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व्हाइट हाउस में ट्रंप की एंट्री से पहले ही ड्रैगन बेचैन, ये हैं 6 दुखती रग

Mon, 19 Dec 2016 05:29 PM IST
Updated Mon, 19 Dec 2016 05:29 PM IST
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Beijing feeling heat after Trump questions one China policy, here are dragon's six Weakness

ताइवान की राष्ट्रपति टीसाई इंग-वेन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बात क्या की, ड्रैगन आग उगलने लगा। सब्र का बांध इस कदर टूटा कि चीन ने ताइवान के आसमान में परमाणु क्षमता वाले फाइटर जेट उड़ाकर चेतावनी दे डाली। चीन का बौखलाना स्वाभाविक है, क्योंकि 37 वर्षों में पहली दफा ऐसा हुआ जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ताइवान के राष्ट्रपति से बात कर 'वन चाइना पॉलिसी' को सीधे चुनौती दे डाली। वैसे ताइवान इकलौता ऐसा मसला नहीं है, जिसे लेकर चीन बेहद संवदेनशील है, उसकी दुखती रग कई और भी हैं। आखिर क्या हैं चीन की ये दुखती रग?

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ताइवान चीन की दुखती रग इसलिए है, क्योंकि चीन हमेशा से दावा करता आ रहा है कि वह उसी का हिस्सा है। बेशक, वहां सरकार ताइवानियों की है। वहां उनकी राष्ट्रपति भी हैं। लेकिन चीन इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं। इसलिए कोई भी देश ताइवान की तरफ हिमायती नजरों से देखता है तो चीन की सीना फटने लगता है। यही वजह है कि जब ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद ताइवान की राष्ट्रपति ने उनसे फोन पर बात की तो चीन को यह नागवार गुजर गया।
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ताइवान के अलावा चीन पांच दुखती रग तिब्बत, शिनजियांग, मकाऊ, हॉन्गकॉन्ग और साउथ चाइना सी हैं। इन सभी का चीन के आसपास होना या उसकी सीमा से सटा होना चीनी हितों के हिसाब से अलग बात है। लेकिन चीन के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इनके सहारे अमेरिका, भारत, जापान या दुनिया के और भी देश चीन के खिलाफ कूटनीटिक माहौल बनाने में कामयाब हो सकते हैं।
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क्यों दक्षिण चीन सागर है की चीन की दुखती रग?

Beijing feeling heat after Trump questions one China policy, here are dragon's six Weakness
साउथ चाइना सी को लेकर चीन हमेशा आंखें तरेरे रहता है तो इसकी वजह है कि दुनिया के सबसे बड़े समुंद्री व्यापार मार्ग पर उसका एकछत्र आधिपत्य जमाने की मंशा को मूर्त रूप देना। सैटेलाइट तस्वीरें बताती हैं कि चीन ने इस इलाके में अब तक 7 कृत्रिम दीप बना चुका है। इन द्वीपों पर उसने सेना भी लगाई है, यही नहीं जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी लगा रखी है। सैन्य भभकी के बल पर चीन सीमा से सटे छोटे देशों पर मनमानी करता है। मसलन ताइवान, वियतनाम, मलेशिया और फिलीपीन्स ने भी यहां चीन को जवाब देने के लिए कार्गों और सर्विलांस विमानों के लिए हवाई पट्टियों का निर्माण कर लिया है। 

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस इलाके से हर साल तकरीबन 5 ट्रिलियन डॉलर के सामान की आवाजाही होती है। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी के अनुमान के मुताबिक यहां 11 बिलियन बैरल्स ऑइल और 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस संरक्षित है। जिस पर चीन की पैनी नजर है। वह नहीं चाहता कि समंदर के प्राकृतिक खजाने को किसी में बांटा जाए। वहीं, साउथ चाइना सी से सीधे अमेरिका कुछ भी लेना-देना नहीं है, लेकिन अमेरिका के कारोबारी हित इस इलाके से जुड़े हैं। इसलिए वह चीन की चालों के खिलाफ आवाज उठाता रहता है। हर साल अमेरिका साउथ चाइना सी के जरिए तकरीबन 1.2 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार करता है। अमेरिका की फिलीपीन्स से डिफेंस डील चल रही है। इसलिए फिलीपीन्स की सुरक्षा अमेरिका की जिम्मेदारी बनती है। साफ है कि साउथ चाइना सी चीन के लिए बड़ी दुखती रग है।

