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तिब्बत-चीन के रिश्तों को लेकर पहला अंतराष्ट्रीय मिडिल वे पॉलिसी सम्मेलन

Thu, 07 Jun 2018 04:02 PM IST
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Updated Thu, 07 Jun 2018 04:02 PM IST
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First International Middle Way Policy Conference on Tibet-China Relationships
Middle Way Policy
चीन अधिकृत तिब्बत में तिब्बतियों को ही उनके 'धर्म और भाषा' के उपयोग से रोका जा रहा है जिसके कारण युवा जीवन जीने की पद्धति-धर्म और संस्कृति से दूर हो रहे हैं। इस तरह तिब्बत की संस्कृति तिब्बतियों के बीच ही लुप्त हो जाएगी। इसे बचाए रखने के लिए मध्य मार्ग की नीति को ही अपनाया जाना चाहिए। यह नीति तिब्बत और चीन दोनों ही देशों की लिए फायदेमंद रहेगी। अब हमें 14वें तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा द्वारा बनाई गई इस नीति को पूरे विश्व में फैलाना होगा। 
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इस तथ्य पर आधारित था मध्यममार्ग नीति को लेकर आय़ोजित पहला अंतराष्ट्रीय मिडिल वे पॉलिसी सम्मेलन। 1974 में चीन-तिब्बत विवाद का कोई हल नहीं निकलते देख तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 'मिडिल वे अप्रोच' को अपनाया। जिसमें चीन से मध्यम मार्ग निकालने की अपील की  गई थी। इस मध्यममार्ग में कहा गया था कि 'तिब्बत चीन का भाग बनने के लिए तैयार है, उन्हें बस उनका धर्म और भाषा सहेजने और अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की स्वतंत्रता दी जाए।
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मिडिल वे पॉलिसी को तिब्बती भाषा में उम्यालम कहते हैं'। इस पॉलिसी के अंदर तिब्बती संगठनों ने चीन की सरकार से आठ सूत्रीय मांग रखी है। जिसमें उनकी भाषा, कल्चर, धर्म, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, तिब्बत के प्राकृतिक स्त्रोतों का सही तरीके से दोहन, आम व्यक्तियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की मांग की गई है। इस दृष्टिकोण को दलाईलामा ने यथार्थवादी दृष्टिकोण कहा है।
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यथार्थवादी होने के बावजूद 40 साल से ज्यादा बीत चुके हैं, चीन ने तिब्बत की मांग को किसी तरह की तवज्जों नहीं दी है। अब इस मांग को विश्व के हर कोने तक पहुंचाने का बीड़ा तिब्बती युवकों ने उठाया है। जिसके तहत 26 मई से लेकर 31 मई तक धर्मशाला के टीपा सेंटर में इसे लेकर कार्यशालाएं रखी गईं। इस कार्यशाला में देश-विदेश से तिब्बत के युवाओं ने भाग लिया। 

सम्मेलन में देश-दुनिया से 9 अलग-अलग स्पीकर्स ने 600 तिब्बती युवाओं के सामने मिडिल-वे पॉलिसी के संबंध में अपने विचार रखे।
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