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बड़ा फैसला: शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों को अब लेनी होगी मजदूरों की पूरी जिम्मेदारी
Fri, 12 Mar 2021 06:17 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 12 Mar 2021 06:17 PM IST
सार
कोर्ट ऑफ अपील ऑफ इंग्लैंड एंड वेल्स के एक ताजा फैसले का असर यह होगा कि बांग्लादेश के साथ-साथ भारत और पाकिस्तान में भी इस उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की मौत या उनके जख्मी होने पर ब्रिटिश शिपिंग कंपनियों पर लंदन में मुकदमा किया जा सकेग...
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शिप को तोड़ने का काम जारी
- फोटो : Agency (File Photo)
विस्तार
बांग्लादेश की शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्री (पुराने जहाजों को तोड़ने वाले उद्योग) में काम करने वाले मजदूरों की एक बड़ी कानूनी जीत हुई है। कोर्ट ऑफ अपील ऑफ इंग्लैंड एंड वेल्स के एक ताजा फैसले का असर यह होगा कि बांग्लादेश के साथ-साथ भारत और पाकिस्तान में भी इस उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की मौत या उनके जख्मी होने पर ब्रिटिश शिपिंग कंपनियों पर लंदन में मुकदमा किया जा सकेगा। यहां के अखबार द गार्जियन के मुताबिक दुनिया में यह अपनी तरह का पहला फैसला है।
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कोर्ट ने अपने फैसले मे कहा कि जो कंपनियां अपने जहाज दक्षिण एशियाई देशों को बेचती हैं, जहाजों को तोड़ने वाले उद्योग में काम करने वाले मजदूरों की देखभाल उनकी ही जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि यह जिम्मेदारी उन थर्ड पार्टी कंपनियों के मामले में भी होगी, जिन्हें इस काम में शामिल किया जाता है।
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ये महत्वपूर्ण फैसला बांग्लादेश की महिला हमीदा बेगम की याचिका पर आया। हमीदा बेगम के पति की 2018 तीन लाख टन के तेल टैंकर को तोड़ने के दौरान गिरने की वजह से मौत हो गई थी। ये घटना बांग्लादेश के चटगांव तट पर हुई। अब ताजा फैसले का असर यह होगा कि हमीदा बेगम जहाजरानी कंपनी मारन (यूके) के ऊपर लंदन की अदालत में केस दायर कर सकेंगी।
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बांग्लादेश की शिप ब्रेकिंग इंडस्ट्री पर्यावरण संरक्षण और मजदूरों की सुरक्षा संबंधी नियमों में ढिलाई बरतने के लिए कुख्यात रही है। अब उम्मीद की जा रही है कि ब्रिटेन में ताजा न्यायिक फैसले के बाद तमाम तरह के ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा। इससे शिप ब्रेकिंग उद्योग अपने यहां कार्य-स्थितियों को सुधारने के लिए मजबूर होगा।
द गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 15 वर्षों में चटगांव तट पर स्थित शिपब्रेकिंग उद्योग में 216 मजदूरों की मौत हुई है। इस वर्ष ऐसी सात मौतें हो चुकी है। इनके अलावा बहुत से लोग विकलांग हुए हैं। पहले की रिपोर्टों में कहा गया है कि चटगांव में मजदूरों को खतरनाक और गंदे माहौल में काम करना पड़ता है। लेकिन शिपिंग कंपनियां जहाजों को बेच कर स्वामित्व बदल देती हैं और इस तरह अपनी जिम्मेदारी से बचती रही हैं। गौरतलब है कि जहाज एस्बेस्टस के बने होते हैं, जिन्हें तोड़ने के दौरान पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। साथ ही जहाजों को तोड़ने के दौरान खतरनाक केमिकल्स भी वातावरण में आते हैं, जिनका वहां काम करने वाले लोगों की सेहत पर बहुत खराब असर होता है।
इसके पहले भी दो ऐसे अदालती फैसले आए थे, जिनसे गरीब देशों के लोगों को प्रदूषण फैलाने वाली और मजदूरों के हितों का ख्याल ना करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर मुकदमा करने का अधिकार मिला था। उन फैसलों के मुताबिक मूल रूप से ब्रिटिश या उनकी ब्रिटेन स्थित सहायक कंपनियों पर ब्रिटिश अदालतों में केस किया जा सकेगा।
पिछले महीने एक फैसला ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट ने दिय़ा था। उसमें उसने कहा था कि नाईजीरिया के किसान और मछुआरे तेल कारोबार से जुड़ी रॉयल डच शेल कंपनी के खिलाफ प्रदूषण के मामले को लेकर ब्रिटिश अदालत में मुकदमा दायर कर सकते हैँ। कोर्ट ने इस कंपनी की इस दलील को ठुकरा दिया था कि नाईजीरिया में फैले प्रदूषण की जिम्मेदारी उस पर नहीं आती।
एक दूसरे अहम फैसले में ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा था कि जाम्बिया के ग्रामीण ब्रिटिश कंपनी वेदांता पर ब्रिटिश कोर्ट में मुकदमा कर सकते हैं। गौरतलब कि वेदांता की सहयोगी कंपनी जाम्बिया के खनन क्षेत्र में कार्यरत है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सहयोगी कंपनी के कारोबार के दौरान फैले प्रदूषण के लिए मुख्य कंपनी जिम्मेदार है, इसलिए वहां के ग्रामीणों की देखभाल करना अब वेदांता जिम्मेदारी है।
जानकारों के मुताबिक ताजा फैसलों के साथ कॉरपोरेट सेक्टर की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ी प्रगति हुई है।