तिब्बत इसलिए चीन की दुखती रग है क्योंकि सांस्कृतिक, पारंपरिक और वहां की आवोहवा के आधार पर उसने जबरन उस पर कब्जा कर रखा है। आलम यह है कि तिब्बत की आजादी लड़ाई अर्से से वहां के धर्म गुरु दलाईलामा भारत में रहकर लड़ रहे हैं। तिब्बत भारत के अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटा है। इसलिए चीन अगर भारत के खिलाफ किसी भी तरह की खुराफात को अंजाम देता है तो भारत अरुणाचल सीमा के जरिए चीन से बदला लेने में सक्षम साबित होगा।

 

शिनजियांग, हॉन्गकॉन्ग और मकाउ की हकीकत

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग - फोटो : Getty
शिनजियांग में स्वतंत्र राष्ट्र के लिए अर्से से उईगर समुदाय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां तक कि उनके नेता डोलकुन इसा को भी जर्मनी में रहते हैं। चीन उन्हें आतंकवादी मानता है और इंटरपोल में इसा के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया है। शिनजियांग पहले पूर्वी तुर्किस्तान हुआ करता था। 1949 में पूर्वी तुर्किस्तान के कुछ वक्त के लिए अलग राष्ट्र के तौर पर पहचान मिली लेकिन उसी साल चीन ने फिर से उस पर कब्जा कर लिया। चीन ने वहां हान समुदाय के चीनियों को बढ़ावा दिया। ताकि उईगरों का संघर्ष सफल न हो पाए। इसलिए वर्षों से शिनजियांग चीन के लिए दुखती रग बना हुआ है।

हॉन्गकॉन्ग में 2017 में चुनाव है। यहां जनता को सीमित लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हैं। यहां स्थानीय लोगों के पास प्रत्यक्ष तौर पर सरकार चुनने का अधिकार नहीं हैं लेकिन अभिव्यक्ति और विरोध का अधिकार जरूर है। इसलिए चीनी शासन के खिलाफ हॉन्गकॉन्ग की सड़कों पर संघर्ष होते रहते हैं। वहीं, चीन नहीं चाहता कि उसके खिलाफ कोई आंदोलन पनपे जो उसके खिलाफ चुनौती बने। चीन नहीं चाहता है कि लोकतंत्र की मांग की आग हॉन्गकॉन्ग से चीन तक आ पहुंचे। इसलिए हॉन्गकॉन्ग भी चीन के लिए किसी दुखती रग से कम नहीं है।

हॉन्गकॉन्ग की तरह मकाउ भी चीन के विशेष प्रशासनिक क्षेत्र में से एक है। इसके दक्षिण और पूर्व में दक्षिण चीन सागर है। चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र होने के बावजूद मकाउ की खुद की कानून व्यवस्था, टेलीफोन कोड, पुलिस बल और अपनी मुद्रा है। चीन से पहले यहां पुर्तगालियों की सत्ता हुआ करती थी। 1999 में इस चीन को हस्तांतरित कर दिया गया। एक चीना-पुर्तगाली संयुक्त घोषणा के मुताबिक 2049 तक मकाउ को उच्च स्तर की स्वायत्ता प्राप्त रहेगी। हालांकि तिब्बत, शिनजियांग और हॉन्गकॉन्ग की तरह यहां स्वतंत्रता की संघर्ष नहीं है। लेकिन चीन का इसके लिए संवेदनशील रहना उसकी दुखती रग बयां करता है।
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