चीन-ईरान संधि: 25 साल का रणनीतिक समझौता अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती, होगा दूरगामी असर
- चीन-ईरान के बीच नए समझौते से दुनिया में बढ़ेगी लामबंदी
- अमेरिकी खेमे के पहले से निशाने पर हैं दोनों देश
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चीन और ईरान के बीच 25 साल की रणनीतिक संधि को दुनिया में बढ़ती लामबंदी के लिहाज से बेहद अहम घटना समझा गया है। जानकारों का कहना है कि इस संधि का खाड़ी क्षेत्र और बाकी दुनिया के लिए भी दूरगामी असर होगा। इसे अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था के लिए एक और बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि इस समय चीन और ईरान दोनों अमेरिकी खेमे के देशों के निशाने पर हैं। अमेरिका के निशाने पर रूस भी है, जिससे हाल में ही चीन अपने संबंधों को और गहरा बनाया है। चीन-ईरान संधि से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव में ईरान की भूमिका बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ ईरान की सुरक्षा में चीन के स्वार्थ पैदा हो जाएंगे। इसका दीर्घकालिक प्रभाव होगा। नई संधि के तहत चीन ईरान में 400 अरब डॉलर का निवेश करेगा। अमेरिकी विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान पहले से ही आर्थिक मामलों में चीन पर अधिक से अधिक निर्भर होता गया है। अब वह चीन की रणनीतिक पहल का भी हिस्सा बन गया है।
पूरे पश्चिम एशिया में बढ़ेगा चीन का प्रभाव
जानकारों का कहना है कि चीन-ईरान की नई संधि से पूरे पश्चिम एशिया में चीन का प्रभाव बढ़ सकता है। साथ ही इससे ईरान को अलग-थलग करने की अमेरिकी मंशा पर पानी फिर सकता है।
बाइडन के आने पर भी चीन के प्रति नहीं बदली नीति
कुछ रणनीतिक जानकारों ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी सख्ती ने ईरान और चीन को आपसी संबंध गहरा करने पर मजबूर कर दिया। इन दोनों देशों को उम्मीद थी कि जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने से अमेरिकी नीति में बदलाव आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान बाइडन ने ईरान के साथ 2015 में हुई परमाणु संधि में अमेरिका को वापस लाने का वादा किया था, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने ईरान पर नई शर्तें थोप दीं। अब इसका नतीजा एक नई चुनौती के रूप में सामने आया है।
संधि पर विदेश मंत्रियों ने किए दस्तखत
संधि पर शनिवार को ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जारीफ और तेहरान यात्रा पर आए चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने दस्तखत किए। ईरान ने कहा है कि इस संधि दोनों देशों के बीच राजनीतिक और आर्थिक संबंध को गहरा बनाने का दस्तावेज है। इसमें व्यापार, आर्थिक और परिवहन संबंधी सहयोग का पूरा रोडमैप है।
2016 में जिनपिंग ने की थी तेहरान यात्रा
वैसे चीन-ईरान व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते का इरादा सबसे पहले 2016 में ही जताया गया था, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तेहरान की यात्रा की थी। इस समझौते को औपचारिक रूप दिया गया है। इस करार का मतलब यह है कि ईरान की चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना में अब पूर्ण भागीदारी बन जाएगी। बेल्ट एंड रोड इनिशियेटिव परियोजना के तहत चीन अपने सहयोगी देशों तक अलग व्यापार मार्ग बना रहा है। वह उन देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं भी चला रहा है।
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चीन के विदेश मंत्री वांग ने किया यह कटाक्ष
गुजरे दशकों में चीन ईरान का एक बड़ा व्यापार भागीदार बन कर उभरा है। जिस समय अमेरिका और उसके साथी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए, चीन उसका बड़ा सहारा रहा है। अब चीन को अपनी इस भूमिका का लाभ मिला है। संधि पर दस्तखत के समय चीन के विदेश मंत्री वांग ने ईरान की स्वतंत्र विदेश नीति की तारीफ की। उन्होंने कटाक्ष किया कि ईरान उन देशों में नहीं है, जिनकी नीति सिर्फ एक फोन कॉल से बदल जाती है।