रहे। इसमें बैकडोर से निजीकरण की शुरुआत हो गई है।

अनुबंध (संविदा) के आधार पर नियुक्तियां होने लगी हैं। अपेक्षाकृत आगे बढ़ी हुई जातियां अब भी आरक्षण में भविष्य देख रही हैं। यही वजह है कि जाट, पाटीदार, मराठा पिछड़े वर्ग का आरक्षण मांग रहे हैं। इससे कहीं-कहीं जातियों या वर्गों के बीच हितों का टकराव सामने आता है।

स्वाभाविक है, राजनीति करने वाले इसका लाभ उठाते हैं। उनके लिए ‘पॉलिटिकल पोजीशन’ ही नौकरी है। इससे समाज में सद्भाव कमजोर होता है और बड़े मुद्दों से सभी का ध्यान भटक जाता है।

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