Olaf Scholz China Visit: जर्मन चांसलर की चीन यात्रा से गहराए मतभेद, सिद्धांतों पर कंपनियों के फायदे को तरजीह
Olaf Scholz China Visit: शोल्ज ने बीजिंग जाने का फैसला कर चीन को घेरने की अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की रणनीति में पंक्चर कर दिया है। शोल्ज समर्थकों का कहना है कि जिस समय जर्मन अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंस गई है, जर्मनी चीन से बिगाड़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता...
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जर्मनी के चांसलर ओलोफ शोल्ज की चीन यात्रा को लेकर देश में गहरे मतभेद उभर आए हैं। शोल्ज शुक्रवार को बीजिंग पहुंचेंगे। शोल्ज की इस यात्रा से यूरोपियन यूनियन (ईयू) के भीतर भी मतभेद नजर आए हैं। आरोप है कि शोल्ज ने बीजिंग जाने का फैसला कर चीन को घेरने की अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की रणनीति में पंक्चर कर दिया है। उधर शोल्ज समर्थकों का कहना है कि जिस समय जर्मन अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फंस गई है, जर्मनी चीन से बिगाड़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
चीन और जर्मनी के बीच 2021 में 244 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ था। चीन जर्मनी का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। साथ ही वह कई जर्मन कंपनियों की आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत है। हाल में शी जिनपिंग को लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए चीन का राष्ट्रपति चुना गया है। उसके ठीक बाद बीजिंग जाने के शोल्ज के फैसले को इस बात संकेत माना गया है कि जर्मनी की निगाह में चीन से रिश्ता सर्वोपरि है।
शोल्ज अपने साथ एक बड़ा व्यापार प्रतिनिधिमंडल लेकर बीजिंग जा रहे हैं। इस दल में जर्मनी की सबसे बड़े कंपनियों के टॉप अधिकारी शामिल किए गए हैं। इस यात्रा के कुछ ही दिन पहले शोल्ज सरकार ने हैम्बर्ग स्थित जर्मनी के सबसे बड़े बंदरगाह चीन की सरकारी कंपनी कोस्को के निवेश को हरी झंडी दे दी। आलोचकों का कहना है कि ऐसे फैसले लेते वक्त शोल्ज ने मानव अधिकारों के मामले में चीन के रिकॉर्ड और यूक्रेन युद्ध में उसकी भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।
इन फैसलों की आलोचना कुछ उन दलों ने भी की है, जो शोल्ज के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में शामिल हैं। फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता रीनहार्ड हाउबेन ने कहा है- ‘हैम्बर्ग पोर्ट में कोस्को के निवेश को मंजूरी देने के बाद अब चांसलर को यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि जर्मन कंपनियों को भी चीन के इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश की इजाजत मिले।’ इसके पहले इस पार्टी ने कोस्को को हरी झंडी देने के प्रस्ताव का विरोध किया था।
कुछ ही समय पहले थिंक टैंक जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट ने चेतावनी दी थी कि जर्मनी की चीन पर निर्भरता जरूरत से ज्यादा बढ़ती जा रही है। उसने ध्यान दिलाया था कि इस वर्ष जनवरी से जून तक चीन को हुए जर्मन निर्यात में 2.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि चीन से आयात 45.7 फीसदी बढ़ा। इस वजह से जर्मनी का व्यापार घाटा 41 बिलियन यूरो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जर्मन चांसलर बड़ी कंपनियों के दबाव में हैं। ये कंपनियां चीन से संबंध तोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। चीन में जर्मन कंपनियों का प्रत्यक्ष निवेश इस वर्ष की पहली छमाही में 10 बिलियन यूरो तक पहुंच गया। यह एक रिकॉर्ड है। जर्मनी की कार निर्माता कंपनियों डायमलर, फॉक्सवैगन और बीएमडब्ल्यू की पिछले वर्ष हुई कुल बिक्री में चीनी बाजार का हिस्सा 30 फीसदी रहा।
मार्केट कंसल्टिंग एजेंसी बर्नर्स कंसल्टिंग के अधिकारी लुट्ज बर्नर्स ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- शोल्ज का चीन जाना एक सकारात्मक घटना है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि चीन जर्मनी से संबंध बनाए रखना चाहता है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक शोल्ज चीन यात्रा अगर जर्मन कंपनियों के लिए अनुकूल रही, तो आलोचकों का स्वर धीमा हो जाएगा। वरना, उनके लिए भविष्य में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।