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अब शुरू हो गया है जो बाइडन के ‘मेक एंड ब्रेक’ का वक्त, यह जून कार्यकाल के लिए है महत्वपूर्ण
Wed, 02 Jun 2021 04:17 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 02 Jun 2021 04:17 PM IST
सार
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बाइडन का इस महीने सबसे बड़ा एजेंडा पुतिन से मुलाकात है। पुतिन से मिलने के पहले बाइडन जी-7 देशों के नेताओं के साथ बैठक करेंगे। जानकारों का कहना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ और देश के अंदर अहम बिल पारित कराने में बाइडन नाकाम रहे, तो उनका बचा कार्यकाल महज रस्म-अदायगी बन कर रह जाएगा...
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जो बाइडन (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
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विस्तार
अमेरिकी राजनीति के ज्यादातर जानकार इस निष्कर्ष पर हैं कि राष्ट्रपति जो बाइडन के पूरे कार्यकाल की सफलता या नाकामी को तय करने वाला वक्त अब शुरू हो गया है। खास कर जून उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जुलाई से अगस्त तक इस बारे में साफ अनुमान लगा लिए जाएंगे कि क्या बाइडन सचमुच देश के अंदर और दुनिया में अमेरिका की पुरानी हैसियत बहाल करने के लिहाज से एक कामयाब राष्ट्रपति होंगे?
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इस अवधि में बाइडन के बहुचर्चित इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज और पुलिस सुधार बिल का भविष्य तय होगा। उधर, अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान बाइडन, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात करेंगे। टीवी चैनल एनबीसी के विश्लेषक शैनॉन पेटीपीस ने चैनल की वेबसाइट पर लिखा है कि अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के शुरुआती महीनों में बाइडन देश की दिशा तय करने में सफल रहे हैं। इस दौरान उनका ध्यान कोरोना महामारी का मुकाबला करने पर टिका रहा। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद देश में टीकाकरण तेज गति से हुआ। उससे अमेरिका में लोग अब आसानी से घूम-फिर रहे हैं। साथ ही उनके 1.9 ट्रिलियन कोरोना राहत पैकेज की खूब तारीफ हुई।
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पेटीपीस ने लिखा है कि लेकिन अब चुनौतियां उभर कर सामने आने लगी हैं। देश के अंदर प्राकृतिक गैस की कमी, घोषित समय के अंदर पुलिस सुधार बिल पारित कराने में नाकामी, इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज के अटक जाने से जहां देश के अंदर उनकी बढ़ रही चुनौतियों का अंदाजा मिला, वहीं इस्राइल-फिलीस्तीन विवाद से लेकर रूस और चीन से अमेरिकी संबंधों पर बाइडन प्रशासन की नीति पर कड़ी निगाह रखी जा रही है। जून में इनमें से कई मसलो पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका अमेरिकी राष्ट्रपति को मिलेगा।
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विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि अमेरिकी व्यवस्था में राष्ट्रपति कोई बड़ा एजेंडा लागू करने में किस तरह सीमाओं का शिकार हो जाता है, उसकी मिसाल बराक ओबामा के कार्यकाल में देखने को मिली थी। उनके राष्ट्रपति बनने के दो साल बाद हुए संसदीय चुनाव में तब डेमोक्रेटिक पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट में निर्णायक बहुमत गंवा दिया था। उससे ओबामा का एजेंडा लटक गया था। 2022 के नवंबर फिर संसदीय चुनाव होंगे। अगर तब तक बाइडन प्रशासन बड़ी कामयाबियां हासिल नहीं कर सका, तो उसके साथ भी वही हाल हो सकता है। डेमोक्रेटिक पार्टी के रणनीतिकार एड्रिन एलॉर्ड ने एक टीवी चैनल से कहा- ‘सत्ताधारी पार्टी जानती है कि उसके पास बहुत सीमित समय है। अब कुछ ठोस करने के लिए डेढ़ साल का समय बचा है। तमाम बड़े बिल पारित हो जाएंगे, इस बारे में पार्टी अभी कुछ भी निश्चित मान कर नहीं चल रही है।’
इस समय बाइडन प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2.3 ट्रिलियन डॉलर के इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज को पारित कराने की है। रिपब्लिकन पार्टी इसे समर्थन देने को तैयार नहीं है। इसके बदले उसने 900 अरब डॉलर का पैकेज पास कराने का सुझाव दिया है। खबरों के मुताबिक राष्ट्रपति बाइडन अब तक पैकेज को 1.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक घटाने को तैयार नहीं हैं। रिपब्लिकन पार्टी अमीरों पर टैक्स बढ़ाने के प्रस्ताव को भी पारित ना होने देने पर आमादा है। इस मुद्दे पर डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सदस्य भी राष्ट्रपति के साथ नहीं हैं। खबरों के मुताबिक इन्फ्रास्ट्रक्चर पैकेज की तुलना में पुलिस सुधार बिल पास होने की संभावना ज्यादा उज्ज्वल बताई जा रही है। उस बिल पर दोनों पार्टियों में सहमति बनती दिख रही है।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बाइडन का इस महीने सबसे बड़ा एजेंडा पुतिन से मुलाकात है। पुतिन से मिलने के पहले बाइडन जी-7 देशों के नेताओं के साथ बैठक करेंगे। असल सवाल यह है कि क्या बाइडन रूस और चीन के साथ संबंधों पर अपने सभी सहयोगी देशों के साथ ऐसी सहमति बना पाएंगे, जिसे अमेरिका के अंदर भी समर्थन मिले। जानकारों का कहना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ और देश के अंदर अहम बिल पारित कराने में बाइडन नाकाम रहे, तो उनका बचा कार्यकाल महज रस्म-अदायगी बन कर रह जाएगा।